ISSN2320-5733

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कविता : बन्द घड़ी बन्द घड़ी
मैं रोज निकलता हॅू
बन्द घड़ी और... राकेश मिश्र

बन्द घड़ी
मैं रोज निकलता हॅू
बन्द घड़ी और
बची हुई थकान के साथ
रास्ते में खड़े मिलते हैं
लोग
हर खड़ा आदमी
इन्तजार में होता है
एक घड़ी की पृष्ठभूमि से
आच्छादित
दृष्टिफलकों से परे
चलती हुई
इन्तजार भी चलता रहता है
घड़ी बन्द होगी
इन्तजार खत्म होगा
समय ठहर जायेगा
मैं भूल जाता हूँ
कई बार कि
मैं थका हुआ हूँ
मेरी घड़ी बन्द है
कभी-कभी
घड़ी को मिलाता हूँ
दूसरी घड़ी से
एक घड़ी को समय
घड़ी ही बताती है
मेरी बन्द घड़ी
जब चलती है
तब मैं लौटना चाहता हूँ
घर
जहॉं नहीं होगी थकान
और
इन्तजार में खड़े
लोग ।


उम्र
आज अचानक ही
एयरपोर्ट पर मिल गया
उम्र का बीता हुआ हिस्सा
बिलकुल पास से छूता हुआ
गुजर गया फिर से ।

शब्दों का देश
शब्दों का देश
परियों का देश नहीं
यहाँ मिल जायेंगे
देवदूतों के वेष में
सौदागर
शब्दों का देश
प्रजा का देश नहीं
यहाँ मिल जायेंगे
शब्दों से सत्ता साधने
तनाशाह
शब्दों का देश
सुचिताओं का देश नहीं
यहाँ मिल जायेंगे
तंगदिल अनुदार
साथी
शब्दो का देश
नीर-क्षीर विवेक का देश नहीं
यहाँ मिल जायेंगे
कुंठित-कुंद-विवेक
मंचस्थ
शब्दों का देश
सूरज का देश नहीं
यहाँ मिल जायेंगे
अपने अंधेरों में सुखी
मतिभ्रम ।

सुनो मॉं
सुनो मॉं
अगर अपनी बॉंहे फैलाकर
तुम्हें कसकर पकड़ लूँ
तो मुझे पता है
तुम चूम लोगी लाड़ से
मेरा माथा
ओढ़ा दोगी ऑंचल
दुलराते – दुलराते
मैं छुप जाऊँगा
तुम्हारी नर्म-नर्म गोद में
सुरक्षित नींद के लिए
सुनो मॉ़ ।

मेरा मन

मेरा मन
पहाड़ की तलहटी का
समतल मैदान है
जहॉं रात की नीरव ठंड के बाद
उषा काल में
गूँजती हैं
समवेत प्रार्थना की आवाजें
फिर दिन के कोलाहल के बाद
हर शाम देखता हूँ
सूरज को लौटते हुए ।

निरीहता

मुझे पता है
निरीहता
आयेगी
एक दिन
मेरे द्वार
एक बड़ा
प्रस्ताव लिये ।

अंधेरे में
अंधेरे में
टटोली गयी हर चीज
एक पूर्वाभ्यास है
हमारी प्रगतिशील दृष्टिहीनता के सापेक्ष
इस बात के भी कि
प्रकाश
हर जगह
हस समय
नहीं रहने वाला ।

परछाईयाँ
परछाईयॉं
कहीं ज्यादा सार्थक
संकेत होती हैं
मूल से भी ज्यादा
व्यथा होती है
उनमें ।

गर्दने
गर्दनें
प्रेम का निरापद स्थान है,
गर्दने नहीं होती तो
प्रेमी कहॉं जाते !
गर्दनें नहीं होती तो
फॉंसी भी कैसे होती !
गर्दने नहीं होती तो
शेर भी कहॉं होता !
गर्दने नहीं होती तो
जंगल भी नहीं होते,
गर्दने नहीं होती तो
ये धरती तो होती ही नहीं ।

भूख
भूख
नहीं सुनती चीख
वह
केवल मिटना जानती है ।
भूख
नहीं देखती बेबसी
उसे
संतुष्ट होना होता है ।

चॉंद
दिन चढ़े
सफर में अटका हुआ
चॉंद
अक्सर
प्रेसवार्ता करता है
अपने सफर की ।

राकेश मिश्र
538 क/90 विष्णु लोक कालोनी
मौसम बाग, त्रिवेणी नगर 2
सीतापुर रोड, लखनऊ, उ0प्र0,
226020
पूर्व प्रकाशित कृतियांं
1- चलते रहे रात भर
2- जिन्दगी एक कण है
3- अटक गयी नींद
मोबाइल न. 9205559229

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