ISSN2320-5733

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सिनेमा सृजन नया सिनेमा : भाग एक डॉ. महेन्द्र प्रजापति

सिनेमा हमारी संस्कृति का हिस्सा है। हमारे जन-जीवन को अगर कोई कला व्यापक स्तर पर प्रभावित कर पायी तो वो भी सिनेमा है। सिनेमा के आरंभ से ही व्यावसायिक और अव्यावसायिक फिल्में बनती रही हैं। उन्हीं फिल्मों को दर्शकों और आलोचकों ने याद रखा जिन्होंने हमारी सांस्कृतिक चेतना को गहराई से प्रभावित किया। सिनेमा सिर्फ आनंद नहीं विचार भी है। सवाल यह है कि आप देखने के लिए किस तरह की फिल्में चुनते हैं-“फिल्मों का निर्माण भौतिक उत्पाद ही नहीं है, यह सांस्कृतिक उत्पाद भी है। इसके द्वारा लोगों तक आनंद ही संप्रेषित नहीं होता, विचार भी संप्रेषित होते हैं।” सिनेमा समाज को वैचारिक रूप से मजबूती भी प्रदान करता है। सबसे लोकप्रिय कला माध्यम के रूप में हम सिनेमा को देखते हैं। फिल्में समाज और समय का जीवंत दस्तावेज़ होती हैं। चरित्र प्रधान या किसी घटना पर बनी फिल्मों का निर्माण सामाजिक बदलाव की पूर्ति के उद्देश्य से किया जाता है।

नब्बे के बाद हिंदी सिनेमा में कई तरह के ग्रुप्स बने। कुछ लोगों के लिए सिनेमा सिर्फ व्यवसाय था, ये वे लोग थे जिन्हें सिनेमा बनाना अपनी पुरानी पीढ़ी से विरासत में मिला था। दूसरे वे लोग हैं, जिन्होंने लंबे संघर्ष के बाद अपना स्थान बनाया और वह एक ही तरह की फिल्में बनाकर पैसा कमाते हैं। रामगोपाल वर्मा, डेविड धवन, राजकुमार संतोषी, करण जौहर, आदित्य चोपड़ा जैसे निर्देशक इसी श्रेणी में आते हैं। तीसरे वे लोग हैं जिनके लिए सिनेमा एक आंदोलन है। वह सिनेमा से समाज को बदलना चाहते हैं। अनुराग कश्यप, तिग्मांशु धूलिया, दिवाकर बनर्जी, शुजीत सरकार, अनुराग बासु जैसे लोगों ने सिनेमा को ग्लोबल से लोकल बनाया लेकिन उन्हें ख्याति ग्लोबल मिली। इन फ़िल्मकारों ने ऐसे-ऐसे विषयों को उठाया जिससे अन्य लोगों को घिन आती थी। जो विषय तथाकथित सभ्य समाज के लिए अनफिट बैठते थे। नए लोगों ने प्रयोग किया और सफलता भी पायी-“भूमंडलीकरण के इस दौर में एक बार फिर यह वह समय है जब सिनेमा में समाज और जीवन की ज़मीनी खुरदुराहट उसे अधिक वास्तविक धरातल पर लाने में सफल हो सकते हैं। आज प्रयोग-धर्मियों के लिए संभावनाओं के अनंत द्वार खुले हुए हैं।” फिल्में पारंपरिक ढांचे से बाहर आकर नए ढंग से बनायी जा रही हैं। नए फ़िल्मकार नई भाषा और सुलभ तकनीकी द्वारा फिल्में बना रहे हैं।

नए विषयों पर बनी फिल्मों ने दर्शकों को भी आकर्षित किया। दिलवाले दुल्हनियाँ ले जाएंगे, हम आपके हैं कौन, सौदागर जैसी तमाम नंबर वन वाली फिल्मों का तिलिस्म टूट गया। हासिल, साहब बीबी और गुलाम, पीपली लाइव, मसान, सिटीलाइट, फ़ायर, पान सिंह तोमर, बैंडिट क्वीन जैसी खुरदरी विषयों वाली फिल्में पसंद की जाने लगीं। फिल्मी गीतों को भी चुनौती मिली। अनायास भर दिए गए गीतों से दर्शक ऊबने लगे लिहाज़ा फिल्मों का समय भी घटने लगा। तकनीकी ने फिल्म निर्माण को आसान बनाया। तकनीकी प्रयोग से फिल्में पहले से बेहतर बनने लगीं-“इस दौर का दर्शक ना सिर्फ सच देखना चाहता है बल्कि उसे स्वीकारने की क्षमता भी रखता है। दूसरी ओर फ़िल्में अब तकनीकी रूप से ज्यादा मजबूत हो गयी हैं। अभिनय और संगीत से अलग इस दौर में तकनीक पर ज्यादा ध्यान दिया गया। हालाँकि तकनीकी रूप से मजबूती इस दौर की फिल्मों की मजबूरी भी रही हिंदी सिनेमा अब भारतीय दर्शक तक सीमित नहीं रहा। हिंदी फ़िल्में पूरी दुनिया में एक साथ रिलीज़ हो रही हैं।” फिल्में दर्शकों की रुचि पर भी निर्भर करती हैं। अनुवाद और डबिंग के कारण फिल्मों के दर्शकों की संख्या बढ़ी है। एक भाषा की बनी फिल्म को दूसरी भाषा के लोग देखते हैं तो उन्हें उस भाषा और समाज का पता भी चलता है।

भाषा के बदलने के साथ तकनीकी का बदलना भी दर्ज़ होना चाहिए। इधर की फिल्मों में हुए तकनीकी बदलाव ने सिनेमा को प्रभावी बनाया है। हालांकि यथार्थवादी सिनेमा के पक्ष में खड़े आलोचक तकनीकी को बहुत महत्व नहीं देते हैं। उनके लिए तकनीकी से अधिक आवश्यक फिल्म की विषय-वस्तु और उसकी भाषा है। आज के दौर का सिनेमा तकनीकी के माध्यम से भाषा की सीमाओं पर विजय प्राप्त कर रहा है, जो पहले संभव नहीं था। लेकिन यह भी ध्यान देने वाली बात है कि सिनेमा पर तकनीकी का प्रभाव इस कदर भी न हो कि उसकी मूल संवेदना ही खत्म हो जाए। निर्देशकों को तकनीक की सीमाओं को समझना भी होगा- “इसलिए चुनौती यह है कि आधुनिक तकनीक की बारीकी व गति का कला की गहनता के साथ कैसे मेल बैठाया जाये! आधुनिक तकनीकी उन सारी बारीकियों को पकड़ लेती है, जिसकी कल्पना भी पहले के फिल्मकार नहीं कर सकते थे।” नए निर्देशक इस तकनीकी को समझते हैं और उसका प्रयोग उतना ही करते हैं जितनी फिल्म की मांग हैं। आज जब बी.ए.पास, विक्की डोनर, मसान जैसी फिल्में बन रही हैं तो इसमें तकनीकी पर निर्भर नहीं रहा जा सकता है क्योंकि इनकी विषय-वस्तु ही इन फिल्मों की जान है- “आज तकनीकी का लोकतंत्र है इन दिनों बेहद प्रतिभाशाली,समझदार और ईमानदार लोग नयेपन और किस्सागो की स्टाइल में फिल्म निर्माण की दुनिया में आये हैं। आज देश की आम जनता की धड़कन गूंज रही है। कम बजट के भीतर निर्मित इन फिल्मों ने बड़े बजट की फिल्मों का प्रतिरोध करने का साहस दिखाया है।” कम बजट की फिल्मों ने गाँव-कस्बों में रहने वालों के बीच यह विश्वास दिलाया है कि वह भी फिल्म बना सकते हैं।

इक्कीसवीं सदी के आरंभिक समय में भ्रष्टाचार, राजनीति, बलात्कार, घूसखोरी, अपहरण जैसे विषयों के निदान पर फिल्मं बननी आरंभ हुईं। पहले यह विषय फिल्मों की समस्या हुआ करते थे। इसी दौर में सिनेमा में उन वर्गों पर सकारात्मक फिल्में बननी शुरू हुईं जिन्हें पर्दे पर हमेशा खलनायक की भूमिका में दिखाया जाता था। अमिताभ बच्चन, अजय देवगन, अक्षय कुमार, सुनील सेट्टी जैसे लोगों ने पुलिस के प्रति सकारात्मक भाव अपनाया। राजनीति में उन चरित्रों को उभारा जिनसे समाज को प्रेरणा मिल सके। यह समय परिवर्तन का है, जिसमें बासीपन नहीं चलेगा। यही कारण है कि महानायक को लाल बादशाह, मेजर साहब, मृत्युदाता जैसी एक्शन और एंग्री यंग छवि वाली भूमिकाओं की फिल्मों को छोड़कर विरोध, पा, ब्लैक, निशब्द, शामिताभ, पिंक, पीकू, बदला जैसी फिल्मों को चुनना पड़ा। शाहरुख खान वर्षों से एक सफल फिल्म की राह इसलिए देख रहे हैं क्योंकि उन्होंने अभी तक खुद को बदला नहीं है। वर्तमान सिनेमा की पृष्ठभूमि नए भावबोध के साथ सामने आ रही है- “इक्कीसवी सदी के पहले दशक में उन मुद्दों को भी सिनेमा में उतारा गया जो सुर्ख़ियों में रहे राजनीति और राजनेताओं का आचरण, आरक्षण आन्दोलन, पुलिस की कर्तव्यनिष्ठा, भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को प्रमुखता से फिल्माया गया। समाज में जो घट रहा है, फिल्मों में दिखने लगा।” जनता की जागरूकता ने निर्देशकों को इस दौर में अर्थपूर्ण फिल्में बनाने के लिए विवश किया। राजनीति और भ्रष्टाचार जैसी मुद्दों पर बहसें शुरू हुईं जो सिनेमा का हिस्सा बनी।

इस समय सिर्फ सिनेमा की विषय-वस्तु नहीं बदली है बल्कि बनाने का अंदाज़ भी बदला है। लोग इस क्ष्रेत्र में ईमानदारी से आ रहे हैं। कम बजट की फिल्में तेजी से बन रही हैं। पूंजी लगाने वाले वे लोग हैं जिनके लिए सिनेमा सामाजिक परिवर्तन का जरिया है। कम बजट में भी पहले की अपेक्षा पैसा अधिक लगता है लेकिन वह पैसा सामूहिकता से आता है। सोशल मीडिया ने इस कड़ी में सार्थक भूमिका निभाई है। सोशल नेटवर्किंग से पैसा जोड़कर फिल्में बनायी गईं। लोगों ने रुचि भी दिखाई। पैसा लगाकर पैसा कमाना कोई बुरा भी नहीं है लेकिन फिल्म जीवन सत्य दिखाने का साहस करे-“सिनेमा की पूरी यात्रा पर नजर डाले तो साफ़ पता चलता है हर दशक के साथ न सिर्फ सिनेमा का रूप-स्वरुप बदलता रहा है बल्कि तेवर और सरोकार भी बदलते रहे हैं। सिनेमा पर आठवें और नौवें दशक के दौरान अंडरवर्ल्ड से सम्बन्ध और उसकी पूंजी के इस्तेमाल के आरोप भी लगते रहे हैं। सच तो यह है कि सिनेमा की शुरुआत में फिल्मों के निर्माण में कम पूंजी और अधिक समय लगता था।” इन सब बातों के साथ एक सच यह भी है कि सिनेमा इस दौर में पैसा कमाने का सबसे बड़ा माध्यम बना। फिल्मों के अधिकार बेचने के कई स्रोत विकसित हुए। बड़ी कंपनियाँ फिल्मों में पैसा निवेश करने आयीं। उदारीकरण के कारण यह संभव हुआ कि विदेशी निर्माताओं ने अपना पैसा लगाना शुरू किया और हस्तक्षेप भी शुरू किया। उनके हिसाब से विषय-वस्तु और भाषा में बदलाव हुआ। कलाओं के व्यापार में विदेशी संपत्ति शेयर के रूप में लगाई गई जिसके कारण बहुत सारी फिल्में ऐसी बनी जो भारतीय सांस्कृतिक चेतना के अनुकूल नहीं थी। वह हमारी भाषा और संस्कृति पर प्रहार थी। इससे सिनेमा में भारतीयता का प्रभाव कम हुआ। ऐसा इसलिए भी हुआ क्योंकि हम बेहतर फिल्म बनाने से ज्यादा ऐसी फिल्मों के निर्माण में व्यस्त हो गए जिससे विश्वस्तर पर ख्याति मिल सके- “चार दशक से ज्यादा अवधि में जिस राष्ट्रीय राजनीतिक, सामाजिक संस्कृति की रचना हुई थी, एक ही पल में उसकी बागडोर ऐसे हाथों में चली गयी जो शुद्ध रूप से भारतीय हाथ नहीं थे। यह भारत के ग्लोबलाइजेशन यानि भूमण्डलीकरण की शुरुआत थी।” परदेश,दिलवाले दुल्हनियाँ ले जाएँगे, कभी खुशी कभी गम जैसी बड़ी बजट की फिल्मों में भारतीय संस्कृति का भावनात्मक प्रयोग कर प्रवासी भारतीयों को आकर्षित करने का कार्य किया।

युवा पीढ़ी हिंदी सिनेमा के केंद्र में रही। सिनेमा की कहानी में भी और देखने वालों में भी। चूंकि फ़िल्मकार इस सच्चाई से अवगत हैं इसलिए उन्होंने युवाओं के प्रति ईमानदारी बरती। आज जो लोग फिल्में बना रहे हैं उनके केंद्र में भी युवा पीढ़ी है। युवा, थ्री इडियट्स, रंग दे बसंती, स्टूडेंट ऑफ द ईयर, दिल दोस्ती एक्सट्रा आदि फिल्में युवा मन को छूने वाली हैं। युवाओं को केन्द्रित कर हर वर्ष दर्जनों फिल्मों का निर्माण होता है। आने वाले समय में सिनेमा युवाओं के लिए कुछ बेहतर ही करेगा-“सिनेमा युवा जीवन के मुद्दों एवं समस्याओं को लेकर बेहद ईमानदार भूमिका निभाता रहा है। युवा हिंदी सिनेमा ने अपनी व्यावसयिक समस्याओं और सीमाओं के बावजूद लोकपक्षधरता एवं सार्थकता से समझौता नहीं किया है, भारत में सबसे ज्यादा युवा आबादी है एवं सबसे ज्यादा साल में फ़िल्में बनती हैं। उम्मीद है, युवा वर्ग सिनेमा के क्षेत्र में परती जमीन को उर्वर बनायेगा।” फिल्में कभी एक जैसी निर्मित नहीं हो सकती हैं। हिंदी फिल्म उद्योग बहुत बड़ा है। यहाँ विभिन्न भाषाओं, परिवेशों से लोग आते हैं और अपने ढंग से काम करते हैं। यह जरूर है कि नई पीढ़ी पर उम्मीद किया जाना चाहिए। वही बेहतर सिनेमा बना पाएगी। उसके पास नई दृष्टि और काम करने का नया ढंग है।

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