ISSN2320-5733

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साक्षात्कार कविता और रंगमंच के संबंधों और प्रस्तुतिकरण की प्रक्रिया पर अंकिता चौहान द्वारा किया गया साक्षात्कार सुमन कुमार

कविता और रंगमंच के संबंध को आप कैसे देखते है?
हमारे यहां तो भारतीय और रंगमंच की धारणा ही है कि दृश्य काव्य या चाक्षुष काव्य। चाक्षुष यज्ञ के रूप में उसको स्वीकृति मिली है। काव्य अपने जीवन के अनुभवों को, अपने आसपास को, अपने परिवेश को, अपने इतिहास हो, संबंधों को व्यक्त करने की सबसे बेहतरीन अभिव्यक्ति है। जो हमारे ज्ञान को आगे ले और हमारी समझ, हमारे अनुभव को आगे ले जाती है और सहज ढंग से आगे ले जाती है निब( करती है यानी एक अमूर्त अनुभव होता है इंसान को उसे मूर्त रूप में या सूत्रबद्ध करने का तरीका जो है, वो काव्य है।

काव्य ऐसा गठन है शब्दों का या वह गठन हैं जिसमें अनुभव का विराट छिपा रहता है। तो इसलिए काव्य जो है रस की निस्पत्ति करता है। ये सीधा-सीधा सूखा नहीं होता। ये अभिव्यक्ति की जो प्रदर्शनकारी कलाएं हैं वो बहुत थोड़े शब्दों में बहुत बड़ी बातें कहती हैं। विष्णु का जो विराट रूप है, कहते हैं कि मुंह खोलता है तो ब्रह्माण्ड दिखता है तो वही कविता के साथ है। कविता विष्णु की जगह है। जहां आप कविता के अंदर प्रवेश करेंगे तो बहुत बड़ा फलक दिखेगा, बहुत बड़ा परिप्रेक्ष्य दिखेगा तो काव्य के साथ आप पूरे विश्व की जितनी भी संस्कृतियां देखें तो वो आरंभ में आदमी ने लय के साथ शब्दों को बांधा तो जब भाषा की शुरूआत हुई भाषा आगे बढ़ी तो कविता ही थी तो हर चीज़ को कविता ही होना था, हमारी जिंदगी को भी। हम एक कविता की तरह ही, ये एक शरीर है पर इस शरीर की आप व्याख्या करने लगिए तो ये अनंत है। तो हम यहां से शुरूआत करते हैं। कविता भी ऐसा ही है शब्दों का एक शरीर है छोटा सा कि जहां से हम अनंत की ओर यात्रा करते हैं। नाटक भी यही करता है वह शुरू करता है और शब्द के माध्यम से और अनुभव के माध्यम से जो अनुभव सृजित करता है इस माध्यम से ये वह बहुत विराट की तरफ ले जाता है। तो वे होना ही है। रंगमंच को कविता के रूप में तब्दील होना ही है। लोगों ने बाद में कोशिश की लेकिन अन्ततः हर आदमी के दिल में एक लय है, एक धड़कता हुआ हृदय है तो ये तो मानी हुई बात है कि इसे कविता के करीब बैठना ही है। ये हम जो इतनी पुरानी परंपरा से चले आ रहे हैं वो सब चीजें सूत्रब( करके लिखी गई क्योंकि ज्ञान को आगे ले जाने का सबसे बेहतरीन तरीका यही है कि हम उसको कविता में पिरो दे। बाद में आधुनिक इसमें हम जो आते आते इसमें कविता की लय अंदर चली गई और शब्द जो है उसके बाद यहां साइलेंस भी, चुप्पी भी भाषा में तब्दील हो गई। वो हमेशा रही है तब वो पूरे लय के साथ या कहें शाब्दिक लय या उसके ध्वनि की जो लय थी उसको भी हम बरकरार रखते हैं यहां ध्वनि की लय जो है अंतरध्वनि की लय वो भी शामिल हुई है क्योंकि जो मुक्तछंद कविता है तो हम आज जब बैठते हैं तो दरअसल हम जब शब्द बनते हैं या कहानी बनते हैं या कथा बनते हैं।

जिसको हम बातचीत कहते हैं। संवाद कहते हैं। उसमें अन्तरध्वनि जो है वो लय क्रिएट करती है। तो कविता तो होती ही है ऐसा नहीं है कि जिंदगी में कविता नहीं है, ये होना निश्चित है। इस निश्चितता की वजह से, जैसे जब मैंने ये बात समझी तो मुझे लगा कि मेरा रूझान है और मुझे लगता है जो आदि चीज है या जो आधारभूत अनुभव है तो कविता ही है जो इस की सृष्टि करती है और लोगों को प्रेरित करती है। जोड़ती है जैसे मां लोरी से जुड़ती है तो एक तरह से कहें कि ये मातृ लय है। कविता होना इसका मातृ तत्त्व है। इस तत्त्व के सहारे रंगमंच की सृष्टि होती है। मेरा आकर्षण भी है या इसी वजह से मैं बार-बार कविता की तरफ लौटना चाहता हूं। चाहता हूं कि जो रंगमंच सृजित करूं उसमें काव्यात्मक अनुभव हो। तो काव्य जिन चीजां का नाम है वो रंगमंच के अभिन्न तत्त्व है। काव्य लय का नाम है, शब्दों के संगठन के सम्मुच्य का नाम है समन्वय का नाम है जिनसे झलकता है। किसी से भी पूछे तो मुझे नहीं लगता कि कोई आपको ये जवाब देगा कि रंगमंच कविता से अलग है। ये जरूर कहेगा कि ऊपरी तौर पर दिखाई नहीं दे रहा पर ये अनुभव तो कविता ही करेगें। तभी आपको रस की सृष्टि होगी और सौंदर्य की अनुभूति होगी। वरना रंगमंच का सौन्दर्य बोध गायब हो जाएगा। सुन्दरता गायब हो जाएगी।

रंगमंच के लिए कविता में क्या होना बहुत आवश्यक है?
देखिए, कविता में रंगमंच के लिए आप समझिए दोनों एक दूसरे के पूरक है। कविता में पहले से सबकुछ होता है जो रंगमंच में है। रंगमंच में थोड़ा सा स्पेस जो है वो अभिनेता की अपनी दक्षता के लिए होता है। यानी कि इमोट करने के लिए, भाव सृजित करने के लिए ये स्पेस होना चाहिए। कविता कई बार सिर्पफ विचार के स्तर पर चलती है लेकिन रंगमंच जो है भावात्मक विचार होता है। उसका अपना लगाव होगा उसके अपने बारे में व्यक्तिगत अनुभव होंगे। विचार भी एक हिस्सा है। जिस तरह से मनुष्य है तो मनुष्य सब चीजों से भरा पड़ा है। जितनी भी विधाएं हैं जितनी भी लय हैं वो सब एक मनुष्य में हैं तो कविता उसको अलग-अलग खानों में भी व्यक्त कर सकती है। अलग-अलग तरह से पहचानी जा सकती है। चूंकि मनुष्य उन सबसे सृजित हुआ और बहुत कॉम्पलीकेटिड प्राणी है और जितनी जटिल कविताएं हैं वो रंगमंच के लिए आकर्षण बिंदु है क्योंकि उसमें उसके बिंब खुलते हैं, कलाकार के लिए स्पेस होता है तो रंगमंच वालों को वो कविता आकर्षित करती है जहां चरित्र होता है। कई बार चरित्र सीधे-सीधे नाम के रूप में नहीं होता संज्ञा सर्वनाम नहीं होता सिर्पफ विशेषण के रूप में होता है। रंगमंच सब चीज़ों को चरित्र में तब्दील कर देता है। चाहे वह कुर्सी हो, टेबल हो, देवता हो, मनुष्य हो, प्राणी हो कुछ भी हो सब इसलिए जिस कविता में चरित्र एक झलकेगा। जिस कविता में भाव की सृष्टि होगी, भाव का उद्रेक होगा, जिस कविता में बिंब दिखेगा, जिस कविता में मनुष्य का कुछ सरोकार होगा, जिस कविता में समकालीनता से जुड़ने का आधार होगा वो कविताएं रंगमंच को आकर्षित करती हैं। रंगप्रेमियों या रंग सृजन करने वालों को आकर्षित करती हैं तो कविता में ये तत्त्व होते हैं। किसी में कम होते हैं, किसी में छोटे होते हैं और किसी भाव के लिए हमें थोड़ा सा आधार चाहिए होता है और वक्फा भी चाहिए उत्तेज भी चाहिए। कविता जो है चार पंक्तियों में अपना काम पूरा कर जाएगी लेकिन अभिनय करने के लिए जो है छोटा सा मुश्किल होगा हालांकि विश्व के बड़े नामी-गिरामी नॉवेल प्राइज़ मिले लेखक सेमल बैकेट उन्होंने तो कविता लिखी वो कुछ सेकंड्स में होने वाला नाटक है। ऐसा सोच सकता है कोई आदमी कि लेकिन कविता तो सोचती है कि मैं पांच सेकंड में अपनी बात कह दूंगी लेकिन रंगमंच थोड़ा सा चाहता है कि वो शुरू करे और आपको यात्रा पर ले जाए। ये एक तीर्थ यात्रा की तरह है जो कि एक उद्देश्य से शुरू होती है कि वहां पहुंचना है तो रंगमंच हमेशा ये कहता है कि वहाँ पहुंचने के लिए यात्रा शुरू करता है तो जहां भी एक यात्रा है, जिस कविता में भी ये यात्रा होगी वो कविता रंगमंच के लिए बड़ी मुफिद होगी। तो जहां चरित्र है वहां और भी अच्छा है।

जैसा आपने कहा कि जटिल कविता रंगमंच को आकर्षित करती है तो जैसे आपने मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ का सफल मंचन किया है। इतनी जटिल कविता का रंगमंचीय प्रदर्शन करना किस तरह की चुनौती देता है?
निश्चित रूप से चुनौती है। सृजक जो होता है वो चुनौती ही पसंद करता है। सृजना ये नहीं है कि सब चीजों को उठाकर रख दिया। घर बनाना है तो और भी चीजें बनाओं तो वो क्राफ्रटमैन शिफ्रट होती है। कुर्सी बनाना अलग बात है। कविता में जो चीज़ होगी उसको हम कैसे रंगमंच के लिए प्रस्तुत करेंगे उसमें से क्या निकालेंगे तो एक तरीका मैं अपनाता हूं जैसे मुक्तिबोध का आपने नाम लिया ‘अंधेरे में’। मेरे सामने था कि इसको कैसे प्रस्तुत करें। ये तो एक आदमी का आत्मकथन है जो उससे गुजर रहा है ‘आशंका के द्वीप अंधेरे में’ पहले उसका नाम था बाद में सिर्फ ‘अंधेरे में’ उन्होंने दिया। तो एक आशंकित मनोमस्तिष्क की उपज है वो कविता। जिसमें वो देख पा रहा है एक मानव का बड़ा सरोकार, मानव के पूरे नेता की तलाश कर रहा है या उस मूमेंट की तलाश कर रहा है जहां वो शामिल हो पाए बड़े समुदाय से, बडे़ विरोध से तो अब इसमें मेरे सामने सवाल था कि इसको मैं रंगमंच तक कैसे पहुंचा तब मुझे लगा रंगमंच तो वो कला है जो मानने से शुरू हो जाती है। ज्यों ही हम मानते हैं कि मैं पानी में खड़ा हूँ तो यहां से मेरा अभिनय शुरू हो जाता है। ये रंगमंच का तरीका है क्योंकि रंगमंच में हर- दूसरा कुछ आपको होना है। आप जो हैं वो नहीं होना है। आप जो है वो उसके स्त्रोत होंगे, उसका आधार होगा। लेकिन आपको होना वो है जो आप नहीं हैं। आप रंगमंच में आए हैं तो ये तय है। ज्यों ही आप आए आप अपने को बाहर रखो और दूसरे को अपनाओ-ये एक बहुत बड़ा काम है। इसको पवित्र काम भी कहते हैं। लोग अपने शरीर को छूने नहीं देते, अपनी छवि को इतना प्रेम करते हैं पर आप अपनी पूरी सम्पत्ति जो है, मानवीय सम्पत्ति अनजाने चरित्र को सौंप देते है। ये बहुत बड़ा पवित्र काम है तो इस मायने में रंगमंच बहुत बड़ा हो जाता है कि आप उसे समर्पित हो जाते हैं। ये समर्पण मैं खोजता हूं। दूसरी बात है कि मैं उस लेखक का नाम हटा देता हूँ मैं किसी दूसरे लेखक का मान लेता हूं कि इसे शेक्सपियर ने लिखा है तो मुझे हैमलेट याद आ जाता है तो वही दुविधा है करूं कि न करूं, मरूं या न मरूं, मारूं या जीवित रहूं तो ये दुविधाग्रस्त स्थिति जो है नाटकीय स्थिति होती है। दुविधा जो है वो नाटकीय अनुभव को सृजित करता है। जिस कविता में ये दुविधा होगी, ये उलझनें हो वहां नाटकीय अनुभव की संभावना ज्यादा है। चरित्र नाटकीय ज्यादा होता है आप पूरे नाटक को उठाकर देख लें वही चरित्र आपको ज्यादा भाते हैं- जो चरित्र दुविधा से जूझता है जिसके मन में दुविधा नहीं है। मैं वहां चला और सीधा पहुंच गया तो कोई नाटक नहीं है लेकिन वहां पहुंचने के बीच में अडं़गे पड़े या तो मेरे विचार ने मुझे रोका या मेरे अनुभव ने रोका या दूसरे चरित्र ने रोका तो मेरी अलग से एक एक्टिविटी शुरू हो जाती है। अलग प्रक्रिया शुरू हो जाती है जिसके कारण मैं नाटकीय हो जाता हूं। इसलिए मैं जो अपनी यात्रा जा रहा था उसको स्थगित करके उसको मैं पहले निपटता हूँ फिर यात्रा की तरफ चलता हूं। तो एक सीधा-सीम्पल तरीका है कि आप उसको कविता न मानकर के सम्वाद मानें। जब आप संवाद मानेंगे तो वो अन्तर संवाद भी हो सकता है किसी से बोला गया संवाद तब आपको सारे सवाल के जवाब मिलने शुरू हो जाएंगे। तब इसमें विविधता भी आएगी तब इसमें आपको बंटवारे भी दिखने लगते हैं कि मैं खुद से बात कर रहा हूं या अनजाने चरित्र से बात कर रहा हूं या समाज से बात कर रहा हूं तो फिर बात बनती जाती है।

जैसा आपने कहा कि जटिल कविता रंगमंच को आकर्षित करती है तो जैसे आपने मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ का सफल मंचन किया है। इतनी जटिल कविता का रंगमंचीय प्रदर्शन करना किस तरह की चुनौती देता है?
निश्चित रूप से चुनौती है। सृजक जो होता है वो चुनौती ही पसंद करता है। सृजना ये नहीं है कि सब चीजों को उठाकर रख दिया। घर बनाना है तो और भी चीजें बनाओं तो वो क्राफ्रटमैन शिफ्रट होती है। कुर्सी बनाना अलग बात है। कविता में जो चीज़ होगी उसको हम कैसे रंगमंच के लिए प्रस्तुत करेंगे उसमें से क्या निकालेंगे तो एक तरीका मैं अपनाता हूं जैसे मुक्तिबोध का आपने नाम लिया ‘अंधेरे में’। मेरे सामने था कि इसको कैसे प्रस्तुत करें। ये तो एक आदमी का आत्मकथन है जो उससे गुजर रहा है ‘आशंका के द्वीप अंधेरे में’ पहले उसका नाम था बाद में सिर्फ ‘अंधेरे में’ उन्होंने दिया। तो एक आशंकित मनोमस्तिष्क की उपज है वो कविता। जिसमें वो देख पा रहा है एक मानव का बड़ा सरोकार, मानव के पूरे नेता की तलाश कर रहा है या उस मूमेंट की तलाश कर रहा है जहां वो शामिल हो पाए बड़े समुदाय से, बडे़ विरोध से तो अब इसमें मेरे सामने सवाल था कि इसको मैं रंगमंच तक कैसे पहुंचा तब मुझे लगा रंगमंच तो वो कला है जो मानने से शुरू हो जाती है। ज्यों ही हम मानते हैं कि मैं पानी में खड़ा हूँ तो यहां से मेरा अभिनय शुरू हो जाता है। ये रंगमंच का तरीका है क्योंकि रंगमंच में हर- दूसरा कुछ आपको होना है। आप जो हैं वो नहीं होना है। आप जो है वो उसके स्त्रोत होंगे, उसका आधार होगा। लेकिन आपको होना वो है जो आप नहीं हैं। आप रंगमंच में आए हैं तो ये तय है। ज्यों ही आप आए आप अपने को बाहर रखो और दूसरे को अपनाओ-ये एक बहुत बड़ा काम है। इसको पवित्र काम भी कहते हैं। लोग अपने शरीर को छूने नहीं देते, अपनी छवि को इतना प्रेम करते हैं पर आप अपनी पूरी सम्पत्ति जो है, मानवीय सम्पत्ति अनजाने चरित्र को सौंप देते है। ये बहुत बड़ा पवित्र काम है तो इस मायने में रंगमंच बहुत बड़ा हो जाता है कि आप उसे समर्पित हो जाते हैं। ये समर्पण मैं खोजता हूं। दूसरी बात है कि मैं उस लेखक का नाम हटा देता हूँ मैं किसी दूसरे लेखक का मान लेता हूं कि इसे शेक्सपियर ने लिखा है तो मुझे हैमलेट याद आ जाता है तो वही दुविधा है करूं कि न करूं, मरूं या न मरूं, मारूं या जीवित रहूं तो ये दुविधाग्रस्त स्थिति जो है नाटकीय स्थिति होती है। दुविधा जो है वो नाटकीय अनुभव को सृजित करता है। जिस कविता में ये दुविधा होगी, ये उलझनें हो वहां नाटकीय अनुभव की संभावना ज्यादा है। चरित्र नाटकीय ज्यादा होता है आप पूरे नाटक को उठाकर देख लें वही चरित्र आपको ज्यादा भाते हैं- जो चरित्र दुविधा से जूझता है जिसके मन में दुविधा नहीं है। मैं वहां चला और सीधा पहुंच गया तो कोई नाटक नहीं है लेकिन वहां पहुंचने के बीच में अडं़गे पड़े या तो मेरे विचार ने मुझे रोका या मेरे अनुभव ने रोका या दूसरे चरित्र ने रोका तो मेरी अलग से एक एक्टिविटी शुरू हो जाती है। अलग प्रक्रिया शुरू हो जाती है जिसके कारण मैं नाटकीय हो जाता हूं। इसलिए मैं जो अपनी यात्रा जा रहा था उसको स्थगित करके उसको मैं पहले निपटता हूँ फिर यात्रा की तरफ चलता हूं। तो एक सीधा-सीम्पल तरीका है कि आप उसको कविता न मानकर के सम्वाद मानें। जब आप संवाद मानेंगे तो वो अन्तर संवाद भी हो सकता है किसी से बोला गया संवाद तब आपको सारे सवाल के जवाब मिलने शुरू हो जाएंगे। तब इसमें विविधता भी आएगी तब इसमें आपको बंटवारे भी दिखने लगते हैं कि मैं खुद से बात कर रहा हूं या अनजाने चरित्र से बात कर रहा हूं या समाज से बात कर रहा हूं तो फिर बात बनती जाती है।

रंगमंच संवाद की विधा है, जबकि कविता स्वानुभूति की विधा है ऐसे में कविता को मंच तक लाना किस तरह की चुनौती है?
कविता इसलिए कि यहां शब्द के जरिए नहीं हम चरित्र के साथ दिखाते हैं। ज्यों ही चरित्र आएगा वो नाटक हो जाएगा। जब लेखक भी पाठ करता है तो अपने भाव नहीं पढ़ाना चाहता। वो आपको शब्द सुनाना चाहता है लेकिन जब अभिनेता करेगा वो आपको अपना चेहरा भी दिखाना चाहता है वो अपने हाव भाव भी दिखाना चाहेगा। वो अपने पूरे शरीर को उसमें शामिल करना चाहेगा। तो वो मानकर चलता है कि ये मेरे सम्पूर्ण की अभिव्यक्ति है। जबकि लेखक कहता है कि ये मेरे वाक् की अभिव्यक्ति है शब्द की अभिव्यक्ति है या साहित्य की अभिव्यक्ति है, न कि सम्पूर्ण की अभिव्यक्ति है।

मुक्तिबोध की कुछ और कविताएं जिनपर बेहतर मंचन किया जा सकता है?
‘चांद का मुंह टेढ़ा है’ का लोगों ने किया है। उसके बाद मैं तो वैसे पाठ भी करता रहा हूं। जब भी एक अलग स्थिति में फंसता हूं तो एक कविता को पाठ कर लेता हूं तो मुझे लगता है बहुत सारे सवाल के जवाब मिल जाते है कि आप जिसपर भरोसा करते हो उसपर आप बढ़ते रहो बाकी दुनिया को कहने दो। सफलता की उनकी परिभाषा है- आप अपनी परिभाषा दो तो, ये होता रहता है।

मुक्तिबोध की अधिकतर कविताएं किसी न किसी परिवेश की कविता होती है उसे समझने के लिए उस परिवेश को भी समझना जरूरी है जबकि अच्छे रंगमंच की विशेषता ये है कि वो एक्सप्लेन नहीं करता तो आम दर्शक इसे कैसे समझे?
परिवेश में हमारे पास ज्यादा साधन है जबकि कविता के पास केवल ‘शब्द’ साधन है। हमारे पास ध्वनि है, पारिवेशिक ध्वनियां हैं। रंगमंच में क्या है कि हम अन्दर का परिवेश भी क्रिएट करते हैं। मैं दुखी हूं ये अंदर की बात है, एक बगीचे में हूं ये बाहर की बात है। बगीचे में दुखी हूं, अन्दर-बाहर दोनों की बात है। मैं दूसरी दुनिया में पहुंच गया एक स्वार्गिक अनुभव हुआ या मैं महल की सोच रहा हूं एक ध्वनि के सहारे मैं उसे ला सकता हूं। आजकल तो डिजिटल टेक्नॉलॉजी है उसके सहारे उसे करीब ला सकता हूं तो वो अनुभव मैं दे सकता हूं। तो रंगमंच के पास ज्यादा साधन है। हम यहां किसी गंध का भी उपयोग कर सकते हैं। हम धूप अगरबत्ती जलाएंगे तो हमारा दर्शक अपने आप मंदिर की कल्पना करेगा या अजान का वातावरण बनाएंगे तो वो मजार तक पहुंच जाएगा या हम सूफीयाना गाना गांएगे तो वो निजामुद्दीन पहुंच जाएगा। हम भजन बजाएंगे तो भी वो मंदिर में पहुंच जाएगा। हमारे पास ज्यादा तकनीक है उसको एक्सप्लेन करने की उसकी देह से लेकर अंतर तक ये जो जगत है वो सबकुछ है हम उसकी यात्रा पर ले जा सकते हैं। हमारे पास विज्युवल्स है। हम- एक सेट के माध्यम से किसी महल में पहुंचा सकते हैं। हम एक कुर्सी के माध्यम से महल में पहुंचा सकते है। उसके अलावा हम एक जेक्शचर लेते हैं क्लासिकल जेक्शचर लेते हैं तो हम किसी जानवर में तब्दील हो जाते हैं या तो हम राक्षस में भी तब्दील हो जाएंगे या राक्षसी इच्छा हम दिखा दें। रंगमंच के पास तो ज्यादा ताकत है। रंगमंच के पास वो उपकरण है जो कुछ भी दर्शक तक पहुंचा सकता है और भावना के स्तर पर हम चोट करते हैं और पहुंचते है। इसलिए हम उसे सम्भाव पर लाते हैं और इसे ग्रहण करने के लिए हमारी मान्यता है कि रसिक ही इसको ग्रहण करते हैं। जो लोग रसिक नहीं होंगे वो उसको ग्रहण नहीं कर पाएंगे। उनके आगे वो ‘भैंस के आगे बीन बजाना है’ लेकिन हमारा दायित्व हैं कि हम भैंस को भी शिक्षित करें। रंगमंच इसीलिए सृजित हुआ कि वो लोग जो ‘बीन’ को नहीं समझते हम उनको समझने के तरीके खोजे। रंगमंच का काम यही है कि हम जटिलताओं को अपने संभावित अवयवों के माध्यम से जीवंत अनुभव में तब्दील करके उसे संप्रेषित करें, जटिलता को सामान्य करे। जैसे सामान्यीकरण के सिं(ात पर कलाकार को चलना चाहिए। तो कला का भी काम यही है जटिलता के साथ जूझे, चुनौती को स्वीकार करे और उसको सामान्य बना दे। इसीलिए साधारणीकरण का सिं(ात आया। आपको लगता है कि अभिनय कितना आसान है और आप नकल करने लगते हैं लेकिन जब करने बैठते हैं तो कहते हैं कि यार ये तो बड़ा मुश्किल है। इसके लिए तो ट्रेनिंग चाहिए। तो ऐसा ही है कि ये आपको सहज समझ में आने वाली चीजें नहीं हैं और हमारे सारे साहित्य में यही है। आपको लगता है कि बड़ा आसान है पर आसान होता नहीं है और यहीं मुश्किल है रंगमंच की निर्मित में जो है वो धारणा ही यही है कि चारां वेद बंट चुके थे और वे पाठकों के पास थे, रसिकों के पास थे तब क्या था कि जिनके पास नहीं है वो हंगामा करने लगे। उनको तो आपने पढ़ाया नहीं तो वो अपनी चाल चलेंगे। तो आपको तकलीफ होने लगी आप भागे- आपके मंदिर तोड़ रहे हैं मस्जिद तोड़ रहे हैं, आपकी सारी स्थापना को तोड़ रहे हैं। सारे संस्थान आपके गिरा रहे है। क्यों? क्योंकि उनको समझ नहीं है तो आपने समझ देने के लिए एक विधा का उपयोग किया कि इनको सीखाओं नहीं तो हमें ही हटा देगें- तो हो यही रहा है। संस्कृति तभी बचेगी जब उसको ध्वंस करने वाले लोग उसकी महत्ता को समझे। आज पूरे देश में, अफगानिस्तान में क्या हुआ जो बु( की मूर्ति गिरा दी क्योंकि उनको उसका महत्त्व नहीं पता है कि उसके होने का क्या महत्त्व हैं। उन्हें नहीं पता है कि जिस शांति की वो तलाश कर रहे हैं जिस शांति के नारे के साथ वो ध्वंस कर रहे हैं वो उसके विपरीत है। तो ये बात कैसे समझेंगे। रंगमंच की अपनी आदत है। आप उसको डांट भी देगें तो पर जब करने बैठेगा तो आप ही को सुनाएगा आपकी भी बाल की खाल निकाल लेगा। मौका देखकर आपकी भी खिंचाई कर देगा तो इसमें ये आदतन है। विरोध रंगमंच का मूल स्वर है। विरोध उन चीजों के प्रति जो सही नहीं है। जिसको ठीक होना चाहिए जैसे मुक्तिबोध कहते हैं न कि ‘हमें मेहतर चाहिए’ तो रंगमंच उसी मेहतरी वाला काम करता है। समाज की सफाई वाला काम है, मन की सफाई वाला काम है। व्यक्ति की सफाई वाला काम है। रंगमंच के मायने अब बदल गए हैं पहले ये मनोरंजन का साधन था अब ये व्यक्ति शोधन का काम करता है। इससे विश्लेषण की क्षमता अलग होती है, चीजों को देखने की दृष्टि अलग होती है। आप अपने से अलग होते है। जब तक आप अपना नहीं छोड़ेंगे तब तक दूसरे को नहीं समझ पाएंगे और बेकार बने रहेंगे- तो रंगमंच आपको सुविधा देता है कि आप अपनी काया को छोड़कर किसी दूसरी काया में प्रवेश करें और उसके मतों को समझे। रंगमंच एक तरह से सामाजिक उपचार का भी माध्यम है, मनोउपचार का भी माध्यम है अब तो नाट्य उपचार की विधियां भी चल पड़ी हैं। लोग इसको उपचार के लिए हॉस्पिटल में, ये हमारे यहां डेवलप नहीं हुआ है लेकिन है। तो विशेष रूप से जो चुनौती भले आदमी इंसान हैं हमारे भाई-बंधु हैं उनके लिए भी रंगमंच अपने आपको एक टूल के रूप में दे पाता है।

नई कविता आंतरिक उद्वेग की कविता है। अवसाद, चिंता, संत्रांस, अकेलेपन की अधिकता है। ऐसे में इसकी तैयारी अभिनेता को किस तरह की चुनौती दे सकती है?
रंगमंच हमेशा समकालीन होता है और स्थानीय होता है। ये रंगमंच के साथ है कि वो जब तक स्थानीयता के साथ नहीं जुड़ेगा वो अपने आपको नहीं कर सकता। न ही समझाया जा सकेगा तो रंगमंच के लिए तो ये होना निश्चित है। चाहे अप्रफीका का थियेटर हो लेकिन उसे समझेंगे अपनी ही तरह। जो चीजें हमारे आस पास मौजूद हैं हमारे समाज में मौजूद हैं। जिस बहस का हम रोज सामना करते हैं देखते हैं उसे सरक कर आना ही है। हमारी हर चीजों में चाहे वो साहित्य में हो, कविता में हो, सृजन से जुड़ा जो भी कुछ सृजित हो रहा होगा उसमें वर्तमान दिखेगा ही दिखेगा। और वर्तमान आदमी इन सब चीजों से जूझ रहा है। ये अलग है कि जूझने के अलग-अलग बिंब हैं, अलग-अलग स्तरों पर जूझ रहा है। कोई जूझ रहा है तो अपने ही घर के आतंक से जूझ रहा है। जैसे एक मराठी कविता कहती है कल्पना करती है कि एक कुबेर बैठा है जो दिनभर गिनता रहता है अपने शरीर के बाल और कितनी कारे हैं। उसे समझ में नहीं आता कि कार ज्यादा हैं या बाल ज्यादा है। तो कोई इसलिए परेशान है। उसकी अपनी चिंता है। एक बड़े राष्ट्र की चिंता है कि वो और भी कमाना चाहता है। उसे लगता है अभी पूरा नहीं हुआ मन नहीं भरा। तो ये है कि एक लोभी संस्कृति है वो भविष्य के नाम पर चीजों को सुरक्षित कर रहे हैं। एक बड़ी राजनीति चल रही है और एक दूसरा सेक्शन है जिसके सामने सवाल है ‘भूख’। भूख के लिए कविता जो है वो ‘रोटी’ है। उससे बड़ी कविता उसके लिए कुछ नहीं है। जिस सुख की बात हम करते हैं वो सुख रोटी का निवाला उस कविता का एक स्टेंज़ा ;पेराद्ध है। तो वहां कविता का अर्थ बदल जाता हैं। वहां हमारे मान बदल जाते हैं दूसरी ओर जो खाया हुआ अघाया आदमी है उसके लिए कविता एक ठुमका होती है। उसके लिए सबसे अच्छी कविता वही है कि ‘चोली के पीछे क्या है’ या जो अभी-अभी आइटम सॉन्गस, उसके लिए कविता वो है जो ‘किंगडम ऑफ ड्रिम्स’ है तो ‘किंगडम ऑफ ड्रिम्स’ जाना पड़ेगा जहां हजार दो हजार खर्च करके, टिकट लेकर देखकर सपनों को और सपनों में बदलेगा। दूसरी उनकी कविता है जो भूख से जूझ रहे हैं रोटी का इंतजार कर रहे हैं उनके लिए पांच सितारा होटल से पेफंकी हुई रोटी, वो उनके लिए कविता का काम करती है। सुख का काम करती है तो ये सब अलग-अलग स्तर हैं। ये हम सबको बराबर लाने की कोशिश करते हैं पर खैर। प्रोजेक्ट जो है वो किसी खास से कम्पीट नहीं कर रहा होता वो अपने आप से कम्पीट कर रहा होता है। सर्जना अपने आप से चुनौती कर रही है। हमने पिछली बार किया तो अब चुनौती है कि इस बार हम और बेहतर करेंगे। सर्जना इसी पीड़ा का नाम है। ये कई स्तर पर है।
अभिनेता की बात करें तो अभिनेता के पास तो दो मेजर पार्ट्स हैं-साउंड और बॉडी। उसके रिसीव करने के तरीके अलग-अलग है। अब ये ठंडा है या गर्म है वो करके दिखाएगा। वो ठंडा या गर्म है नहीं, पर उसको हर चीश को या तो सुनाना है या दिखाना है। ये दो मीडियम है। कविता में क्या है कि सिर्पफ सुनाना हैं तो हमारा एक टूल बढ़ जाता है। उसके बाद हमारे पास थ्री डायमेन्शनल स्पेस है। कविता का स्पेस क्या है पन्ना है वहां पेज स्पेस है और वहां हम जब जाना चाहे तब जा सकते हैं और रंगमंच का स्पेस क्या है एक कन्टीन्यूसनल स्पेस है। कविता में आदमी कितना बड़ा भी हो सकता है और छोटा भी हो सकता है। रंगमंच में हम आंख की बात करेंगे पर हम दिखेंगे उतने ही जितने बड़े हैं। दूसरे माध्यम उसको छोटा-बड़ा कर लेते हैं। रंगमंच आदमी को अपनी औकात में रखने का माध्यम है। उसको ने छोटा करता है न बड़ा करता है वो जितना है उतना ही बड़ा रखते हुए उसके अनुभव को छोटा और बड़ा करता है। रंगमंच का ये काम है।

क्या हमें मान लेना चाहिए कि जटिल कविताओ का मंचन भी मात्र बौ(क वर्ग के लिए है?
ये हो सकता है बौ(क वर्ग के लिए या अलग-अलग भी, जैसे जब मैंने मुक्तिबोध की कविता करनी शुरू की तो हम कई सारे एक्सरसाइज़िस करवाते हैं। उसमें भाग लेने वाले कलाकार जो हैं वो राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के तृतीय वर्ष के कलाकार है ये- जब मैंने पिछली बार इसको मंचित किया लेकिन जब अभ्यास करने बैठता, उसके बिंब निकालने बैठता तो थोड़ी देर बाद वो अपना सिर पकड़कर बैठ जाते। इतनी चिंता इतनी आशंका हम बर्दाश्त नहीं कर सकते। तो उन्हें विराम देना पड़ता था तो ये कविता इतना बोझ ढोती है। आदमी की दिमाग की नसें फटने लगें। रंगमंच क्या है कि हमारे पास समय होता है तीस-चालीस दिन रिहर्सल चलती है। हम टुकड़े-टुकड़े में कई तरह से एक बात को हासिल करने की, संप्रेषित करने की कोशिश करते हैं। इसलिए यदि हम सर्जन होते हैं रोज सर्जना में विश्वास रखते हैं कि रोज हम कुछ रचेंगे तो सोचिए कि एक शब्द तीस दिन में कितना घनीभूत हो सकता है। उसके कितने सारे आयाम हो सकते हैं। हमारे पास थ्री डायमेन्शनल स्पेस होता है तो हम दांए-बाएं, ऊपर-नीचे कहीं से भी चीजों को सपोर्ट में ले आ सकते है। हमारे पास सपोर्ट के लिए आज के वक्त में न सिर्पफ अभिनेता है बल्कि रोशनी, संगीत की सपोर्ट भी है। कॉस्ट्यूम सपोर्ट करता है, सेटिंग सपोर्ट करता है, प्रोप सपोर्ट करता है। उसके बाद संदर्भ, रिलेटिव भूमिका वो भी सपोर्ट करता है। ब्रेख्त कि ‘पोस्टर ही कविता है।’ जो आप पोज़ करते हैं ‘दैट इज़ ए पोएट्री।’ वाह! क्या अंदाज है।’ हम कहते है न। तो ज्यों ही आप कहते हैं वाह! क्या अंदाज़ है-वहां से कविता की शुरूआत हो जाती है। तो पोस्टर से हमारा रंगमंच शुरू होता है। ज्यों ही हम कहते हैं कि ‘अंधेरे में’ करेंगे तो उससे हमारा वर्ग, उसके दर्शक तय हो जाते हैं। इसके बावजूद कुछ दर्शक उसमें इन्टरपेफयर करने लगते है क्योंकि ये मनुष्य के साथ सरोकार रखता है। इस मनुष्य से जुड़ने के कारण और आपकी मान्यता है कि विश्व की थाति है हम जो कुछ करेंगे उसका पूरे ग्लोब पर असर पड़ेगा। ये मानना है कि हम एक सिगरेट जलाते हैं तो धुआं पूरे विश्व के लिए हानिकारक है न कि सिर्पफ हमारे लिए। तो ये उसका असर है कि हम एक वैश्विक समुदाय के एक छोटे से समुदाय के सदस्य होने के नाते उससे जुड़े हैं। इस रूप में भी हमेशा ये धारणा रही है कि राजा के महल में कुछ होता है तो एक आदमी के लिए उत्सुकता रहती है कि वहां ढोल क्यूं बजा, क्या हो रहा होगा। तो कहीं न कहीं एक इच्छा पूर्ति की संभावना और हम जितना कहते हैं, डरते हैं कि आम आदमी नहीं समझता दरअसल आम आदमी एब्सरडीटी के सबसे ज्यादा करीब है। चूंकि जिस एब्सरडीटी को साठ के मूमेंट ने उठाया उस एब्सरडीटी आम आदमी था। आम इंसान उसको सबसे ज्यादा भोग रहा था। ये अलग बात है कि हम यूनेस्को में बात कर रहे हो उस एबसिर्डिटी की आज लेकिन ये भूखा आदमी खुद चौराहे पर भूख का सामना रहा है। उन चीजों को खा रहा है जो एक आदमी नहीं खा सकता। उतनी एब्सरड हालत में है। तो ये असंगतता है और ये आज तो और भी आसान है क्योंकि हर आदमी के पास मोबाइल है, टीवी है। टीवी नहीं है तो भी क्योंकि हर दुकान में उसको दिखता है। एडवरटिज़मेंट क्या है ये एक एब्सर्ड सिचुवेशन में एक कम्पोज़िशन है। इसका कोई तुक नहीं है कि अभी आदमी यहां है अभी वहां है अभी पूफल खिल गया कोई तुक नहीं है लेकिन आदमी उसको समझता है। क्योंकि उसके मैसेज को पहुंचाने को तरीका है तो रंगमंच में भी धारणा गलत है कि आम आदमी उस जटिलता को नहीं समझ पाता। दरअसल आप उस जटिलता के साथ उसके पास गए ही नहीं। नहीं तो वो बैठा-बैठा जटिल चीजों़ को सरल करके, आप उसके काव्य देख लीजिए कबीर के एक दोहे के एक शब्द का अर्थ निकालते-निकालते आप पोथी लिख जाएंगे और कबीर कितना बड़ा जनकवि है। तो ये हमारी समस्या है कि हम व्यापक समुदाय तक जा नहीं पाते और उस तक वो चीजे़ पहुंचती ही नहीं हैं। हम ज्यों ही उसको कॉम्पलिकेटेड करते है वैसे ही हम दर्शक तय कर देते हैं आजकल हम उन चीजों को सफल मानते हैं जिसकी पहुंच कम लोगों तक है। यदि हमको राष्ट्रपति भवन बुला लिया जाए तो हम पुरस्कृत मान लिए जाएंगे। तो ये हमारी समस्या है।

इससे कविता की संवेदना पर कुछ फर्क पड़ता है?
देखे। कविता की संवेदना हम उसकी व्याख्या से न समझे। हमने पहली बार ‘अंधेरे में’ किया। हमने उसको नाटकीय संवेदना के साथ प्रस्तुत किया। मेरा कंट्रोल था तो उसके बाद दुबारा वो रीपिट हुआ तो साहित्यकार के पास गया और उसने साहित्यिक आलोचना की दृष्टि से कविता को सृजित करने की कोशिश की मंच पर और वो भरभरा कर गिर पड़ी। तो ये हमारा माध्यम है इस माध्यम की अपनी खूबियाँ हैं। इस माध्यम के अपने उपकरण हैं। उस उपकरण का इस्तेमाल नहीं करेंगे, उसकी क्षमता नहीं जानेंगे, उसकी संभावना एक्सप्लोर नहीं करेंगे तो वो इस माध्यम का नहीं होगा। ‘एडप्टेशन इज़ द फाइनल वर्ड फॉर एनी आर्ट।’ आप ‘ऐसी’ में आएंगे तो आपके शरीर को एडजस्ट करना पड़ेगा वरना आप ब्रीक कर जाएंगे। आपकों सर्दी हो जाएगी आप टूट पडे़ंगे लेकिन ज्यों ही आप एडप्ट कर लेगे सब ठीक हो जाएगा। कविता भी कागज पर लिखी जाती है लेकिन छपते वक्त उसको पन्ने में सिमटना पड़ता है। उसके फाउंट तय हो जाते हैं। इसी तरह है कि कविता की व्याख्या जो है उसमें जिस साहित्य के स्तर पर संवेदना है उसका ध्वनित होना कोई जरूरी नहीं है। बल्कि उसकी मानवीय संवेदना जो है रंगमंच के अपने उपकरण के जरिए मानवीय संवेदना के बीच में पहुंचना ज्यादा जरूरी है और यही तो है हम जींवत कर रहे हैं चीजों को। हम इसको भुगतते हैं। हम जितना अनुभव करते हैं उतना ही अनुभव उससे करवाते हैं। यानी सम्भव में रखने की कोशिश करते है यानी जो भी यहां है या वहां है तो बीच में हमारे एक गेप है इसीलिए हम थोड़ा फोर्स करते हैं चीजों को। रंगमंच थोड़ा सा अतिरिक्त दबाव की उत्पत्ति है अतिरिक्त संवेदना की उत्पत्ति है। अतिरिक्त भावाद्रेक की उत्पत्ति है। थोड़ा सा चाहिए क्योंकि उसे अपने से दूसरे के साथ पहुंचना है। उसे अब एकांत में नहीं पढ़ा जाना है। कविता क्या है एकांत से एकांत में समझी जाने वाली चीज है। वो एक एकांत से निकलकर दूसरे एकांत में जाती है। कई बार पढ़ी जाती होगी सम्पत्ति में पर हर आदमी अपने मन से उसको पढ़ता है। जबकि रंगमंच क्या है एकांत को सामान्य में ले आता है। ये सबके साथ शेयर करता है और सबकी सम्पत्ति बनाता है और एक समान ढंग से एक भाव दिखाता है। इन दोनों का पटल अलग है, दोनों का स्पेस अलग है। कविता को अपना स्पेस बदलना है। थियेटर के स्पेस में आना है तो। तो थियेटर के मानदण्डों पर उसे उतरना पडे़गा। ये जरूर है कि वो थियेटर के मानदण्डों को, संदर्भों को हो सकता है कि और अधिक समृ( कर दे, ये बिल्कुल संभावना है। वो उसके कथ्य को समृ( कर दे, उसके बिंब को समृ( कर दे जो उसमें भी है। मेरा मानना है कि दुनिया में हर चीज़ से हर चीश समझी जा सकती है। देखने वाले की दृष्टि चाहिए। हम रंगमंच को जानना चाहेंगे तो उसके संदर्भ को रंगमंच कर देंगे। इसकी व्याख्या कर सकते है। हम इसको रंगमंच के जरिए कर सकते हैं। एक कविता होगी तो वो भी इसकी व्याख्या कर देगी। तो एडप्ट करने की बात है।

किसी कविता के सफल मंचन में बड़ी भूमिका किसकी होती है? विषयवस्तु या चरित्र की?
हां ये तो एक रिलेटिव सवाल है लेकिन अल्टीमेटली देखिए रंगमंच क्या है अभिनेता का माध्यम है। मंच पर अभिनेता सबसे पहले प्रस्तुत होता है आगे रहता है और सारे कोशिश यही की जाती है कि हमारा अभिनेता बोले। अभिनेता के माध्यम से हम चीज़ों को कह पाएं। शुरुआत जो होती है वो कथ्य से होती है उसके बाद कथ्य जूझता है उस व्यक्ति से जिसको आप प्रस्तोता कह सकते हैं। या सर्जक कह सकते हैं। पहले तो कवि और लेखक ही होता था या निर्देशक होता था। निर्देशक तो बहुत बाद में आया निर्देशक पहले नहीं होता था। जो सर्जना करता था वही उसका निर्माण भी करता था। अब सब काम अलग-अलग खानों में बांट लिए हैं। फिर विचार से यात्रा शुरू होती है। विचार एक साहित्यिक रूप लेता है आप कुछ सर्जना करेंगे तो कुछ कथ्य तो सोचेंगे कुछ प्लॉट तो सोचेंगे तो यहां से शुरूआत हो जाती है उसके बाद उसकी जो जिम्मेवारी लेता है तब उसके बाद उसमें अभिनेता शामिल होता है। अभिनेता शामिल होता है तो क्या होता है कि कि कई बार दूसरी चीजों को शामिल करने की जरूरत नहीं पड़ती। या तो हमारे पास साधन उपलब्ध नहीं होते या हम पहले अभिनेता को तैयार कर लेते है उसके बाद हम दूसरे साधन जुटाते हैं।

आजकल तकनीकी बहुत ज्यादा हावी है आज तो अभिनेता की अभिनेयता पर भी कुछ फर्क पड़ता है?
इसमें डिपेन्ड करता है कि कुछ निर्देशक मैंने ऐसे भी देखें हैं जिसको पहले कहा जाता था ‘स्वान्त सुखाय।’ आपको सुख नहीं मिलेगा तो आप सर्जना नहीं करेंगे। निर्माण तो सुख का काम है। दूसरा क्या है कि एक इमेज को लेकर आत्ममुग्ध रहते हैं कि मैं जो कर रहा हूं दैट इज़ अ ग्रेट थींग तो अपनी महानता के तले दबा हुआ होता है तो कुछ निर्देशक इस गुमान में अपने अभिनेता को कम आंकते हैं। वो कहते हैं कि ‘तुम पर लाइट नहीं है डॉन्ट थिंक अबाउट दिस, आपका कॉस्ट्यूम ऐसा क्यों है ये सोचने की जरूरत नहीं है, ये कॉस्ट्यूम डिज़ाइनर का काम है वो तय करेगा आपको ये सोचने की जरूरत नहीं है।’ वो उसको एक टूल्स की तरह यूज़ करता है। जो अपनी आत्ममुग्धता को अपने विचार के साथ मिलाता है। वो अभिनेता में कुछ नहीं देख रहा होता। वहीं कई निर्देशक दर्शक को हतप्रभ कर देना चाहते है। उस एरिया में ले जाना चाहते हैं जो उनके लिए बिल्कुल नया अनुभव है। जो उन्होंने कभी देखा न हो। यानी कि कुछ अजूबे काम करने की कोशिश करते हैं। वो ऐसे परिप्रेक्ष्य में ले जाने की कोशिश करते हैं तो वहां हमारा अभिनेता कमशोर पड़ जाता है। कई लोग इन सबके बावजूद अभिनेता पर फोकस करते हैं कि ये सब चीजें अभिनेता के लिए हैं। कई उन्हें अभिनेता के लिए यूश करते है। दोनों की दृष्टि में अंतर है। ऐसे नाटक एक अनुभव तो देते हैं लेकिन वो ज्यादा चलते नहीं। क्योंकि वो मेटेरियल पर टिका होता है और मेटोरियल हमेशा कॉस्टली होगा। ऐसे बहुत नाटक होते हैं और बंद होते हैं। आज की हमारी फिल्म इंडस्ट्री की वहीं फिल्में ज्यादा चलती हैं जहां अच्छी कहानी, अच्छे कथ्य का मजा आता है और अभिनेता उसे अच्छे से निभाता है।

रंगमंच के लिए सिर्फ लंबी कविता ही उपयुक्त है या एक कवि की कुछ कविताओं को जोड़कर भी मंचन किया जा सकता है।
श्रीकांत वर्मा की कविताओं का मंचन किया था अलख नंदन ने तो वो भी कई कविताओं को जोड़कर बना था या ‘हो निर्भय तुम सूर्य गगन के’ ये अरूण पांडेय ने नाटक लिखा और मंचित भी किया तो ये मुक्तिबोध की कई सारी रचनाओं को मिलाकर किया था। उसके बाद जब मैंने खुद भी पाब्लो नरूदा को मंचित किया उनकी कई सारी कविताओं को मिलाकर किया। पैफज़ अहमद पैफज़ की कविताओं को जब करते हैं कइ सारी कविताओं को मिलाकर करते हैं। तो दरअसल बात ये नहीं है कि हम कितना बड़ा स्पेस दे ये तो हम नाटक में भी तय कर सकते हैं कि कितने घंटे हम प्रस्तुती करेंगे। अब एक घंटे में लंबी कविता में हमें छांटना पड़ेगा, छोटी कविता होगी तो हमें जोड़ना पड़ेगा। जब मुक्तिबोध की कहानी को मैंने अडेक्ट किया तो अब वो मुकम्मल नाटक हो गया तो उसमें मुक्तिबोध के बहुत सारे प्रसंगों से चीजें आ गई धूमिल की कविता ‘सड़क’ उसमें आई। वो अपने आप आई क्योंकि उनकी ‘पटकथा’ पर उस समय काम कर रहा था तो ये जरूर है कि छोटी छोटी कविताओं पर कवि का अपना भी अनुभव हो जैसे एक बड़ा विराट शरीर हम ले उसके कई सारे अंग होते हैं। उसी तरह का कविता के साथ भी कर सकते हैं।

आपकी नज़र में ऐसा कोई कवि जिनकी कविताओं का बेहतर मंचन किया जा सके?
मेरा ये प्रोपेफशन है। मेरे पास आप लकड़ी ले आओगे आप कुर्सी बनाना चाहो मैं कुर्सी बना दूंगा, टेबल बनाना चाहो टेबल बना दूंगा। मेरा काम है नाटक करना। रंगमंच के प्रेफम में उसके तत्वों को, उसकी अनुभूति को इन सब चीजों को लेकर चलना। ये मेरा काम है। मैं चेखव की लाइन को बड़ी प्रेरणा मानता हूं, वो कहते है ‘मेरा काम है लिखना तो मैं लिखता रहता हूं’ मुझे जो चीज़ दिखती है उसकी मैं कल्पना करने लगता हूं- लिख कर मैं भेज देता हूं वो छप भी जाता है जब छप कर बाद में मैं पढ़ता हूं सोचता हूँ क्या कबाड़ा लिख दिया पर लोग तारीफ करते हैं। तो मुझे लगता है ये एक प्रेरणा की लाइन है मेरे लिए। मेरा काम रंगमंच करना है। मैं हर चीज़ में इसको देखूंगा और कहावत भी है दुनिया की हर चीज जो है उसका इस्तेमाल हो सकता है।

अभी तक रंगमंच के लिए अधिकतर सिर्फ नाटकों का ही लेखन होता रहा है जबकि एक नयी विधा ये शुरु की जा सकती है कि जैसे नाटक रंगमंच के लिए लिखे जाते हैं वैसे ही लंबी कविता की शुरुआत की जा सकती है जो रंगमंच के अनुकूल हो, तो कैसा रहेगा?
होता है ऐसा, देखिए ‘अंधायुग’ मूलतः एक कविता है। रेडियो के लिए लिखा गया। ‘शंकुतला’ कविता है। मेघदूत भी कितने लोगों ने किया। आप ग्रीक के भी नाटक उठा कर देखेंगे तो वो पोएट्री की शक्ल में हैं। जैसे हमारे रामायण, महाभारत, ये सवाल और जवाब है। जैसे किसी एक ने सवाल पूछा कि अच्छा गुरूजी बताइए सृष्टि कैसे शुरू हुई। अब वो बताने लगे बताते गए, बताते गए। बताने में सवाल दर सवाल फिर जवाब, फिर सवाल फिर जवाब। ये जो सृष्टि का चक्र है तो सृजन भी यही है कि सवाल होंगे आप जवाब देने की कोशिश कीजिए फिर दूसरा सवाल उठ जाएगा। तो सवाल कभी खत्म नहीं होगे। तो रंगमंच में लंबी कविताएं लिखते है पर आखिर में उसे श्रव्य-दृश्य काव्य में तब्दील होना ही है। ये तो संभव ही नहीं है कि कविता न हो। चाहे कहानी भी हो उसको भी कविता होना पड़ेगा। चाहे नाटक हो उसको भी कविता होना पड़ेगा। आखिर में दिखेगा तो वो कविता ही। कविता तो मूल है। आज तो सब चीजों को मंचित किया जा रहा है।

‘अंधायुग’ गीत नाटक है उसके अनगिनत सफल मंचन हुए हैं पर भाषा की जटिलता इस कदर उस पर हावी है कि आम जनता के जेहन में उतर नहीं पाती जबकि उसमें सारे पात्र पौराणिक हैं। अशिक्षित लोग भी उनसे जुड़ी घटनाएं जानते हैं। पर नाटक में पात्रों के संवाद जटिल है। आपको कभी लगा कि इसे और आसान किया जाना चाहिए? अगर हो तो किस तरह का बदलाव करना चाहेंगे?
इसमें हम देखें कि हमारा दायित्व क्या है। सृजन का दायित्व क्या है? सृजक का दायित्व क्या है? जयशंकर प्रसाद कहते हैं कि भई आपके नाटक लोगों को समझ नहीं आ रहे ये है वो है तो इसको नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि देखिए मैं उनको अपने स्तर पर लाना चाहता हूं न कि उनके स्तर पर जाना चाहता हूं। रचना भी यही काम करती है। वो आपका स्तर उठाती है न कि खुद को नीचे ले जाती है। तभी उसकी महत्ता बनी हुई हैं- नहीं तो आप देखिए कितनी सारी चीजें पैरोडी में लिखी जाती है, नकल में लिखी जाती हैं उनका हश्र क्या होता है वो सड़क के पुफटपाथ पर ही बिकती है। वो बहुत सरल समझ में आती है। फिल्मों का एक कॉमर्शियल मुहावरा है कि लोगों के लिए हम करते हैं। लोग डिमांड करते हैं। ऑन डिमांड हम शो करते हैं। तो लोग डिमांड नहीं करते बल्कि आप उसकी डिमांड बनाते है। पहले डिमांड ये होती थी कि किसी अभिनेता ने अच्छी एक्टिंग की मरने का दृश्य किया तो दर्शक कहते थे ‘वन्स मोर’ यानी वो उसकी कला को देखना चाहते थे।

कविता का प्रयोग अक्सर नाटकों के बीच आ गई गंभीरता या जटिलता को तोड़ने के लिए किया जाता है फिर कविता का पूरा मंचन करना किस तरह से संभव है?
मुझे उल्टी बात लगती है। ये गंभीरता को बढ़ाने के लिए किया जाता है। कल ही एक नाटक मेरा मंचित हुआ डायरेक्ट किया मैंने मकरंद साठे का लिखा हुआ ‘चौराहा’ तो उनके आलेख में मुझे एक क्लू मिला एक कैरेक्टर जो है वो बोलने जा रहा है, भाषण देने जा रहा है।
‘मराठी कविता और अस्मितओं का ध्रुवीकरण’ टॉपिक पर इस पर वो बोलने जा रहा है तो साठे जी ने कविता का जिक्र नहीं किया कहीं तब मैंने मराठी कविताओं को पढ़ना शुरू किया। तब बहुत सारी कविताएं मुझे वहां से मिली। जो अर्थ, उसके आधुनिक संदर्भ उसको बहुत गंभीरता से रख देती है। गंभीर बनाने की कोशिश करती है। उसके डायलॉग, उसके संवाद जो है डिस्कोर्स है वो बहस है इन पूरी स्थितियों को लेकर कि हमारे विचार जो है चौराहें की तरह आपस में मिल रहे हैं। चाहे वो परंपरावादियों के हो या प्रगतिवादियों के हो या विभिन्न मूवमेंट में तो सारे विचार आज गूत्थमगूत्था होकर हम बड़ी विचित्र स्थिति में पंफसे हुए हैं। विचारों का टै्रफिक जाम है। राजकमल चौधरी की भी कविताओं की जब लाइन बोली जा रही थी ‘‘आदमी को तोड़ती नहीं है लोकतांत्रिक प(तियां, उसे पेट के बल झुका देती है। धीरे-धीरे उसको राजभक्त बनाने लगती है। कोशिश करते हैं कुछ ऐसा ही हम इस लोकतांत्रिक विचार से अलग होना चाहिए। जो बदनाम दुनिया हैं उसमें चला जाना चाहिए क्योंकि जीवित पड़ोसी को खा लेने से बेहतर है वो होना।’’ मैंने देखा कि उसकी एक एक पंक्ति पर लोग उसकी गंभीरता को रीसिव कर रहे थे कि क्या बात बोली है। इस संवेदना के साथ कविता उसके करीब ले जाती है। अचानक आपको सारा निचोड़ निकालकर के आपको पिला देते है। कविता का ये काम होता है उसको हल्का नहीं करना है वो तो गीत का काम है कि आपको रोचक कर देते है। ये गाने का काम है कि वो आपको कभी-कभी रिलेक्स कर दे लेकिन गाना कभी-कभी आपको दुख भी पहुंचाता है। उसके भावनात्मक स्तर तक आपको पहुंचा दिया जाता है। तो कविता पूरे जिस्ट को निचोड़ कर पिला देती हैं और अचानक उसके बोध होने का अचानक कौंधता है कि अरे! तो कविता इतना करीब ले जाती है।

कविता और रंगमंच की भाषा में फर्क है फिर उसके मंचन में सम्वेदना में फर्क होगा, उसको बैलेंस कैसे किया जाए?
फर्क आ सकता है और कविता में सब चीजां को बैलेंस करने वाला जो जीवित एलीमेंट है पास वो सबको बैलेंस कर लेता है। वो ये तय करता है कि इसको सम्वेदना के स्तर पर पहुंचाना है। कविता मात्र शब्द का शरीर नहीं है वो तो शब्द के पीछे जो भावना है, दर्शन है जो कथन है। शब्द नहीं कथन जो है उसको कहने के लिए अभिनेता सहारा लेता है उन शब्दों का सहारा लेता है और उस पूरी नाटकीय परिस्थितिया में इसके परिप्रेक्ष्य में अपनी भूमिका महत्वपूर्ण मानता है। रंगमंच में एक मुहावरा प्रचलित है कि ‘चरित्र कोई छोटा बड़ा नहीं होता अभिनेता छोटा बड़ा जरूर होता है’ क्योंकि हमारे लिए वही हर कील काटा अपनी जगह पर जरूरी है। इसलिए कविता के लिए शब्द जो है वो जरूरी हैं। उनका कम्पोज़िशन जरूरी है उनकी संवेदना जरूरी है तो हम सबको महत्व देने की कोशिश करते हैं। रंगमंच में कोशिश करनी चाहिए कि हम अननेसेसरी चीजों को छांट दे। कविता रंगमंच को थोड़ा चुनिंदा बनाती है। कही खुबसूरत भी बनाती है, लयात्मक भी बनाती है। उसके सौंदर्य को बेहतर करती है। अनुभूति को बेहतर करती है।

हमारी पत्रिका से जुड़े पाठकों को कोई सलाह।
मैं तो कहूंगा खूब कविताएं लिखे, पढें़ और पढ़ाएं। नाटकीय अनुभूतियों से भरी कविताएं लिखें और जो रंगमंच करने वालों को आकर्षित करे। अच्छा साहित्य भी रंगमंच की बुनियादी में रहता है। विवाद सम्वाद सबको जगह दें।
रंगमंच सम्वाद का माध्यम है जो विवादों का निपटारा करने के लिए है। विवादों पर सृजित जरूर होता है लेकिन विवाद में ही सम्वाद करता है।

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