ISSN2320-5733

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कविता यह किसने सोचा था कि
इस तरह मुड़ेगी जीवन शैली... राकेश प्रताप यादव (अंकुर )

यह किसने सोचा था कि
इस तरह मुड़ेगी जीवन शैली।
सारा सपना टूटेगा
हर उम्मीदे होंगी मैली ।

जीवन के अर्धसफर में सहसा
जीवन नौका रुक जायेगी ।
अनजाने दुश्मन के आगे
सारी ताकत झुक जायेगी ।

आज तेरे हर कदमों पर
अनचाहा पहरा लगता है ।
तुझको गैरों से ज्यादा
अपनो से खतरा लगता है।

देखो मौत आ रही है, अब
कितने चेहरे बदल बदल कर।
ये वक्त बड़ा ही जालिम है
रहना सम्भल सम्भल कर ।

सूरज की सुन्दर लाली
अब अंगार बन गई है।
ये धरा काल के गालों में
आहार बन गई है ।

प्रतिपल गूंज रही हैं ,चीखें
अम्बर की अंगनाई तक ।
करुण वेदना फैल चुकी है
सागर की गहराई तक ।

चंदा की शीतल छाया भी
हृदय विदारक बन बैठी।
कानन की उत्तम औषधियां
हानिकारक बन बैठी ।

हवा का रुख तेरे विपरीत
इशारे करता उछल उछल कर।
ये वक्त बड़ा ही जालिम है,
रहना सम्भल सम्भल कर ।

युवा कवि, राकेश प्रताप यादव (अंकुर )
महराजगंज, आजमगढ़
उत्तर प्रदेश
मोबाइल न. 8009679618

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