ISSN2320-5733

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कहानी कौन सी सड़क जाएगी बाँदा सुमन सिंह

देर रात तक सुधी ने सामानों की सफ़ाई की...हर दरवाज़ा, हर हैंडल, हर खिड़की, अलमारी,  फ्रिज, रैक पोंछा है। मन से थक कर चूर हो चुकी सुधी ...लखनऊ और गांवों के बीच झूल रही है  ...अपने गाँव माँ और बहन की यादों से टँकी चादर ओढ़ बिस्तर पर न जाने कब सुधी को नींद  ने घेरा। अल सुबह ही मालकिन की आवाज से अचकचाकर उसने आँखें खोलीं। बाँदा ज़िले से एक साल पहले आयी सुधा अब सुधी ही हो चुकी है आज सुबह की मालकिन की  आवाज़ से कसमसाता कर उसने आँखें खोली उसका मन हुआ अनसुना कर दे उस आवाज़ को जो  उसके कानों में घुसकर पूरे बावजूद फैलती जा रही है ...

सुधी ऽऽऽऽऽऽऽ
एक और लंबी तान ।
और उसने हड़बड़ाकर बिस्तर छोड़ दिया । रात सोते सोते ही एक बज गया था । अब उसकी नज़र जो घड़ी पर पड़ी तो छोटी सुई 8 पर और बड़ी सुई 12 पर सुस्ता रही थी । तीसरी तान पर “जी मैडम!”  की आवाज़ के साथ ही वह छलांगें लगाती मालकिन की कमरे में दाख़िल हो गई। वहाँ TV पर लगातार कोरोना की ख़बर और चीख-पुकार से वह भीतर तक घबरा गई।

“ले बाबा रो रहा है, देख तो, थोड़ा बाहर घूमा दे । बाहर माली होगा उसे पकड़ा कर इसका दूध बना दे। फिर हमारी ग्रीन टी और पानी ले आ तुरंत”।

“जी” कहते हुए उसने बाबा को गोद में लिया और लॉन की ओर बढ़ गई। बाहर आते ही हरा- भरा लॉन और सड़क पार झूमते लंबे लंबे हरे पेड़ देख उसकी अलसाई आंखें जैसे खिल उठीं।  बाबा चुप बाबा चुप हो चुका था। न जाने क्या था वो सुधी के पास आते ही चुप हो चिपक जाता था। माली काका के पास जा कर बाबा को उनकी गोद में डाल कर वो दूध बनाने से पहले बाथरूम में घुसी। बाथरूम से फ़ारिग हो जब वो हाथ मांजने शीशे के सामने खड़ी हुई तो उसे सामने सुधा दिखी- उजड़े बाल, मिचमिच आंखें, आँखों में कीचड़। जल्दी -जल्दी उसने बाल साधे। ब्रश कर मुँह धोया। वह सुधी बन बाहर आ गई । उसके पूरे शरीर में दर्द पसर रहा था।  वो कहे भी तो कैसे कि इन तीन - चार दिनों में उसका मन अपने गाँव अपने घर भाग जाने को हुआ। रात फ़ोन पर माँ की आवाज़ महीनों बाद सुनने के बाद से उसकी बेचैनी और बढ़ गयी है।वो तुरन्त गाँव जाना चाहती है जहाँ वो ज़िद के साथ माँ से देर तक सो पाने का आग्रह कर सकती है। माँ उन दिनों उसे पानी से बचाती कामों से बचाती ढेर सारा स्नेह बरसाती है । उसका मन है बिस्तर पर ढेर हो जाने का। 

“सुधी, बाबा को दूध दिया जी?” के साथ उसकी तन्द्रा टूटी। “जी, अभी।” 

सामने दूध उबल रहा है । ठीक ऐसे ही उसका मन भी उबल रहा है। दूध को उसने पतीली में ठंडा होने रख दिया है। पर, मन?  मन को कैसे ठंडा करे वो?  दिन रात कोरोना की ख़बरें और ज़्यादा मारक होती जा रही हैं । लोग पैदल ही कोसों दूर 

अपने गाँव को रवाना हो रहे हैं । 

TV पर आँखें जमाए वो बाबा का दूध तैयार करती रही और उस भीड़ में ख़ुद के होने की कल्पना भी । बाबा का दूध तैयार कर वो फीडर माली काका को ही पकड़ा आयी । वापस आकर पानी और ग्रीन टी ट्रे में रख वो कमरे में पहुँची। अंदर साहब और मै डम किसी प्लान पर चर्चा कर रहे थे। 

“अरे सुधी, ये कैसा मुँह बना रखा है? सभी-सबेरे मुँह क्यों लटकाये है?” सुधी ने पूरी कोशिश की मुस्कुराने की, लेकिन उसका दर्द उसकी मुस्कान से ज़्यादा मज़बूत था। 

वो चिल्ला देना चाहती थी । बहुत तेज़। इतनी तेज कि उसकी आवाज उसकी माँ तक पहुँच जा ए, पर,  नहीं।

वो ऐसा हरगिज़ नहीं कर सकती, क्योंकि सब उसे बहुत अच्छा मानते हैं। और फिर घर का ख़र्च  उसके यहाँ होने से ही चल रहा है...

ये सारी ख़याल एक साथ सनाके से उसके दिल के रास्ते आए और दिमाग़ के रास्ते गुज़र गए। वो किचन में जाकर सब्ज़ी वग़ैरह का इंतज़ाम करने लगी । खाना बनाने वाली बाई आती ही होगी । वो तो आते ही बस रौब ग़ालिब करने लगेगी। वो भी बिलकुल नहीं समझती सुधी की तक़लीफ़, बल्कि उसे चौबीस घंटे खार ही खाए रहती है। उसे लगता है सुधी उससे सुपर है । उसका अधिकार घर पर ज़्यादा है। प र, सुधी उसे कैसे समझाए कि वो भी उसी की तरह नौकरानी ही है । बस, बाबा को संभालने के कारण उसे साफ़ कपड़े , साबुन शैंपू इत्यादि दिया जाता है , वरना वो भी ... सुधी इसी उधेड़बुन में थी फिर से मालकिन की आवाज़ आयी—- सुधीऽऽऽ!  सुधी हिरनी की तरह उनके कमरे की ओर भागी।मालकिन ने फरमान जारी किया—“सुधी, दोपहर में पनीर के पराठे और आलू टमाटर की सब्ज़ी बनवा दे।और खीर भी।”  फिर मुड़ते हुए बोली—“और आज शाम से बाई को आने से मना कर दे। तू तो खाना बना ही ले गी ना!”

उसने हाँ में सिर हिलाया और वैसा का वैसा जैसा कि मालकिन ने कहा था बाई को बोल दिया। बाई ने टेढ़ा मुँह बनाया और कमर पर हाथ रख बड़ी तीखी टोन में बोली-  “और कुछ ऑर्डर हो तो बता दो क्या करना है?”  सुधी आज कुछ बोलना नहीं चाहती है

।उसे मालूम है अगर वो कुछ बोली तो बतंगड़ बन जाएगा और आज कल साहब घर पर ही हैं। वो चुपचाप डस्टिंग करने दूसरे कमरे में पहुँच गई जहाँ करोना की ख़बरें, लोगों की भीड़ पैदल  चलते लोग, ट्रेन की पटरी पर मर गए लोग—ये सारी बातें उसके दिमाग़ में घूमती रहीं। वो सोचती रही साहब और मेम साहब को कोई फ़र्क क्यों नहीं पड़ता। गाँव में तो शायद नहीं है 

कोरोना। तभी तो सब गाँव में भाग रहे हैं । अब तक साहब और मैड कमरे से बाहर आ चुके थे  और लॉबी में पड़े बड़े से झूले पर बैठ गए थे। “सुधी, बाबा कहाँ है? लेकर आओ।”  सुधी बाहर ड्राइवर की गोद में खेल रहे बाबा को लेने बढ़ी। इस ड्राइवर से उसे सख़्त नफ़रत है। वो बड़ी अजीब नज़र से उसे देखता है । चाय पकड़ते हुए, पानी की बॉटल लेते हुए, पास से गुज़ रते हुए हमेशा उसे छू लेने की फ़िराक़ में रहता है वो ।उसकी भूरी आंखें सुधि को कई बार भय 

से भर देती हैं। वो भी माली काका के बग़ल वाले कमरे में रहता है अपनी दो साल पहले ब्याही पत्नी के साथ । 

बाबा को गोद में लेते हुए उसने बड़ी बेशर्मी के साथ उसे छुआ और होंठ टेढ़े कर मुस्कुराया।सुधी  घृणा से भर गयी । उसने बड़ी ख़ूँख़ार नज़रों से उसकी ओर देखा और अंदर बढ़ गई । कई बार उ सका मन होता है कि मैडम को सारी बातें बता दे।  लेकिन यह सोचकर कि ड्राइवर की बीबी बहुत सीधी सादी है और सुधी से अच्छा बर्ताव रखती है। सुधी चुप रह जाती है।लेकिन आज तो उसने हद ही कर दी । बाबा को पकड़ाने की कोशिश में उ सने कुछ ज़्यादा क़रीब आने की कोशिश की। वो अपना मुख उसके बेहद क़रीब ले आया जिससे बीती रात पी गई शराब और सिगरेट की मिश्रित गन्ध उसके  ज़हन में उतर गई ।और उसका जी मिचलाने की कगार पर आ गया । उसका जी हुआ कि अब तो  वो चिल्ला ही दे ।और चिल्लाकर उसकी बीबी को उसका सच बता दे। लेकिन, एक साथ कई तस्वीरें उसकी आँखों में घूम गईं जिसमें उसकी माँ की लाचारी सबसे ज़्या दा प्रभावी ढंग से ठहर गई।

और वो बाबा को ले कर भीतर चली गई । अंदर मैडम ने बाबा को गोद में लिया। उसे पुचकारा  और अपनी ग्रीन टी मुख्य ख़त्म करती रही। खाने वाली बाई कोरोना का बहाना ले अलग अलग बहानों से तरकीबें करने लगी और अंतत:  पाँच सौ रुपया हासिल करने में क़ामयाब हुई । पहली बार उस बाई ने तिरछी नज़र उस पर डालते हुए पूछा- “करोना बीमारी फैली है, यहीं पर रहोगी क्या? भाग जाओ जल्दी गाँव ।” और मुस्कुरा दी। 

सुधी मालकिन के सामने आकर ठिठक गई। उनके चेहरे का मुआयना करते हुए उसे लगा कि मालकिन  आज कुछ ठीक मूड में हैं। सुधी ने सोचा उनसे गाँव जाने के बारे में बात की जा सकती है।  पूरे एक साल बीत गए हैं उसे अपनी माँ और बहन को देखे। सबसे ज़्यादा उसका मन अपनी छो टी बहन सलोनी के लिए तरसता है। अब तो बड़ी हो गई होगी वो। बाबा जब उससे चिपक जाता है तो उसे सलोनी बहुत याद आती है और जब साहब मैडम उसे अकेला छोड़ के जाते हैं तो उसे माँ बहुत याद आती है ।  बाई नाश्ता खाना बनाकर जा चुकी है । सुधी अब और सह नहीं पा रही थी ।  सुधी ने हिचकिचाते हुए कहा-“मैडम जी करोना फैल रहा है, गाँव चली जाती तो...”

उसकी बात पूरी भी नहीं हुई कि मालकिन ने घुड़का- “पागल है क्या? हम सब है ना यहाँ ! क्या करेगी गाँव जाकर? यह लखनऊ है । यहाँ नहीं आए गा कोरोना। हम सब साफ- सफ़ाई रखतेहैं न! वहाँ गंदगी में कोरोना और पकड़ेगा । कहाँ लखनऊ कहाँ बाँदा। चैन से रह।” उसे लगा अब उसका रोना निकल जाएगा।मालकिन ने सुधी का उतरा हुआ मुँह देखा।  “क्या बात है सुधी? सुबह से तेरा मुँह उतरा हुआ है । आज  डस्टिंग भी नहीं हुई । सारा घर बि खरा पड़ा है” सुधी ने कराह कर कहा- “मैडम जी, मेरी पीठ में बहुत दर्द है। मैं नहीं कर पा रही काम।” “अरे क्या हुआ? आज ही बीमार होना था तुझे । देख तो, मेरी कमरे में मेडिसिन बॉक्स रखा है 

दराज़ में । लेकर आओ।” वो बेमन से दवा का डिब्बा उठा लाई। मालकिन ने उलट- पुलट कर कुछ गोलियां को देखा और उसे पकड़ा दिया- “ले कुछ बिस्किट खाकर खा ले।” सुधी कसमसाकर रह गयी। उसका मन हुआ वो सब कुछ फेंक कर ज़ोर से चिल्ला दे - “नहीं होता मुझ से काम । नहीं खानी मुझे कोई दवा। मुझे माँ के पास जाना है ।” लेकिन, उसने दो बिस्किट खाकर गोली निगल ली । उसके कानों में हॉल से टीवी की आ रही आ वाज़ लगातार कोरोना नाम के रट से भरे जा रही थी। ये करोना है क्या ? यह परिवार क्यों नहीं डर रहा इससे? सिर्फ़ मज़दूर  ही क्यों भाग रहे हैं? साहब को क्यों नहीं डरा रहा करोना ? तरह- तरह के विचारों से दो- चार होती वह बाहर लॉन से होती हुई क्यारियों को निहारती माली काका की ओर आ गई । माली काका पतीली में कुछ पकाकर उतार रहे थे ।  “काका, ये करोना क्या है?” काका अचकचाकर उसकी ओर मुड़े- “का बतायीं बिटिया, कोनो बीमारी है सायद । परसों विकास से बात भई रहा। बतावा रहा चारों ओर हाहाकार मचा है। केहू का छुए का नाहीं है । मुंह बाँधे काहै। मज़दूर सब भागि र हिन हैं। विकासौ जाई रहा है । बिस्पत को हियाँ ।सुधी मुँह खोले सुनती रही । माँ सलोनी बार- बार उसकी आँखों में घूमते रहे ।

“काका, हम लोग का करें अब?” प “का बतायी बिटिया। साहिब से कहे रहेन । वो बोले हियाँ  कुछ नहीं होई । आराम से रहो। लेकिन, रात को फोन पे तुम्हाई काकी बहुतै परेशान रही।  बोलिन- भागि आओ हियन।  गाँव मा रहौ। कम खाव। साथै रहौ। अब यह सोच रहिन हैं का करैं । “काका, बाँदा कित्ति दूर पड़ेगा?” “हम का बताई बिटिया, अच्छा ड्राइवर साहेब से पूछ लेइब तबै बतइबै तुमका।”

बहुत देर तक दोनों बतियाते रहे।  बातों- बातों में दोनों का दर्द साझा होकर एक हो गया।सुधी के मन का दुख बहुत कुछ कम हो गया।सुधी वापस मुड़ी । सामने सड़क पर पसरा सन्नाटा उसे डरा रहा था ।

सामने की सड़क के सारे घर चुप थे,। किसी की बालकनी में हवा की घंटी बज रही थी, किसी के  दरवाज़े पर पौधे लहरा रहे थे। बीच- बीच में किसी फ़्लैट से कुत्ते के भौंकने की आवाज़ आ रही थी।उन फ्लैट्स के न बोलने में भी एक  बोलना था।

बोलना था ये कि समय भयावह है। बोलना ये कि सब डरे हुए हैं। बोलना ये कि जान बचा कर  भाग सुधी अपने गाँव।सुधी भीतर पहुँची तो दर्द कुछ कम था। साहब उसे देख मेम साहब से कुछ  कहते-कहते चुप हो गये। कुछ डर- सा था उन दोनों के चेहरों पर। सुधी का दर्द अब कुछ कम था। उसने अपना कमरा सँवारा और  नहाने चली गयी । ऊपर बाल सुखाने पहुँची तो देखा—दूर माली काका फ़ोन पर बहुत धीरे- धीरे बतिया रहे हैं। उसे माली काका की बातों पर और भरोसा हो आया ।  वो ऊपर देख मुस्कुरा दी।आसमान साफ़ था उसके मन की तरह और पेड़ ज़्यादा हरे उसके भीतर  भी हरियाली भरते हुए।दोपहर के खाने के बाद उसने गाढ़ी नींद ली और चौड़ी आँखों के साथ  उठी।रात का खाना बनाने का ज़िम्मा उसने बख़ूबी पूरा किया ।मालकिन की खुशी २००/-  रू के रूप में बरसी।एक ख़ुशगवार नज़र सुधी पर डालती हुई बोली-

”ओहो दवा ने तो सुधी को बिल्कुल ही बदल दिया, कितनी प्यारी लग रही है तू आज! सुधी शर मा कर मुस्कुरा दी। मालकिन और साहब बाबा को ले कमरे में चले गये। सारा काम समेट सुधी भी  कमरे में आ गयी ।उसने दोनों चोटियाँ रिबन से कस कर बाँधीं । कुर्ते में दो सेफ़्टी पिन टाँके। बि स्तर की सिलवटें सँवारीं।कमरे में टँगी कृष्ण जी की तस्वीर को शीश नवाया। फ्रिज से पानी की  बोतल निकाल कपड़ों साथ पुराने बैग में रखी। अब तक के इकठ्ठे किये रूपये चोर जेब में रखे। भोर में दो जोड़ी पाँव काली सड़क पर तेज चाल से चलने लगे।आगे चल कर वे पाँव एक ऐसी  भीड़ में शामिल हो गए जिसकी मंज़िल का पता सिर्फ़ ईश्वर को था। करोना के डर की चादर ओ ढ़े भीड़ में दो चेहरों ने एक पल को नक़ाब उतारा। एक दूसरे की मुस्कुराती आँखों में देखा और भीड़  में घु स गये।सैकड़ों आवाज़ों के बीच एक आवाज छनकर आती रही- “भैया, कौन सी सड़क जायेगी बाँदा?”

सुमन सिंह
जन्म-12 जून, 1972, मुम्बई
शिक्षा- प्रारंभिक शिक्षा लखनऊ, उ0प्र0 । सेंट जाँस कालेज आगरा से अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर ।

प्रकाशन- प्रारंभिक कविताएं और कहानियां अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। पहली कहानी ‘मोल‘ म0प्र0 साहित्य अकादमी की पत्रिका ‘‘साक्षात्कार‘‘ में (2005) प्रकाशित। पहले पहल, साहित्य चेतना और समावर्तन में कहानियाॅं प्रकाशित। कहानी संग्रह ‘‘छॅंगुरी‘‘, अनंग प्रकाशन, दिल्ली से 2016 में प्रकाशित। रवीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय भोपाल द्वारा प्रकाशित वृहदाकार कथाकोश ‘‘कथा मध्यप्रदेश‘‘ के छठे खंड में कहानी सम्मिलित। ‘उसके हिस्से की जगह’ काव्य संग्रह, प्रतिश्रुति प्रकाशन, कोलकाता(2018)

पुरस्कार-साहित्य अकादमी म0प्र.0 द्वारा पांडुलिपि पुरस्कार योजना में पुरस्कृत (2016)। भारतीय हिन्दी साहित्य परिषद नयी दिल्ली द्वारा बुडापेस्ट (हंगरी ) में ‘‘साहित्य गौरव सम्मान‘‘ से पुरस्कृत (2017) । म0प्र0 हिन्दी साहित्य सम्मेलन भोपाल द्वारा ‘‘वागीश्वरी सम्मान‘‘ (2016 ) और उर्वशी अन्तरराष्ट्रीय त्रैमासिकी द्वारा ‘‘उर्वशी सम्मान‘‘ (2017)।

यात्राएं: जर्मनी, चेक गणराज्य, स्लोवाकिया, आस्ट्रिया, हंगरी, इटली आदि की साहित्यिक सांस्कृतिक यात्राएँ।

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