ISSN2320-5733

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समसामयिक सृजनयूजीसी केयर लिस्ट में शामिल

कहानी चाँद फिर निकला अरुणा सब्बरवाल

वैसे ही सब कुछ जमा -जमा सा था ,इस घर में . जैसे बर्फ गिरने के बाद सब कुछ जम जाता है .घर की चार दिवारी के भीतर एक अनजान बोझिल सा सन्नाटा सा फैला था .एक अजीब सी भडास छितरी थी वातावरण में ,मानों सदियों से यहाँ से हवा तक न गुजरी हो . रिश्तों की दूरियों की गंध कण-कण में फैली थी .घर के सभी सदस्य एक दूसरे से अजनबी ,पराये -पराये से लग रहे थे .

हाँ -हाँ वह उसी घर की बात कर रही है ,जहाँ सुबह होते ही घर में भूकम्प आ जाता था .जोर -जोर से बाथरूम का दरवाजा ठोकना , हेयर -ड्रायर का शोर फुल ब्लास्ट पर रेडियो ऍफ़ -एम् पर गाने , सीरियल नहीं खाऊँगी, माँ कुछ चटपटा सा नाश्ता हो जाए . क्यों न आज जीरे वाले आलू और अजवायन की पूरी हो जाये .वही लंच में ले जाऊंगी ,कम से कम बोरिंग ब्रेड से तो छुटकारा मिलेगा . पता नहीं सारी उम्र लोग कैसे खा लेते हैं बोरिंग ब्रेड .बेलगाम चलती रहती थी उसकी नोक -झोंक ...यही रोज का कार्य –क्रम था उस घर की लाडो रानी का ....गोरी चिट्टी पतली और हंसमुख . उसकी भोली –भाली बातें जिनसे फूलझड़ियाँ झडती थीं... उसके कभी न समाप्त होने वाले चटपटे मनोरंजक किस्से ,वही चपलता ,वही जिन्दादिली .और वही आज को जी लेने की ललक, भविष्य से लापरवाह ,न कोई दुविधा न कोई भय .उसका हर बात पर बेवजह हंसना .उसकी टूटे घुँघरू सी खनखनाती हंसी , छन -छन कर कोने कोने में बिखर जाती थी

कुछ भी तो नहीं रहा अब वैसा .सभी कुछ बदल गया है रातों रात .हाँ -हाँ उसी की बात कर रही हूँ , अपने बचपन की सहेली स्वरा की. नर्सरी स्कूल से लेकर ऐ -लेवल तक हम दोनों एक ही स्कूल में पढ़ती थीं .दोनों ही लन्दन के हैरो इलाके में रहती थीं ,कोई भी ऐसा दिन नहीं गया होगा जब स्कूल जाते वक्त सुबह -सुबह कड़कती सर्दी में उसके घर के बाहर मुझे कम से कम पन्द्रह मिनट तक प्रतीक्षा न करनी पड़ी हो .फिर भी वह कुछ न कुछ भूल ही जाती थी .इकलोती जो थी ,माँ बाप की लाड़ली.सर पर चढ़ा रखा था दोनों नें ? ऐ लेवल के पशचात स्वरा को लन्दन के कॉलज में दाखिला मिल गया और मुझे बर्मिंघम में , जो लन्दन से एक सों दस मील दूर था .अलग -अलग स्थान पर पढ़ने के कारण हमारा मिलना जुलना कम होता गया .पिछले कई महीनों से मेरी की स्वरा से बात भी न हो पाई थी मैंने .सोच लिया था इस बार छुट्टियों में जब घर जायेगी तो स्वरा से जरूर मिलेगी .घर पहुँचते ही स्वरा को सरप्राइज देने सीधी मैं उसके घर पहुंची ..

दरवाज़ा खुलते ही वह निशब्द हक्का -बक्का सी रह गई. एक ही पल में उसका पूर्ण उत्साह गुल हो गया .अंकल जी का चेहरा देखते ही उसकी जुबान थम गई .बहुत मुश्किल से उसके मुख से दो शब्द निकले
"अंकल जी स्वरा है ?".
"हाँ बेटा अपने कमरे में है ". दिव्या भी दबी आवाज़ में जी कह कर उसके कमरे में चली गई .उसे विश्वास नहीं हुआ कि इतने हँसमुख चहेरे पर इतनी मायूसी ?.......मायूसी ही नहीं एक ऐसी गहरी उदासी भी जो टूट कर भी अपने निशान छोड़ती जाती है .दिव्या स्वयं को अजनबी महसूस करने लगी ,सोचने लगी शायद वही गलत समय पर आ गई है हालाँकि स्वरा के कमरे का दरवाज़ा थोड़ा खुला देख कर वह खटखटा कर भीतर घुस गई .वहाँ डिजायनर कपड़े पहनने वाली ,टिप-टॉप रहने वाली स्वरा नहीं ,लिबास से लापरवाह ढीली -ढाली स्वरा घुटनों में सर छिपाए बेठी थी .उसे देखते दिव्या हक्की -बक्की रह गई .

"अरे स्वरा यह मूर्ति बन कर बैठी रहेगी या कुछ बताएगी भी ,क्या हो गया सब को यहाँ?...तुहारे पापा भी भाव्य शून्य सी नजर डाल कर अपनी स्टडी में चले गए ,और मम्मी तो कहीं दिखयी ही नहीं दीं.उसने हेरानी से कहा . उत्तर देने के बदले वह मन के सागर में डूब गई ,उसकी आँखें डबडबा आईं जैसे कलेजे से बहुत दिनों का जमा दर्द आचनक पिघल कर आँखों से निकलने लगा हो . “चुप भी कर ,बोलती ही जायेगी क्या ?”स्वरा ने झुंझलाहट से कहा .

"नाराज़ क्यों होती हो ,जानती हूँ मिलने नहीं आ सकी ,कसूरबार हूँ .माफ़ी मांगने ही तो आई हूँ .अरे कुछ तो बोल इतनी गम-सुम क्योँ हो, मुंह में मिश्री ड़ाल रखी हँ क्या ? चल ऊठ तैयार हो ,क्लब चलते हैं .वहीं चल कर बात करेंगे ".
"नहीं मेरा मन नहीं है ."
"मन का क्या है ,बन जायेगा ".
"नहीं’ कह जो दिया ,मेरा मन नहीं है "इतना कह कर वह चाय बनाने चली गई .
दिव्या ने स्थिति को भांपते हुए कहा .
"ठीक है घर पर ही गप्पें मारते हैं .वह टुकर -टुकर स्वरा को देखती रही .मन ही मन में सोचने लगी कितनी बदल चुकी है स्वरा कहाँ गई इस फुदकती चिड़िया कि चंचलता ,चुलबुलापन और जिन्दादिल्ली ,क्या यह वही लड़की है ,जो कभी नाईट क्लब के नाम से उछल पड़ती थी .? जिसके घर में सखियों का तांता लगा रहता था और चबड -चबड करते कभी मुहं नहीं दुखता था .. दिव्या सोच रही थी कि मामला गम्भीर दीखता है .उसकी कुछ पूछने कि हिम्मत नहीं पड़ी .दोनों के बीच एक ऐसी चुप्पी छायी थी जो सौ -सौ जिव्वाहों से बोला करती है और हजारौं डंक मारती है .उनकी वार्तालाप केवल हाँ -ना तक ही सीमित रही .दोनों अपने -अपने कोर्से कि बातें करती रहीं .
दिव्या खिडकी से बाहर देखते बोली "स्वरा अधेरा होने को है ,चलती हूँ ".
"दिव्या ध्यान से जाना ".
"स्वरा आंटी जी कहाँ हैं ?बाय तो कर दूँ ".
"टी.वी के कमरे में होंगी ".
"ठीक है वहीं मिल लूँगी "
जाते -जाते वह टी .वी कमरे में झांक कर बोली "नमस्ते आंटी जी ".
“ नमस्ते बेटा ,कब आईं ?.”
जैसे ही उन्होंने व्हील चेयर घुमाई ,दिव्या ने मजाक से कहा “ आंटी जी ,अच्छा बहाना ढूंढा है आराम करने का ?"
"बेटा क्योँ मजाक करती हो ."उन्होंने निराशजनक स्वर में कहा .
"सॉरी आंटी जी ,अँधेरा हो रहा है ,चलती हूँ ".
दिव्या की वह रात टूटी -टूटी गुजरी . उसकी .आँखों के सामने स्वरा के पापा का मुरझाया असहाय चेहरा तथा उसकी मम्मी की भाव हीन छवि घूमती रही ....

और स्वरा...?वह तो जैसे इस लोक में थी ही नहीं .वह सोचने लगी. नारी का दुःख कितना गहरा होता है यह उसे देख कर अंदाज़ा लगाना कितना कठिन है.....

दिव्या का स्वरा को मिलने का क्रम निरंतर चलता रहा .उसे विश्वास था एक दिन अवश्य स्वरा अपनी असहनीय पीड़ा उड़ेल देगी .वह यह भी जानती थी की तीनों ही गहन पीड़ा में जल रहे हैं तीनों के मन में अनेकों सवालों के बबंडर के साथ -साथ भयावह डर दुबका बैठा है .एक सप्ताह बीत चका था उसके धैर्य की डोर चटकने को थी .अभी तक उसे कोई सुराग नहीं मिला था .वह तीनों ही अपने -अपने बुलबुलों में बंद थे .दिव्या ने पहल करने की ठान ली .दिव्या को लगा शयद अपनी मम्मी -पापा के सामने स्वरा हिचकिचा रही हो ..दिव्या ने स्वरा को फोन पर डांटते कहा .

"स्वरा बहुत हो गया अब ,आज तुमने हमारे बीच कौन सी लक्ष्मण रेखा खींच दी है ? मैं कुछ नहीं जानती ,चुप करके जल्दी से मेरे यहाँ आ जा ,आज मेरे घर में कोई नहीं है और उगल डाल जो मन मैं है ". दिव्या ने अधिकार से कहा .

”मुझे क्या हुआ है ?ठीक तो हूँ स्वरा ने झुंझलाहट से कहा .”

"मेरे प्यारी सखी ,आज इतनी कटुता क्यों ? ऐसे सरल प्रश्न तो बचपन से हम एक दूसरे से करते आयें हैं .तू यह क्यों भूल रही है की तेरी सहेली एक मनोवेज्ञानिक भी है .चेहरे पढ़ सकती है ,आज ऐसा क्या कह दिया कि तुम भड़क पड़ी .हो ?”.....
स्वरा ने गहरी सांस ली विवश सी तनिक संभलते बोली .
" नाराज हो गई हो गई हो ,बुरा लगा क्या ? मैने सबसे कह दिया है की. मेरा हाल मत पूछें .तुम्हीं बताओ इज्तदारों के घरों में ऐसी बातें होती हैं क्या ?”

"पहेलियाँ मत ड़ाल ,जल्दी से यहाँ आ जा "....

" तू नहीं मानेगी, बना चाय , मैं आती हूँ “....

आधे घंटे में स्वरा दिव्या के घर पहुंच गई . बातों ही बातों में बड़े प्यार से दिव्या ने उसके कंधे पर हाथ रख उसके अंतस में पहुचने का प्रयास करते पूछा "अब बता क्या बात है ?. " स्वरा उस से लिपट कर रोते- रोते बोली "मेरे साथ भी वही हुआ ,जो बरसों पहले तेरे साथ हुआ था .तभी से उसका सोचते ही मन कटखना हो जाता है ,भीतर एक कील सी चुभने लगती है .तुम्हें पता है उस वक्त होश आते ही लगा मानों मैं वस्त्रहीन हो गयी हूँ .पंगु हो गयी हूँ .अभी तक ऐसा लगता है जैसे शरीर पर कोई रेंगता कीड़ा रेंग रहा हो .पल भर में मेरा अछूता पंन न जाने कहाँ लुप्त हो गया चारों ओर एक भयावह सा जाल फैल गया .मानों शरीर का खून जम गया हो .शरीर निचुड़ गया हो .वह सुबकते -सुबकते बोलती जा रही थी ... अभी तक वक्ष पर उस जल्लाद का फिसलता स्पर्श रह -रह कर मेरे शरीर को झुनझुना देता है .उस भेडिये के स्पर्श ने मेरे बदन पर झुरझुरी सी छोड़ दी है .खुद से दुर्गन्ध आती है .ऐसा आभास होता है किसी ने बदबूदार कीचड़ के कुएं में धकेल दिया हो .. .उस हादसे की भयानक छाया मेरे मन पर ऐसी ठहरी है कि जाने का नाम ही नहीं लेती . सामने न् होते हुए भी उसका डर पीछा नहीं छोड़ता.”

"स्वरा सब कुछ जानते हुए भी तुम्हें यही सुझाव दूँगी कि इसे एक भयानक सपना समझ कर पीछे छोड़ कर आगे बढ़ना होगा .यह जीवन अमूल्य है ,किसी और कि गलती से या किसी एक घटना से हम अपना भविष्य तो दाव पर नहीं लगा सकते ?जीना तो नहीं छोड़ सकते ? में हूँ न तेरे सामने दल -दल से निकली जीती जागती मिसाल .इसी उदेश्य से ही तो म्नौवाज्ञानिक बनने कि ठान ली थी मैने? ताकि मैं हर एक औरत का लौह स्तम्भ बन सकूँ .उसे साकारात्मक सोच से आगे बढने का मार्ग दर्शा सकूं ,तुम्हें भी ."

"दिव्या कोशिश तो बहुत कर रही हूँ ,किन्तु उस हादसे का ध्यान आते ही घृणा का विष नसों मैं दौड़ने लगता है .स्वयं को मैली-मैली सी महसूस करने लगती हूँ ऐसी सोच पर काबू पाना कठिन हो जाता है ".

"पगली कहीं की ; औरत मैली और साफ़ नहीं होती .औरत तो सिर्फ औरत है जो की शमा बन कर अंधरे मैं रह कर औरों को रौशनी देती है “....

“किन्तु ऐसी नकारत्मक सोच पर काबू पाना सरल तो नहीं ? तुमने मेरे मम्मी पापा को गौर से देखा है क्या ?कैसे टूट गए हैं ? उन्हों ने तो जीना ही छोड़ दिया है . चलते -फिरते रोबाट से जी रहे हैं .दोनों ?.उन्हीं की चिंता सताती रहती है मुझे .कृपया उनकी चुप्पी तोड़ने का कोई प्रयास करो .उनसे वार्तालाप का रास्ता बनाओ .कोई भी जुगाड़ लगाओ प्लीज़ .सुनो सोमवार को मम्मी घर पर अकेली होती हैं ,आगे तुम समझ जाओ ".

सोमवार को दिव्या स्वरा के गर पहुंची .घंटी बजाई .
"दिव्या तुम ?स्वरा तो घर पर नहीं है "उन्हों ने दरवाज़ा खोलते ही कहा.
"आप तो हैं आंटी जी ......"इतना कह कर वह बिना बुलाए भीतर घुस गयी .स्वरा की मम्मी अपनी व्यस्तता का कवच चढाये रसोई मैं खटर-पटर करती रहीं .कुछ देर पश्चात दिव्या ने उन्हें बड़े स्नहे से पकड़ कर कुर्सी पर बिठाया और बोली "आंटी जी आप ने आज तक मुझ में और स्वरा में कोई अंतर नहीं समझा ,आज ऐसा क्या हो गया है कि आप मुझ से ही आँख चुरा रही हैं .मैं जानती हूँ आप दिल में एक गहरा दर्द छपाए बैठी हैं ..आज तो आप को मुझे बताना ही पड़ेगा .बेटी समझ कर या फिर मनोचिकित्सक के रूप में .वैसे स्वरा से थोड़ा संकेत मिला है....वह भी बड़ी मुश्किल से , टस से मस तक नहीं हुई.. अड्डी रही वह भी जिद्दी बच्चे कि भांति....

कुछ क्षण दोनों के बीच कष्टप्रद मौन बैठा रहा उनका चेहरा गम कि तस्वीर लग रहा था. आँखों में एक अजीब सी बैचेनी थी जो उनके जिंदा रहने का सबूत थी ..प्रसंग को टालते स्वरा कि मम्मी ने कहा "दिव्या अँधेरा होने को है अब तुम घर जाओ ".

"ठीक है चली जाउंगी ,किन्तु आप को मेरे एक प्रश्न का उतर आप को देना होगा कि “आप मुझे यह बताएंकि आप को कौन सी बात सबसे अधिक सालती है ? किस बात का एहसास आप को सबसे अधिक दुःख दाई लगता है”? दिव्या ने राख में चिंगारी ढूंढ़ते कहा....
वह गहरी साँस लेते हुए एक संक्षिप्त सा उत्तर देते बोलीं "सभी कुछ जो उस दिन स्वरा के साथ हुआ ,तब से अब तक हर रात उस भयावह रात का सोचते -सोचते कलेजे पर वजन महसूस करते गुजरती है .मुझ जैसी आदर्शवादिनी ,बेटे बेटियो में समानता का डंका बजाने वाली माँ को अब एहसास हुआ है .क्रिसमस के दिनों कि बात है ,एक रात डिनर के पश्चात स्वरा के पापा उसे पार्क होटल लेने गये .सडकों पर भारी ट्रैफिक होने के कारण,जब तक वह होटल पहुंचे स्वरा वहाँ से जा चुकी थी .वही एक घंटा हम लोगो के लिए जान लेवा बन गया .इतना बेबस खुद को कभी नहीं पाया. मैं नहीं जानती कैसे निकलूं इस भंवर से . बेबसी का कम्बल ओढ़े पड़ी रहती हूँ .भीतर की आवाजे कानों को बेंधती हैं कहती हैं 'चलो उठो पड़ी रहोगी तो अंग -अंग जुड़ जायेगा .रात-रात भर इसी मकड जाल में उलझी रहती हूँ ,क्यों ,हमारे साथ ही क्यों ?क्यों पुरुष नारी कि शारीरिक दुर्बलता का केवल लाभ ही नहीं उठाता बल्कि जीवन भर के लिए उसे पंगु बना देता है .उसके जीवन को विकृत कर देता है .इन्हीं सवालों के उत्तर खोजती रहती हूँ हर पल .यही प्रश्न गले में फंदे कि तरहं झूलता रहता है .दिव्या बेटा अब तू ही निकाल हमें इस भवंर से .स्वरा के पापा तो बिलकुल टूट चुके हैं .इतना लाचार तो मैने उन्हें कभी नहीं पाया ".

“वचन दे बेटा तू ही तोड़ेगी स्वरा के पापा की चुप्पी ?."
..."डन , दिया वचन ,अब मैं चलती हूँ ,आंटी जी, इस बात पर पूरी न सही आधी मुस्कान ही हो जाए "दिव्या ने शरारत से कहा .

घर पहुंचते उसे उनकी घुटन का का आभास होने लगा ,सोचने लगी कैसे एक ही छत के नीचे तीनों असहनीय पीड़ा और अपराध बोध की चुभन के साथ जी रहे हैं .अक्सर हर रोज़ स्वरा से उसकी मुलाकात हो जाती .जहाँ जग बीती -आप बीती बातों में कहीं न कहीं भयावह हादसे का सन्दर्भ आ ही जाता .वह किताब के पन्नों की भाँती खुलने लगी ,उसका आत्मविश्वास अपना स्थान ग्रहण करने लगा हालंकि दिव्या पर पढ़ाई का दबाब था ,लेकिन उन तीनों को एक बार फिर से सामान्य जीवन में लाना उसकी चुनौती बन चुका था .तीनों की उसके साथ उम्मीदें बंधी थीं ..अब प्रश्न उठा पापा के सामने प्रस्ताव कैसे रखा जाये?.
" यह तू हम पर छोड़ दे ." स्वरा ने कहा.
स्वरा और उसकी मम्मी नें पापा को मंगलवार को घर में अकेले छोड़ने की योजना बनाई और दिव्या से उस दिन घर जाने को कहा ,और यह भी कहा ,की अपने घर जाने से पहले हमें फोन कर दे .

योजना के अनुसार मंगलवार को दिव्या ने स्वरा के घर की घंटी बजाई .....
“स्वरा तो घर पर नहीं है”.आधा दरवाज़ा खोलते ही अंकल जी बोले इतना कह कर वह दरवाज़ा बंद करने वाले ही थे
"अंकल जी मेरी एक जरूरी किताब स्वरा के कमरे मैं है "दिव्या ने एक ही साँस में कह डाला .

..तनिक सोच कर सीढियों की ओर इशारा करते बोले "ठीक है "
दिव्या बिजली की भांति ऊपर भागी .पांच मिनट पश्चात वह दबे पांव सीधी उनकी स्टडी में उनके सामने की कुर्सी पर जा बैठी कुछ क्षण दोनों में पराया सा सन्नाटा छाया रहा .वह किताब में आँखे गडाये बैठे रहे ,नजर तक नहीं मिलायी .
"अंकल जी कौन सी किताब पढ़ रहे हैं ? " दिव्या ने घबराते हुए कहा .
वह भाव हीन जड से बैठे रहे . उनकी चुप्पी भंग करने के लिए वह चालू हो गई .

"अंकल जी मैं कई दिनों से देख रही हूँ आप अब पहले जैसे अंकल जी नहीं रहे .बचपन से ही आपने मुझे अपनी दूसरी बेटी माना है स्वरा जैसा प्यार सम्मान दिया है .मुझ से आप की यह दशा नहीं देखी जाती .आज मेरी बारी है अपना फर्ज़ निभाने की ".
कोई बात हो तो बताऊँ "उन्होंने अलगर्जी से कहा .
"पर स्वरा और आंटी जी तो कुछ ओर बेटा रहीं थीं ".
"फिर पूछती क्यूँ हो ?.”

. “ठीक है अधिक नहीं एक ही प्रश्न पूछूंगी,आप एक ही बात बतायें, आप को कौन सी बात सबसे अधिक कचोटती है ?प्लीज़ यह मेरा अनुरोध है .".
"क्या बताऊँ बेटा मैं तो अब पिता कहलाने के काबिल ही नहीं रहा .पिता होते हुए भी मैं अपना कर्तव्य नहीं निभा सका .मैं ही लाया था उसे इस संसार में.और मेरे कारण ही वह सब हुआ जो नहीं होना चाहिए था में उसे जन्म देने वाला उसकी ही हिफाजत नहीं कर सका .मुहं मोड़ा है .. अपनी जिमेदारियों से .नहीं निभा सका उन्हें ?गुनेह्गर हूँ अपनी बेटी का ..उस काली .. रात के बाद स्वरा से तो क्या मैं आज तक आईने से भी नजर नहीं मिला सका .

दिसम्बर का महीना .क्रिसमस का वातावरण था .पार्टीयों पर पार्टियां चल रहीं थीं .लन्दन की सडकें खचा- खच भरीं थीं ..सड़कों पर ट्राफिक रेंग रहा था ... पूरे का पूरा ब्रिटेन खुशियौं में डूबा था .उस रात स्वरा अपने दोस्तों के साथ पार्क होटल में डिनर को गयी थी . डिनर के बाद उसे पिक करने का मेरा उतरदायित्व था ...

. कई बार स्वरा को फोन करने की कोशिश तो की शायद शोर गुल में उसे फोन की घंटी सुनाई नहीं दी होगी .जब तक मैं पहुंचा वह जा चुकी थी .घर लौटा घर पर भी वह नहीं थी .तुम तो जानती हो इकलौती होने के कारण हम दोनों उस पर बरगद सी छाया किये रहते हैं .मन में एक डर सा दुबका रहता है की ज़रा सी धूप लगते ही बेटी कुम्भला जाएगी .आज मैं ही उसका गुनहगार हूँ ,सदा रहूँगा . एक पल को मन में आया की पुलिस को सूचित कर दें फिर सोचा लड़की, का मामला है थोडा और रुक जाते हैं . इतने में घंटी बजी ,भाग कर दरवाज़ा खोला सामने बेटी नहीं पुलिस महिला खड़ी थी . सब कुछ समाप्त हो चुका था . पुलिस ने बताया स्वरा अस्पताल में है. उसी के ड्राइविंग लाईसेंस से आप के घर का पता मिला है . कोई भी इंसान कैसे इतनी बेहूदा हरकत कर सकता है यह सोच कर ग्लानि होती है . उस अमावास की काली रात की जिक्र करके मैं अपनी बच्ची को पीड़ा नहीं पहुंचा सकता . इस घटना से हमारा परिवार ही बिखर गया है .उठते -बैठते अपराध बोध सताता है तीनों अपनी -अपनी आग में जल रहे हैं . तब से अब तक मैं अण्डों के छिलकों पर चल रहा हूँ कभी -कभी तो ऐसा लगता है कि मस्तिष्क में टाईम बम्ब पड़ा है . अब तो स्वरा का मुझे पापा कहना गाली सा लगता है "इतना कह कर वह फूट -फूट कर रोने लगे ....

'दिव्या ने स्नेह पूर्वक आश्वासन देते कहा "अंकलजी अगर हम सब मिल कर जी जान से प्रयास करेंगे तो अवश्य ही इस विकट स्थिति से आगे निकल जायेंगे .. समय,साहस ओर धीरज कि आवश्यकता है “....

“ ठीक है जैसा तुम कहोगी ,वैसा ही होगा ,किन्तु बेटी का पिता होने के नाते मेरी भी कुछ सीमाँए हैं ".

"जी ,वह मैं अच्छी तरह से समझती हूँ .आप मेरा फोन नम्बर ले लीजिये ,आवश्कता पड़ने पर बेझिझक फ़ोन कर सकते हैं .अब चलती हूँ ".

रास्ते भर वह सोचती रही इतने विराट व्यक्तित्व के व्यक्ति का मनोबल कैसे इतना चूर -चूर हो गया .कहना तो वह बहुत कुछ चाहते थे किन्तु उनकी जुबान चिपक सी गई थी . दिव्या ने विवेक शीलता से उनकी थेरपी का प्रयास निरंतर ज़ारी रखा जिसका परिणाम भी दिखने लगा ,.उनके घर में थोड़ी चहल-पहल होने लगी, ..उनका आत्मविश्वास अपना स्थान ग्रहण करने लगा ...तीनों ने परिवार को बचाने की ठान ली थी, अगर परिवार को बचाना है तो सोच सकारात्मक करनी होगी .घटनाएँ तो घटती रहती हैं उनसे जीवन थोड़े ही थम जाता है दिव्या का स्वरा से मिलना रोज़ हो जाता था .उसके चहेरे पर फैली उदासी कम होने लगी थी .उसका खोया चुलबुलापन उसके अंगों में थिरकने लगा था .इन कठिन क्षणों ने एक बार फिर उन्हें करीब लाना आरम्भ कर दिया था .

"स्वरा जल्दी ही छुट्टियाँ समाप्त होने वाली हैं क्यूँ न आज मूवी देखने चलें ?".
"ठीक है तुम ठीक सात बजे मेरे यहाँ पहुंच जाना ,दोनों एक ही कार में चलेंगे ".
मूवी के पश्चात दोनों पब ( बीयर -बार )के ग्लास हॉउस में ड्रिंक ले रही थीं देखते -देखते न जाने कहां से झुण्ड के झुण्ड बादलों के ऊभर आये .और चाँद बादलों की ओंठ में छिप गया .बिजली कडकने लगी ,मुसलाधार बारिश होने लगी.
" चलो, घर चलें वरना बहुत देर हो जाएगी ,".स्वरा ने घबराते हुआ कहा ..
"चिंता मत कर मैं साथ हूँ न ?".
कुछ क्षण पश्चात अचानक बादलों को चीरता चाँद न जाने कहाँ से उभर आया .ऐसा ब्रिटेन में अक्सर होता है .
“स्वरा देख कैसे चतुराई से घने काले बादलों को चीरता 'चाँद 'उभर आया है .तुम्हें भी सब कुंठाओं का दमन कर इसी तरहं उभरना होगा .याद रखना जीवन समय से आगे निकलने का नाम है...कुछ पढ़ी कुछ अनपढ़ी किताब है ... कोई जन्म पत्री नहीं ,जिसके सभी शब्द संकेतों से भरे होते हैं .और बदले नहीं जा सकते “.

“मैं जानती हूँ तुम में संकल्प तथा मनोबल की कमी नहीं हें ... .चलो चलें" .दो दिन बाद दिव्या वापस चली गयी .कभी -कभी विक -एंड पर लन्दन आ जाती किन्तु फ़ोन पर स्वरा से रोज़ बात हो जाती थी .दिव्या के सुझावों को स्वरा और उसके परिवार ने गम्भीरता से लिया .धीरे -धीरे उनमें परिवर्तन की झलक दिखाई देने लगी .सर्दियों को पीछे छोड़ कर बसंत के आगमन के संग ग्रीष्म ऋतु की आह्ट सुनाई देने लगी टूलिप्स और ड़ेफोडीलज़ पृथ्वी से झाँकने लगे , वृक्षों पर नई कोपलें उभरने लेगीं ..गुलाबी -गुलाबी ब्लोसम डालियों पर झूम -झूम पंखुडियां बरसाने लगे ...भौंरों की गुंजन के साथ स्वरा का मन भी गुनगुनाने लगा (यू'के मैं मौसम के साथ -साथ लोगों के मूड भी बदलने लगते हैं ) जून -जुलाई का महीना था , परीक्षाएं समाप्त हो चुकीं थीं, छुट्टियो की प्रतीक्षा थीं... अचानक स्वरा ने दिव्या को फ़ोन किया ...

"दिव्या शुक्रवार को चार बजे न्यू स्ट्रीट स्टेशन पहुंच जाना .तुम्हारे लन्दन वापस आने से पहले तुम्हारे लिए एक .सरप्राइज है ".उसने उल्लास से कहा .
."एस मैडम ,पहुंच जाऊंगी .,ऑन डोट ".दिव्या ने मुस्कुराते हुए कहा
फ़ोन पर स्वरा से बात कर दिव्या प्रसन्न थी उसे स्वरा की आवाज़ में उत्साह ,उल्लास और आत्मविश्वाश झलक रहा था .रेल से उतरते ही स्वरा दिव्या को ज़ोर से जफ्फी डालते बोली "दिव्या बर्मिंघम नहीं दिखाओगी क्या ?"....
"क्यों नहीं ,पहले सरप्राइसज तो देख लूँ .."
"इतनी बेसब्री भी क्या है ? एक नहीं दो हैं...दो . तेरे ब्याय फ्रेंड का सदेश लायी हूँ ".उसने पर्स में से सोनू निगम के प्रोग्राम की दो टिकटें निकल कर दिव्या के हाथ मैं धर दीं.

"ओ माई गोड़? सोनू निगम ..... सिम्फनी होंल में ?"दिव्या खुशी से उछल पड़ी ..
"यह ले उसे अच्छी तरहं से देख भी लेना ."स्वरा नें एक दूरबीन दिव्या के हाथ मैं थमा दी “.सुन अधिक उत्तेजित मत हो , जल्दी से कॉफी पिला दे . . साढ़े पांच बजे प्रोग्राम शुरू हो जायेगा.”...

. प्रोग्राम के पश्चात दोनों सेंचुरी स्क्वायर में आसमान के नीचे ड्रिंक का आनंद लेने लगीं. हवा में खुनक थी .. आकाश सिंधूरी -सिंधूरी था ,.सूरज डूबने को था (यू .के में गर्मिंयों में सूरज रात के दस बजे तक नहीं डूबता ) दोनों में चुप्पी चहल कदमी करने लगी . दिव्या मन ही मन में मुस्कुराते -मुस्कुराते सोच रही थी .क्या यह वही स्वरा है ’आज उसके ,मुख पर आभा है आँखों में चमक है आवाज़ में उल्लास है .लगता है स्वरा ने अपने जीवन के बेरंग कैनवस में रंग भरने आरम्भ कर दिए हैं ‘.....
इतने में बादल गरजने लगे "स्वरा चलो चलते हैं ".

"इतनी जल्दी भी क्या है .अभी तो बहुत सी बातें करनी हैं तुमसे . दिव्या अच्छा ही है कि मौसम के पन्ने मनुष्य के हाथों से बाहर हैं और यह भी सुना होगा कि एवरी डार्क क्लाउड हेज़ ए सिल्वर लाय्निंग".

" हाँ -हाँ सुना क्या ,देख रही हूँ " इतना कह कर वह गुनगुनाने लगी ...”मेरे सामने वाली कुर्सी में ईक चाँद का टुकड़ा बैठा है”... .

"दिव्या तुमने सही कहा था 'मनुष्य की सकारात्मक भावनाएं जहाँ भी सघन होती हैं ,वहीं बसंत कि छटा छा जाती है “ .

"स्वरा. यह आसमान में टकटकी लगाये बादलों में क्या ढूँढ रही हो ?" "वही जो तुम देखना चाहती हो .......दिव्या,... वो देख....... वो देख कितनी होशियारी से चाँद घने काले बादलों को चीरता -चीरता आगे निकल आया है ... ‘ मेरी तरहं “... .

"हाँ लाडो बिलकुल तेरी तरहं..............कहा था न, औरत एक नदी है जो उलटी हवाओं में भी बहना जानती है ".

अरुणा सब्बरवाल
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BIRMINGHAM B5 7 TN
U.K 0121 472 3310

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