Samsamyik Srijan

ISSN2320-5733 CONTACT09871907081 , 08882719557
Samsamyik Srijan

अपने हिय की बात

"हिन्दी सहित्येतिहास-लेखन की समस्याएँ" विषय पर जब कुछ बोलना चाहता हूँ उससे पहले ही एक यक्ष प्र्श्न सीना ताने सामने खड़ा हो जाता है- "वर्तमान समय मे क्या हिन्दी साहित्य का संपूर्ण इतिहास लिखा जाना संभव है?" उत्तर, जो मेरे मान मे आता है-'नही' | मेरे विचार से मेरे विचार से जिस तरह से छायावाद की जैसी भी परिभाषा गढ़ी-खरादी जाय किसी ना सी कवि या प्रवृति का उससे बाहर हो जाना लाजिमी है|

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ताजातरीन पंक्तियाँ

अभी जिंदा हैं दास्तानें
अपनी खामोशियों में
रह-रह के लेती हैं अंगड़ाईयाँ...
जाने कितनी ही उबासियाँ
दे देती हैं शब्द
और बयाँ करती हैं
अपनी दास्तान।

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