ISSN2320-5733

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मातंगी झा की पाँच ग़ज़लें सच्ची ख़बरें खो गई हैं झूठे इश्तहारो में डॉ. मातंगी झा

एक
सच्ची ख़बरें खो गई हैं झूठे इश्तहारो में
बस क़सीदे ही मिले हैं आजकल अखबारो में
ना कोई तालीम और ना इल्म की दरकार है
बस ख़ुशामद ही चले हुक्मरानों के दरबारों में
जालसाज़ी बेइमानी झूठ के जलवे यहाँ
खूब चलता खोटा सिक्का सियासत के बाज़ारों में
जब भी कहते सच तो सारे दोस्त हो जाते ख़फ़ा
अक्ल कहती तू भी शामिल हो जा अब मक्कारों में
क्या सही है क्या गलत यह फैसला आसां नही
हमने देखें हैं फ़रिश्ते शामिल गुनहगारों में
कौन जो आकर बताये क्या धरम इंसान का
खुद खुद़ा ही क़ैद है जब मज़हबी दीवारों में
वक्त की आँधी के आगे क्या महल क्या झोंपड़ा
कल जमीं पर वो भी होगे जो हैं आज मीनारों मे में
एकबार बेरंग दुनिया से जो वाक़िफ़ हो गया
फिर कोई रंगीनियां उतरे ना दिल के दयारों में

दो
रहने भी दो छोड़ो भी अब शिकायत करे कौन
कोई ना सिरफिरा यहाँ बग़ावत करे कौन
जब सर उठाने पे ये गर्दन कट भी सकती है
तन कर खड़े होने की फिर हिमाक़त करे कौन
मँझधार में हो कश्ती नाखुदा नहीं कोई
ऐसे में तूफ़ान से भला अदावत करे कौन

अर्ज़ी नहीं पेशी नहीं ना कोई सुनवाई
फिर क्या कोई मुक़दमा अदालत करे कौन
पिंजरे को ही घर अपना समझ लें जो परिंदे
तुम ही कहो उनकी भला ज़मानत करे कौन

तीन
उलझन मे ही कटे उम्र यह बोलो शर्त हमारी थी क्या
लाख जतन जीने की थी पर मरने की तैयारी थी क्या
ना कुछ सोचा ना कुछ पूछा बेपरवाह ही रहे हमेशा
बेमक़सद जिए जाने की ऐसी भी लाचारी थी क्या
मोड़ पे लाकर उसने छोड़ा और नही फिर कभी पुकारा
शाम-ओ-सहर तनहा चलने की ज़िद ये सिर्फ हमारी थी क्या
ज़ख़्म लगाया मर्ज़ बढ़ाया कोई दवा भी काम ना आयी
मौत ने आकर इक दिन पूछा आखिर ये बीमारी थी क्या
कल तक जो हमपर हँसते थे आँख मे उनके आंसू देखे
हम तो पहले ही घायल थे उनकी भी अब बारी थी क्या
तेरी मेरी इसकी उसकी सबकी सबने बातें सुन ली
लेकिन किसने किससे पूछा किसकी ज़िम्मेदारी थी क्या
खुद को गिरवी रख कर तूने क्या ऊँचा ओहदा है पाया
दीन इमान धरम भी भूले शोहरत इतनी प्यारी थी क्या
वो जो बैठे आसमान पे दिल यह चाहे उनसे पूछें
इसको लूटा उसे दबाया यह ही दुनियादारी थी क्या !

चार
मर्ज़ ऐसा कि जिसकी ना दवा कोई
ना खुदा काम आये ना ही दुआ कोई
कोई तो बताये है शरारत ये किसकी
की ख़ता किसी ने पाये सजा कोई

दूरियाँ हो दरमियाँ वक़्त का ये फ़ैसला
दिल को नामंज़ूर मगर फ़ासला कोई
कामगार कारोबार सब हुए तबाह है
ग़म-ए-रोज़गार की भी इंतहा ना कोई
मौत है गले पड़ी साथ चले भुखमरी
दर - बदर भटक रहा बे-ख़ानुमाँ कोई
जो है रखे हाथ सर पे कहर भी बरपाये वही
क्या बताये तर्ज़-ए-जफ़ा-ए-आसमाँ कोई

पाँच
खुद से ख़फ़ा खुद से ही तू बेज़ार क्यों है
क्यूँ है गिला खुद से करे तकरार क्यों है
रह रह के सुलगती हैं साँसें भला क्यों
दिल मे उठे चिनगारी बार बार क्यों है
आँखों मे छा रहा है आज कैसा ये धुआँ
सीने मे धड़कता दिल-ए-ना-चार क्यों है
हमने तो दर्द से लिया था काम दवा का
फिर आज ये दीदा-ए-खू़ँ-बार क्यों है
गुज़री तमाम उम्र ख़िजाँ की पनाह में
वो पूछते दामन मे तेरे ख़ार क्यों है
हमने जो सच कहा तो बुरा मान गये लोग
कहते हैं झूठ से तुझे इंकार क्यों है
हमने भी एक सवाल उनसे पूछ ही लिया
लब खोलना इस क़दर यहाँ दुश्वार क्यों है
जो धड़के मुझमे तुझमें भी तो धड़के है वही
फिर दो दिलो के बीच ये दीवार क्यों है
कल तक था दोस्तों का कारवाँ हमारे साथ

फिर आज बन गये सभी अग्यार क्यों हैं
कहने लगे वो दिल की बात दिल मे दफ़्न कर
तुझमें ही आखिर जुर्रत-ए-इज़हार क्यों है
छाये ग़ुबार गर्द-ए-राह जो कभी उसपर
मत पूछ ये आसमां को नागवार क्यों है
एलान-ए-हक़ चढवायेगा सूली पे किसी रोज़
मत कहना तेरे ख़ातिर रसन-ओ-दार क्यों है
इस बार पूछ लिया है मगर फिर ना पूछना
नफ़रत की जीत मुहब्बत की सदा हार क्यों है

डॉ. मातंगी झा
दिल्ली

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