ISSN2320-5733

विज्ञापन के लिए सम्पर्क करें : 9205867927

समसामयिक सृजनयूजीसी केयर लिस्ट में शामिल

पुस्तक समीक्षा विश्वविद्यालय परिसर जीवन और हिन्दी उपन्यास : महासागर में डुबकी लेखक : डॉ. सत्यकेतु सांकृत समीक्षक : अर्चना पैन्यूली शेयर करें

'पुस्तकें जिन्दगी नहीं होती वे केवल शून्य में थरथराहट होती हैं। पर थरथराहट के रूप में उपन्यास सम्पूर्ण मानव जीवन को कम्पित कर सकता है।कविता, दर्शन विज्ञान, कोई भी अन्य पुस्तक उतनी थरथराहट नहीं कर सकती जितनी उपन्यास कर सकती है,' ये शब्द पुस्तक के प्राकथन से हैं, जो 1885 में जन्में अंगरेजी उपन्यासकार डी.एच. लोरेन्स ने उपन्यासों के सन्दर्भ में कहे थे।

डॉ सत्यकेतु सांकृत की पुस्तक -'विद्यालय परिसर जीवन और हिन्दी उपन्यास'को पढ़ना और समीक्षा लिखना मेरा सौभाग्य रहा है।इस पुस्तक में हिन्दी के उपन्यासों में विश्वविद्यालय परिसर कितना उभरा है, समाया है, चित्रित है, बहुत ही प्रभावशाली ढंग से सत्यकेतु जी ने वर्णित किया है।यह अपनी तरह की पहली पुस्तक है जो मुझे अत्यधिक विशिष्ट लगी।मैंने काफी शोध पुस्तकें पढ़ी हैं किन्तु उपन्यास में परिसर जीवन की छानबीन वाली यह पहली पुस्तक पढ़ी।पुस्तक काफी विस्तृत है, रोचक है, और ज्ञानवर्धक है।इस पुस्तक से सत्यकेतु जी का गहन अन्वेषण झलकता है।उन्हीं के शब्दों में देश की समूची भावी प्रगति परिसर जीवन की श्रेष्ठता पर निर्भर करती है तो इसे हम नजरअंदाज कर ही नहीं सकते। यह पुस्तक उपन्यासों में विश्वविद्यालीय परिसर जीवन तक ही सीमित नहीं है।तमाम अन्य आयामों और पहलुओं को भी छूतीहै।मसलन, हिन्दुस्तान में विश्वविद्यालय स्थापना के इतिहास को बहुत विस्तार से बताती है।शिक्षा प्राणलियाँ बताती हैं।हिन्दी साहित्य में उपन्यास विधा का इतिहास से अवगत करवाती है। पाठकों को परिसर जीवन की प्रकति, खूबियाँ, विडम्बनाएँ, और विकृतियाँ पता चलती है। पाठक शैक्षणिक परिसर से सम्बन्धित कई खट्टी-मीठी बातों, गतिविधियों और उसके विविध पक्षों से रूबरू होते हैं - कैंपस लाइफ, स्टूडेंट हॉस्टल, दोस्ती, प्रेम, रैंगिग, प्लैजिरम, छात्र आन्दोलन, छात्रों की वैचारिक प्रखरता, उदंडता, अराजकता, अनुसाशनहीनता, दिशाहीनता, मूल्यगत ह्रास, नस्लवाल, जातिवाद, भ्रष्टाचार,परिसर का विसाख्त वातावरण। हर पक्ष को बारीकी से विश्लेषित किया है। गौरतलब है कि ये बातें सिर्फ छात्रों तक सीमित नहीं है। शिक्षक, विभागाध्यक्ष, प्राचार्य, कुलपति और कर्मचारी भी इनसे प्रभावित हैं।चाहे इसे उनका लोभ-स्वार्थ कहो या विवशता आज छात्रों के साथ शिक्षक भी कठघरे में खड़े हैं।छात्र-अध्यापकों के बीच सम्बन्धों के बिगड़ते स्वरूप ने किस तरह अध्यापकों की प्रतिष्ठा को आघात पहुंचाया है,दूसरी तरफ छात्रों का विश्वास टूटा है, यह बात पुस्तक से बखूबी प्रकट होती है।यह तो हर किसी के पढ़ने-सुनने में आता है कि कई विश्वविद्यालय और महाविद्यालय जिम्मेदारी पर खरे नहीं उतर रहें हैं। शिक्षा के गौरवशाली इतिहास से खिलवाड़ कर रहे हैं।छात्र पदर्शन, विरोध, कैम्पस में मारपीट, पुलिस की कार्रवाई हम आयदिन अखबारों में पढ़ते हैं। ईमानदार, नेकवान चरित्र के छात्र और अपने अध्यापन के प्रति समर्पित अध्यापक भी गेंहू में घुन की तरह पिस जाते हैं।

पुस्तक से यह भी पता चलता है कि स्वतंत्रता पूर्व और स्वतंत्रता के बाद भारत में जितने भी परिवर्तनकारी सामाजिक आंदोलन हुए, उनमें छात्रों की भूमिका बहुत अहम रही है। पाठक स्वतंत्रता सैनानियों, समाज सुधारकों, विगत के और समकालीन साहित्कारों और उनकी पुस्तकों से रूबरू होते हैं। कई उपन्यासों की जानकारी मिलती हैं, समीक्षाएं पढने को मिलती हैं। सन्दर्भ ग्रन्थ की भी लम्बी सूची है।

जब कोई अध्यापन लेखक भी होता है तो जाने-अनजाने में स्कूल या विद्यालय का परिसर आ ही जाता है।सत्यकेतु जी स्वयं एक प्रोफ़ेसर और डीन है।पुस्तक से प्रकट होता है कि सत्यकेतु जी अपने विद्यालय में सिर्फ नौकरी ही नहीं की उन्होंने उसे जीया है। निश्चित ही उन्होंने अपना ऊर्जावान समय अपनी नौकरी को दिया है। गहरा चिन्तन, अद्भुद विश्लेषण। पुस्तक पढ़ कर सत्यकेतु जी की स्थायी अनुभूति और पल-पल आकार लेती अनुभूतियों से पाठक रूबरू होते हैं। प्राकथन भी बहुत कुछ कहता है।सत्यकेतु जी ने चार पृष्ठों के प्राकथन में अपनी बातें डिटेल्स में लिख कर पुस्तक का निचौड़ प्रस्तुत किया है। उनका कहना सत्यता की कसौटी पर खरा उतरता है किउपन्यासों में विश्वविद्यालय के परिसर को ढंग से चित्रित नहींकिया गया है। 1942 में भारत छोडो आन्दोलन में छात्रों की सक्रिय भूमिका भरपूर रूप से उपन्यासों में नहीं आयी। विश्वविद्यालय के छात्रों का देशप्रेम का जज्बा साहित्य ने संज्ञान नहीं किया। विश्वविद्यालय का स्वरूप और गतिविधियाँ - क्रांतिकारी स्वरूप, दंगी स्वरूप, अनुशासनहीनता, भ्रष्टाचारउस युग के उपन्यासकारों ने नहीं दिखाया है।

मद्रास विश्विद्यालय और कलकता विश्वविद्यालय बड़े प्रमुख थे।डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्ण वहाँपढ़ाते थे। इन्हें उपन्यासों में जगह नहीं मिली। कहा जाता है कि जो बातें इतिहास में दर्ज नहीं होती, साहित्य में हो जाती है। साहित्य इतिहास की भूमिका भी निभाता है। परिसर जीवन की वास्तविकता आज शिक्षाशाष्ट्रियों के लिए एक सिरदर्द बनी हुई है। विश्वविद्यालयों के सभी स्तरों पर व्याप्त अनुशासनहीनता, मूल्यगत ह्रास, संवेदनात्मक स्तर पर इस यथार्त से साक्षात्कार उपन्यास ने ही किया है।

डॉ सत्यकेतु ने जनस्मृति में धूमिल भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में छात्रों का आन्दोलन और योगदान इस पुस्तक के माध्यम से जीवंत कर दिया है। परिसर जीवन की वास्तविकता को उपन्यास में देखने-परखने का यह पहला प्रयास है। प्राकथन में सत्यकेतु जी बताते हैं कि यह पुस्तक उनके शोधप्रबंध 'हिन्दी उपन्यास में विश्वविद्यालय परिसर जीवन का अंकन' विश्लेष्णात्मक अध्ययन पर आधारित और पूर्व में प्रकाशित 'हिन्दी उपन्यास और परिसर जीवन' का विस्तारित और परिष्कृत रूप हैं।

नई किताब प्रकाशन से प्रकाशित 325 वाले इस पुस्तक में नौ अध्याय (चैप्टर्स) हैं। प्राकथन और सिन्हालोकन भी मिलाये तो ग्यारह हो जाते हैं। अंत में सन्दर्भ ग्रन्थ की लंबी सूचि है। नौ अध्याय काफी कुछ समेटते हैं। विभिन्न कालखंडों को उठाया है।अध्यायों के शीर्षक इस प्रकार हैं: विश्वविद्यालय परिसर जीवन की पृष्ठभूमि; हिन्दी उपन्यास का आरम्भ: परिसर जीवन की अनुगूँज; परिसर जीवन के प्रति उदासीनता; स्वतंत्रता-प्राप्ति के पूर्ववर्ती दशक के उपन्यास;परिसर जीवन की प्रकति; स्वतंत्रता के बीस वर्ष (1947-1967) उपन्यास और परिसर जीवन, परिसर जीवन में विस्फोट और हिन्दी उपन्यास; परिसर जीवन की विकृतियाँ; 20वीं सदी का अंतिम दशक और हिन्दी उपन्यासों में चित्रित परिसर-जीवन, 21वीं सदी का अंतिम दशक और हिन्दी उपन्यासों में चित्रित परिसर-जीवन। अंत में सिन्हालोकन और सन्दर्भ ग्रन्थ की सूची है।

प्रथम अध्याय - विश्वविद्यालीय परिसर जीवन की पृष्ठभूमि
इस अध्याय में इतिहास बयाँ है किहिन्दुस्तान में विश्वविद्यालय और महाविद्यालय शने:- शने: कैसे स्थापित हुए, विकसित हुए, और उनमें क्या बदलाव आये।इस अध्याय के तहत डॉ सत्यकेतु ने विविध बिन्दुओं पर प्रकाश डाला है।कुल मिला कर 16 उपविषय हैं जो वर्ण 'क' से शुरू होकर 'त'तक हैं। क, ख, ग, घ, ड वर्णमाला जो भूल गए हैं, वह भी विकसित होती है। यह इस अध्याय का बायप्रोडक्ट है।

पहला उपविषय, क - 'परिसर की शुरुआत 1781से 1919,' इस बिंदु से उन्होंने शुरुआत की है।भारत में परिसर जीवन का इतिहास बहुत पुराना है। ऋषियों के आश्रम, तक्षशीला गुरुकुल, नालंदा महाविहार आदि हैं।मगर आधुनिक काल में भारत में उच्चतर शिक्षा का आरम्भ ब्रिटिश शासन से शुरू हुआ। कुछ शिक्षाशाष्त्री उच्चतर शिक्षा का आरम्भ 1781 से मानते हैं जब प्रबुद्ध मुसलमानों के अनुरोध पर गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने कलकत्ता मदरसे की स्थापना की थी।तत्पश्चात अन्य शहरों - आगरा, दिल्ली, लखनऊ, अजमेर आदि में मदरसों की स्थापना हुई।

राजा राममोहन राय और डेविड हेयर के प्रयत्नों से 1781 में कलकत्ता में हिन्दू कालेज की स्थापना हुई। तत्पश्चात समय के अंतराल में कैसे भारतवर्ष के भिन्न भिन्न प्रान्तों और शहरों में शिक्षा केंद्र खुले, विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई, इसका विवरण सत्यकेतु जी ने सन एवं वर्ष के साथ विस्तार से लिया है।. कलकता का महत्व पता चलता है।मुसलमान शाशकों ने मदरसे यहाँ से शुरू किये तो हिन्दू कालेज भी सबसे पहले यहीं से शुरू हुए। इनमें अंगरेजी भाषा का प्रभुत्व था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद परिसर विकास कैसे हुआ इसकी भी बड़ी गूढ़ जानकारी मिलती है।

उपविषय ख - 'राजभक्ति और अधिकारों की मांग का दौर 1848-1904'के तहत सत्यकेतु जी उल्लेख करते हैं कि विश्वविद्यालयों की स्थापना से छात्रों को सीधा लाभ हुआ, समाज में एक बुद्धिजीवी वर्ग उपजा।भारत में पाश्चात्य ढंग की उच्च शिक्षा के आरम्भ से छात्रों में जागरूकता की चेतना जन्म लेने लगी। इस समय के छात्र न केवल सामाजिक समस्याओं पर बहस करते थे, बल्कि महान समाज सुधारक राजा राममोहन राय, देवेन्द्रनाथ ठाकुर,ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, विवेकानन्द, आदि द्वारा चलाए गये सुधार के आंदोलनों में हिस्सा लेते थे। इस अध्याय में सत्यकेतु जी ने जिन अन्य बिन्दुओं पर प्रकाश डाला है, वे इस प्रकार हैं - राजनीति गतिशीलता और परिसर का विक्षोब, तूफ़ान से पहले की खामोशी, स्वतंत्रता प्राप्ति और परिसर का विस्तार, परिसर में तूफ़ान, जिगर के टुकड़े, इंदिरा गांधी को चुनौती, आपातकाल और उसकी प्रतिक्रिया, भारतीय छात्र आन्दोलन का स्वरूप और उसका कारण, 1990 के बाद विश्वविद्यालय परिसर का बदलता स्वरूप और उसका विकास, परिसर में रैंगिग का बिगड़ता स्वरूप, आदि।

कई महान हस्तियों के नाम और उनके योगदान का उल्ल्रेख है - दयानन्द सरस्वती, बंकिमचन्द्र चटर्जी, स्वामी विवेकानन्द, बाल गंगाधर तिलक, राजेन्द्र प्रसाद, राजा राममोहन राय, पंडित मदनमोहन मालवीय, आशुतोष बनर्जी, अमरनाथ झा, लाला लाजपत राय, महात्मा गांधी जी आदि, सभी भूल-बिसरे राजनेताओं और समाज सुधारकों का डॉ सत्यकेतु ने हमें स्मरण करवा दिया। स्वत्रंता प्राप्ति के बाद उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व विकास हुआ।विश्वविद्यालयों में छात्रों की संख्या में अत्यधिक वृद्धि हुई।सन साठ से राजनेताओं और शिक्षाशाष्ट्रियों ने छात्रों को सलाह देनी शुरू की कि वे राजनीति में सक्रीय भाग न ले। उनकी वैचारिक प्रखरता को महत्व दिया जाएगा। निराशाजनक स्थिति यह भी हुई की शिक्षक और छात्रों में घालमेल शुरू हुआ। शिक्षकों का सम्मान कम हुआ और छात्रों का विश्वास कम हुआ। मेरी समझ से यह एक वैश्विक समस्या है, सिर्फ भारत के शैक्षिक संस्थानों तक सीमित नहीं हैं।विश्व के लगभग सभी शैक्षिक संस्थानों में छात्रों और शिक्षकों के स्नेहमय, आत्मिक सम्बन्ध में परिवर्तन आ रहें हैं। छात्र अपने अध्यापकों को समुचित सम्मान नहीं दे रहें हैं। शिक्षक भी स्वार्थी और क्रूर बन रहें हैं।

दूसरे अध्याय - 'हिन्दी उपन्यास का आरम्भ : परिसर जीवन की अनुगूँज'
दूसरे अध्याय - 'हिन्दी उपन्यास का आरम्भ : परिसर जीवन की अनुगूँज' में हिन्दी साहित्य में उपन्यास विधा के इतिहास के बारे में पता चलता है कि कैसे उपन्यास अस्तित्व में आये।विदेश के परिचलन - नावेलसे आये।यह भी पता चला कि बंगला में उपन्यास, यानी नावेल हिन्दी से पहले आकार ले चुका था, विशेषकर बंकिमचन्द्र चटर्जी की कृति से।मुझे यहाँ गल्प लेखन-कला का ध्यान आ गया। सामान्यतः गल्प साहित्य में उपन्यास,कहानी,नाटक, कविताएं और व्यंग आदि माने जाते हैं।विगत में जो चौपालीय गप्प होती थी वह गल्प में बदल गया। बंगाल से यह शुरू हुआ था, और इसी ने आगे चल कर उपन्यास का रूप धारण किया।

हिन्दी उपन्यास का आरम्भ 1870 गोरीद्त्त की कहानी 'देवरानी जिठानी' से हुआ। हिन्दी में प्रथम बार 1875 में भारतेंदू हरिश्चंद उपन्यास पद का प्रयोग नावेल में किया गया। विभिन्न कालखंडों में विभिन उपन्यासकारों और उनकी कृतियों से पाठक रूबरू होते हैं- बालचन्द्रनभट्ट, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, किशोरीलाल गोस्वामी, गोपाल राय, आदि। उपन्यास सम्राट की उपाधि से विभूषित मुंशी प्रेमचन्द ऊर्दू से हिन्दी में शिफ्ट करके हिन्दी कहानियों और उपन्यासों में एक नया मोड़ लाये। उन्होंने कल्पना लोक से निकल कर जीवन के यर्थात पर लिखा। मगर उनके उपन्यासों में परिसर जीवन अछूता रह गया। प्रेमचन्द को विश्वविद्यालय जीवन का कोई अनुभव नहीं था इसलिए वे इसे अपने उपन्यासों में नहीं उतार पाए। परिसर जीवन के प्रति उनकी उदासीनता रही।

अध्याय - 'स्वतंत्रता-प्राप्ति के पूर्ववर्ती दशक के उपन्यास: परिसर जीवन की प्रकति', 'स्वतंत्रता के बीस वर्ष (1947-1967) उपन्यास और परिसर जीवन','परिसर जीवन में विस्फोट और हिन्दी उपन्यास','परिसर जीवन की विकृतियाँ'के जरिये पाठकों को पता चलता है कि प्रेमचन्द के साथ एक युग का समाप्त होता है। इसके साथ ही परिसर जीवन में देश की आजादी के प्रश्नों को लेकर एक नई चेतना जन्म लेती है। उपन्यासकारों की एक नई पीढ़ी सामने आती है जो अपनी सामाजिक जागरूकता और शिल्प-विषयक सजकता के द्वारा हिन्दी के उपन्यास को समृद्ध करती है। पाठक उस दौर के उपन्यासकारों के नामों से रूबरू होते हैं - जैनेन्द्र कुमार, अज्ञेय, हजारी प्रसाद द्विवेदी, इन्द्रचन्द जोशी, भगवती चरण वर्मा, यशपाल, उपेन्द्रनाथ अश्क, राहुल सांकृत्यायन, आदि। इन सभी उपन्यासकारों में परिसर-जीवन को सार्थक रूप से अज्ञेय ने 1940 में प्रकाशित अपने उपन्यास, प्रथम भाग 'शेखर: एक जीवनी' में किया है।

पाठकों को परिसर जीवन में उथल-पुथल, अव्यवस्था, भ्रष्टाचार, राजनितिक हस्तक्षेप और अपनी चरम सीमा पर पहुंची अराजकता का पता चलता है, जिसके अंकन में उपन्यासकार भी पीछे नहीं हटते। पाठकों का उस दौर के कई उपन्यासों से रूबरू होते हैं- शिवप्रसाद सिंह का उपन्यास, 'गली आगे मुड़ती है,' देवेश ठाकुर के उपन्यास, कांच का घर और गुरुकुल आदि से।

अंतिम दो अध्याय 20वीं सदी के अंतिम दशक और 21वीं सदी के अंतिम दशक में प्रकाशितहिन्दी उपन्यासों में परिसर जीवन की व्यापकता को बताते हैं।

अध्याय - '20वीं सदी का अंतिम दशक और हिन्दी उपन्यासों में चित्रित परिसर- जीवन'में सत्यकेतु जी ने उन लेखकों के उपन्यासों को वर्णित किया है जिन्होंने परिसर जीवन के भिन्न भिन्न पहलुओं पर लिखा है। जैसे गिरिराज किशोर जी ने 1997 में प्रकाशित अपने उपन्यास 'यातना घर' तकनीकी शिक्षा संस्थानों के भीतर चलने वाली राजनीति और गुटबाजी को चित्रित किया है।

1998 में ऊषा यादव द्वारा रचित 'कितने नीलकंठ' शिक्षा संस्थानों में व्याप्त भ्रष्टाचार पर केन्द्रित है।कैसे ज्ञान के मन्दिर से विशुद्ध व्यावसायिक केंद्र बन गये हैं।

अध्याय - '21वीं सदी का अंतिम दशक और हिन्दी उपन्यासों में चित्रित परिसर- जीवन'में वर्ष 2000 बाद के कई उपन्यासकारों की जानकारी मिलती हैं जिन्होंने अपनी कृतियों में विश्वविद्याली परिसर जीवन को उकेरा है।

2001 में उदय प्रकाश की 'पीली छतरी वाली लडकी' विश्वविद्यालय परिसर के विभागों में जातिवाद एवं नस्लवाद पर आधारित है।2002 में के. एल. कमल 'कैम्पस' अध्यापक एवं छात्र संघ की राजनीति।

2006 में महुआ मांझी की पुस्तक 'मैं बोरिसाइल्ला' में 1948 से 1971 बंगलादेश मुक्ति संग्राम में ढाका विश्वविद्यालय की भूमिका. विश्वविद्यालय में स्वतंत्रता की धधकती ज्वाला दिखाई है।

2011 में प्रकाशित मनोज सिंह की 'हॉस्टल के पन्नों से'तकनीकी संस्थाओं में छात्रों की बदलती तसवीर को मूल्यांकित करती है।

पाठकका तमाम उपन्यासकारों - श्रीलाल शुक्ल, काशीनाथ सिंह, शिव प्रसाद मिश्र, देवेश ठाकुर, विवेकी राय, सूर्यबाला, रामदरश सिंह, महुआ मांझी, गिरिराज किशोर, उदय प्रकाश, निखिल सचान, देवेश ठाकुर, श्रवण कुमार गोस्वामी, मनोज सिंह, आदि से साक्षात्कार होता है जिन्होंने परिसर जीवन के बहुमुखी यर्थात को संवेदनात्मक स्तर पर अपनी कृतियों में पिरोया है।डॉसत्यकेतु लिखते हैं - इनके उपन्यासों में न केवल छात्रों की दिशाहीनता, लक्ष्यहीनता, मूल्यगत ह्रास, चरित्र चरित्रभ्रष्टता का अंकन किया गया है। साथ ही शिक्षकों, विभागाध्यक्षों, प्राचार्यों, कुलपतियों, कर्मचारियों में व्याप्त मूल्यहीनता आचरणभ्रष्टताऔर उत्तरदायित्व शून्यता को भी अंकन किया है। परिसर जीवन से सम्बन्धित हर व्यक्ति छात्र, शिक्षक, अधिकारी समकालीन परिसर जीवन की भयावहता का सामना करता है मगर लगता है की समाधान किसी के पास भी नहीं है। सिन्हालोकनमें सत्यकेतु जी कहते हैं कि परिसर जीवन का यर्थात ऐसा रूप धारण कर चुका है जिसकी उपेक्षा सम्भव नहीं। वर्तमान समय में कमोबेश भारत के लगभग सभी राज्यों में परिसर जीवन एक संकट की स्थिति से गुजर रहा है। इस काल में उपन्यासों में परिसर जीवन के यथार्त अनेक रूपों में उद्घाटित हुए हैं। परिसर जीवन में छात्रों की दिशाहीनता और मूल्यहीनता, परिसर जीवन की विकृतियों से अवगत करवाते हैं। अंत में कहते हैं कि नब्बे के दशक से लेकर आज तक हिन्दी के जो उपन्यास लिखे गए हैं उनमें विश्वविद्यालीय परिसर जीवन के स्वरूप पर विस्तार से चर्चा हुई है। हिन्दी उपन्यासकारों ने परिसर जीवन के बदलते स्वरूप को जिस विविधता के साथ प्रस्तुत किया है वह ध्यानापक्षी है।

उद्देश्य
सत्यकेतु जी का इस पुस्तक को लिखने का उद्देश क्या रहा? इस पर मनन किया जाए तो कई बातें उभरती हैं।इसमें कोई दो राय नहीं की सत्यकेतु जी ने अथाह महासागर में डुबकी लगाई है। उन्होंने गहन अन्वेषण किया कि हिंदी उपन्यासों में विश्वविद्यालय परिसर जीवन को कितना दिखाया है, कितना नहीं दिखाया है, किन रूपों में दिखाया है और दिखाना क्यों महत्व रखता है।विद्या के केंद्र अगर मन्दिर हैं तो बाजार भी हैं, राजनीति के अखाड़े भी हैं।

निचौड़ यह है कि स्वत्रंता संग्राम में जितना छात्रों का आन्दोलन और योगदान रहा, वह उस सदी के उपन्यासों में नहीं आया है। पहले जो छात्रों में देशभक्ति और आत्मबलिदान की भावना थी उनका कैसे ह्रास हुआ, यह भी पुस्तक से व्यक्त होता है। शैक्षिक केंद और परिसर जीवन समाज को शारीरिक, मानसिक, समाजिक, आर्थिक, और मनोवैज्ञानिक स्तर पर प्रभावित करते हैं। छात्रों, शिक्षकों और अभिभावकों में जो बैचेनी उत्पन्न होती है, जो चुनौतियां उत्पन्न होती उन्हें कौन सुरक्षित रखेगा? भले ही सरकारी दस्तावेजों में सारी घटना आकड़ों में दर्ज रहती हैं, मगर परिसर जीवन से उपजी समस्याओं से जो पीड़ा समाज और जनजीवन को मिली है, उसका आकलन साहित्य ही बखूबी करता है। मानवीय, सामाजिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक, राजनीतिक कई पहलुओं को साहित्य समाज के सामने लाता है। साहित्य एक प्रमाणिक इतिहास तो नहीं है, मगर सत्य से एकदम वंचित भी नहीं है। कहा जाता है कि किसी काल, समाज, परिवेश या देश का सही चित्र यदि हम कही देख सकते है तो उसके लिए देश के साहित्य में झाँकना होगा। साहित्य अपने समय का प्रतिबिम्ब है। समाज का प्रहरी है।जहाँ इतिहास चुप हो जाता है, वहाँ साहित्य बोलता है।

शिक्षा और मानवीय मूल्यों में गहरा सम्बन्ध होता है। आज छात्रों का मूल्य बोध निरंतर कम होता जा रहा है। इसके कई कारण हैं।यह पुस्तक एक पूरा दृश्य प्रस्तुत करती है। कई पक्षों को स्पर्श करती है।मात्र परिसर जीवन ही नहीं समाज के कई प्रश्नों को सम्बोधित करती है। अगर परिसर जीवन नाकारात्मक हो जाए तो कितना विध्वंशकारी हो सकता है। छात्र देश का भविष्य और समाज की ऊर्जा है। जो अभी हाल के समय में कुछ विश्वविद्यालयों में छात्र अराजकता का स्वरूप देखने में आया, वे दिल को दहला देते हैं। वे छात्र आन्दोलन भी बरबस याद आ जाते हैं जो देश पर मरमिटे थे। इस पुस्तक ने मुझे चीनी छात्र-छात्राओं द्वारा 1989 को बीजिंग के थियानमेन चौक पर आजादी के लिए सरकार विराधी प्रदर्शन की भी याद दिला दी।डॉ सत्यकेतु सांकृत कहते हैं हिन्दी उपन्यास विश्वविद्यालय परिसर जीवन का साकारात्मक और नाकारात्मक, दोनों पक्ष प्रस्तुत करते हैं।

यह पुस्तक हमें सावधान भी करती है, चिन्तन को जन्म देती है।अंत में यही कहूँगी कि कहूँगी कि चाहे कितनी भी अराजकता हो आज भी अपने पेशे के प्रति समर्पित, छात्रों के जीवन-निर्माण को अपना उद्देश्य मानने वाले कर्तव्यनिष्ठ अध्यापक मौजूद हैं और गुरुओं का आदर करने वाले अच्छे, चरित्रवान छात्र भी मौजूद हैं। दुनिया का विकास यूं ही नहीं हो रहा है। यह पुस्तक निःसंदेह साहित्यकारों को परिसर-जीवन पर कहानी और उपन्यास लिखने के लिए प्रेरित करेगी। अपनी इस उत्कृष्ट कृति का सम्पादन डॉ सत्यकेतु को समय-समय पर, जैसे-जैसे परिसर जीवन पर उपन्यास आते रहेंगे, बार-बार करना पड़ेगा। सत्यकेतु जी को बहुत-बहुत बधाई और हार्दिक धन्यवाद इस विचारोत्तजक, विशिष्ट पुस्तक को लिखने के लिए।

संपर्क :
अर्चना पैन्यूली
Islevhusvej 72 B
2700 Bronshoj, Copenhagen
Denmark
Email: apainuly@gmail.com
  मोबाइल 098 146 58 098

इन खबरों को भी पढ़ें

पुस्तकें

Samsamyik Srijan
Samsamyik Srijan
Samsamyik Srijan
Samsamyik Srijan
Samsamyik Srijan
Samsamyik Srijan
lifetopacademy
campuscornernews

अब अपने मोबाइल पर samsamyik srijan अंग्रेजी में या समसामयिक सृजन हिंदी में टाइप करें और पढ़े हमारी वेबसाइट पर विभिन्न विधाओं में रचनाएं, साक्षात्कार साथ ही साहित्य, कला, संस्कृति, विमर्श, सिनेमा से जुड़े शानदार लेख। रचनाएं भी भेजें।