ISSN2320-5733

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कविता जहां तक दृष्टि जायेगी, दिखेंगे कपट छल वाले डॉ. गोरख प्रसाद मस्ताना

जहां तक दृष्टि जायेगी,दिखेंगे कपट छल वाले
चुराते सुसपन मड़ई की हैं ऊंचे महल वाले
थे कल जो कथरियों में ,आज भी उनका है चिथड़ों में
रहे,जी, कांदो माटी में, कुदाली खूरपी हल वाले
किसी ने कोबरा को सुधा बरसाते है देखा क्या
अमृत की खान बनते वे,जो मन के हैं गरल वाले
वसन है शुभ्र तो क्या मान लें,मन भी कंवल होगा
तिजारत धर्म की करते,हैं बनते गंगा जल वाले
जहां हम,धरती धन सब कुछ यहां के मूल वासी का
असल का हड़प के सब जी रहे ,सारे नकल वाले
नदी अश्रु की भर के है लबालब,छलक ना जाये
प्रलय में इसके ना बच पायेंगे भूतल अतल वाले
घनी बेचैनियां वितरण में जो हैं,व्यस्त हर एक पल
अशांति बांटने वाले कहें हम, शांति दल वाले।

डॉ. गोरख प्रसाद मस्ताना,
Hindi Profesor Raj Iner College Bettiah

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