ISSN2320-5733

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कविता : तुम्हारे नाम एक चाहत सी शायद पनपती होगी
तुम्हारे मन में, रुचिका मान

एक चाहत सी शायद पनपती होगी तुम्हारे मन में,
कोई राधा सी होती तुम्हारे जीवन में...
वो भरती नित नए रंग तुम्हारे आँगन में,
और तुम बजाते बंसी फिर उसके लुभावन में....
वो होती कोई अदाकारा....सजती, संवरती तुम्हें रिझाने-सताने को,
महकती भी, चहकती भी, इठलाती तुम्हें अपना बनाने को....

और तुम, तुम जो कहते हो कान्हा खुद को....
तुम देखते उसकी अठखेलियाँ, मदहोश, बेचैन से होते, उसके हो जाने को,
पल भर में बहकते तुम, दुनिया भुलाते, आतुर उसका साथ पाने को....
और फिर जब आती कोई रुक्मिणी तुम्हारी बन कर तुम्हारा साथ निभाने को,
तुम कहते उसे.....

"देखो प्रिये, मैं तो राधा का हूँ सदा से, मुझे मत कहना उसे भुलाने को...
मेरा मन-वचन किसी और का है,
मत कहना तुम मुझे कभी तुम्हारे लिए बंसी बजाने को..."

या शायद, तुम बस मुस्कराते और कभी कुछ ना कहते,
चुप्पी ठान, बस साधु बने रहते...
और वो, पटरानी तुम्हारी, तुम्हारी हो कर भी, निशब्द, स्तब्ध होती,
सब समझती, कुछ ना कहती, मौन रहती....
जैसे मैं हूँ.
तुम्हारे इंतजार में. सदियों से, मानो ठहरी हुई...
तुम्हारी प्रेयसी सी भीड़ में, सबसे पीछे, चुप चाप.

मुमकिन है -
किसी राधा सी मुझमे आग ना हो,
रुक्मिणी का भी ठहराव ना हो....
ना मीरा सी मुझमें आस हो,
ना गोपियों सी प्यास हो...

मगर मैं हूँ, बस हूँ, शायद

तुम्हारे पास. अपना सादापन और साधारण से भाव लिए,
बातों में लिपटी रातें, हसरतें और चंद एहसास लिए…..
तुम्हारे इंतजार में.
और मैं बस तुम्हारी बन कर रहना चाहती हूँ, यूँ की यूँ...
बिना खास हुए....

और मुझे इंतजार है...तुम्हारे प्रेम का...
वो प्रेम जो मेरे हिस्से का, मेरा, बस मेरा होगा.
बेशक तुम्हारी तरह, खामोश सा….
तुम्हारे हर कहे-अनकहे लफ्ज़ में लिपटा…..
मगर मेरी हर बचकानी जिद्द में सिमटा....
घबराता, डगमगाता, शर्माता, मगर मेरा.

तो हो सके तो किसी दिन तुम मेरे हो कर मेरे पास आना
मुझे समझाना...मुझे फिर से बताना, कि तुम्हारा प्रेम है, साधारण ही. क्यूंकि
मुझे देवी होना नहीं आता.
तो देखो, मैं राह देख रही हूँ, उस दिन की जब तुम आओगे,
सचमुच मेरा हाथ थामोगे, और मैं एक बार फिर से डगमगाउंगी.
तुम आना, अपनी दबी हुई चुप्पी में मुझे फिर से समेटना,

और मुझे बताना....

प्रेम लिख देना ही प्रेम नही होता.
प्रेम कर लेना प्रेम नही होता.
प्रेम में होना प्रेम नहीं होता.

तुम्हारा मुस्कुराना प्रेम होता है!
मेरा डूब जाना प्रेम होता है!
हमारा पार हो जाना प्रेम होता है!

मेरा तुम हो जाना प्रेम होता है
तुम्हारा मैं हो जाना प्रेम होता है.

प्रेम निभाना भी प्रेम होता है!

और तुम देखना....जब तुम आओगे, मुझे सब समझाओगे,
मैं समझूँगी तुम्हें,
हर रोज़ की ही तरह.
ठहर जाऊंगी मैं , तुम पर, तुम्हारी हर बात पर. फिर से.
मज़बूत हो कर.
तुम आओ तो सही. एक बार. सच में आओ.
यूँ ही.

रुचिका मान
युवा कवियत्री
मोबाइल न. +919560291012

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