ISSN2320-5733

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कविता इस लॉकडॉउन ने मुझे अपने से मिलवाया
इस लॉकडॉउन ने बहुत कुछ सिखाया डॉ. मोनिका कौल

इस लॉकडॉउन ने मुझे अपने से मिलवाया
इस लॉकडॉउन ने बहुत कुछ सिखाया
जतलाया कि,
परिवार से बेहतर किसी का साथ नहीं
बतलाया कि मेरे घर में ही है कितनी हसीं
कराया सैर मुझे घर के हर कोने तक
निकाले मैंने पुराने ख्वाब अलमारियों से
जब टटोली मैंने अलमारियां
नजर आयीं अपने बच्चो की
बचपन की किलकारियां व खिलौने
ऊन की बुनी मेरी माँ के हाथ का स्वेटर
जो भेजा था उन्होंने उसके आने से पहले ही कूरियर से
उसकी कॉपी जिसपे बनाई थी नूपुर आंटी ने
स्माइली और टॉफी
उसकी वो बॉल जिसपे लिखा था 'ऑलवेज बी हैप्पी'.
कितनी यादें लॉकडॉउन से ताज़ा हुई
कितनी बातें हैं जिन्हें याद करके मैं खूब रोई
फिर एक कागज निकला
नौकरी का इश्तहार था जिसमें
याद आया
कितनी दूर तलक गयी थी
इंटरव्यू के लिए
बस में सबकुछ जो बिता हुआ था
जैसे चलचित्र की तरह सामने आया
सोच रही थी
इतनी मेहनत करके अपनों से दूर रह के मैंने क्या पाया
इस लॉकडॉउन ने मुझे बहुत कुछ बतलाया
इस लॉकडॉउन ने गुजरा वक्त याद दिलाया
जिंदगी जैसे सिमट के रह गयी थी
कॉलेज से घर और घर से कॉलेज
कुछ दिखता ही नहीं था इससे हट कर
मैं भूल गयी थी
अपनी मिटटी की वो सौंधी खुशबू
कहीं खो गयी थी बचपन की सारी जुस्तजू
पर
इस लॉकडॉउन ने गुजरा जमाना याद दिलाया
इस लॉकडॉउन ने बहुत कुछ समझाया
बचपन में सोचा था खुद के लिए नहीं जियूँगी मैं
कुछ समाज के लिए
कुछ देश के लिए जरूर करुँगी मैं
सोचा था डॉक्टर बनी तो मुफ्त में इलाज करुँगी
न बनी तो टीचर बनके ही शिक्षा का प्रचार करुँगी
पर
मैं तो बन कर रह गयी एक सरकारी नौकर और
ऐसे ही दिन बितते गए हर पल
पर
अब इस लॉकडॉउन ने मुझे है जगाया
जो करना रह गया है वो सब याद आया..

डॉ. मोनिका कौल
प्रोफेसर, हंसराज कॉलेज, दिल्ली

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