ISSN2320-5733

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कविता : दास्तान अभी जिंदा हैं दास्तानें
अपनी खामोशियों में
रह-रह के लेती हैं अंगड़ाईयाँ... डॉ. अनंत विजय पालीवाल

अभी जिंदा हैं दास्तानें
अपनी खामोशियों में
रह-रह के लेती हैं अंगड़ाईयाँ...
जाने कितनी ही उबासियाँ
दे देती हैं शब्द
और बयाँ करती हैं
अपनी दास्तान।

कभी हौले से बुदबुदा
जाती है कानो में
दे जाती हैं दस्तक
उन लम्हों की, जो
अनसुने से रह जाते हैं
कई बार...

करवट दर करवट
चरमराती सिसकियाँ
उलटती हैं जज़्बात
उन बेपर्द आँखों की
जिनमे दफ्न हैं
आज भी वे शब्द
जो गए थे गढ़े
कभी दास्तानों में
वर्गों के खांचों में सिमटी
सदियों की पीड़ा
देती धार
उन शहतीरों को,
जो हैं चुभतीं
उन अनसुनी आँखों में
जिनसे रिसते लफ्ज़
ढूंढते खुद के लिए
अपने दरख्त अपनी जमीन
आज भी...

फटी बिवाईयों से रिसते
खून के महावर
क्यूँ रंगते राजपथ?
उन सियारों के लिए
स्याह है जिनका रक्त
आज भी...

आज भी लहुलुहान है दरख्त
फिर उधड़े हैं उनके वर्क
लिखा था गर्म नाखूनों से
कुछ सिसकियों को उन पर
स्याह थी या सुर्ख?
विवाद पुराना, तर्क नए
विचारधाराओं में अलहदा,
आज भी...
देते हैं दम तोड़
असलहों की खनक में
कुछ सुर्ख चेहरें
कुछ सुर्ख दास्तानें।

डॉ. अनंत विजय पालीवाल
मोबाइल न. 9899657399

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