ISSN2320-5733

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लेख ‘बालकृष्ण भट्ट एवं बालमुकुन्द गुप्त के गद्य में विद्यमान नवजागरण-कालीन चेतना मनीष, सहायक प्राध्यापक,हिंदी विभाग, हंसराज कॉलेज

बालकृष्ण भट्ट (1844 ई॰-1914ई॰) एवं बालमुकुन्द गुप्त (1865ई॰-1907ई॰) की चेतना पर विचार देश-काल व वातावरण एवं वर्तमान प्रासंगिकता के संदर्भ में ही किया जा सकता है। उनकी रचनाएँ निश्चय ही नवजागरण कालीन चेतना से संबद्ध हैं। बालकृष्ण भट्ट साहित्यिक-सांस्कृतिक संसार में पहले सक्रिय होते हैं तो बालमुकुन्द गुप्त की सक्रियता दुर्भाग्यवश पहले ही समाप्त हो जाती है। इस प्रकार इनका रचना काल लगभग समान ही है। नवजागरण कालीन चेतना के जितने भी आयाम हो सकते हैं, इनकी रचनाओं में मौजूद है। रामस्वरूप चतुर्वेदी ने नवजागरण को परिभाषित करते हुए लिखा है–
“पुनर्जागरण दो जातीय संस्कृतियों की टकराहट से उत्पन्न रचनात्मक ऊर्जा है।”

19वीं सदी का नवजागरण निश्चय ही भारतीय एवं ब्रिटिश संस्कृतियों की परस्पर टकराहट से उत्पन्न ‘रचनात्मक ऊर्जा’ का परिणाम है। 19वीं सदी के उतरार्द्ध में नवजागरण के दो क्रियात्मक स्वरूप स्पष्ट रूप से रेखांकित किये जा सकते हैं। पहला, समाज सुधार एवं दूसरा राष्ट्रीय आन्दोलन। नवजागरण के दोनों स्वरूप एक-दूसरे से भिन्न नहीं बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। दोनों मिलकर ही नवजागरण की प्रक्रिया को संपन्न करते हैं। बालकृष्ण भट्ट एवं बालमुकुंद गुप्त दोनों में ही नवजागरण की चेतना को पूर्णता में देखा जा सकता है। किन्तु इनमें समाज-सुधार एवं राष्ट्रीय-आन्दोलन संबंधी चेतना में अनुपात की विभिन्नता ध्यान देने योग्य है।

बालकृष्ण भट्ट के गद्य में सांस्कृतिक जागरण का रंग अधिक गहरा है। उन्होंने 1877 ई॰ से ‘हिन्दी-प्रदीप’ का संपादन प्रारंभ किया था। प्रारंभ में ही भट्ट जी ने ‘हिन्दी-प्रदीप’ का लक्ष्य ‘समाचार पत्र की आवश्यकता’ नामक निबंध में स्पष्ट कर दिया था–

“‘हिन्दी बर्द्धनी’ सभा के सदस्य जो मेरे (हिन्दी प्रदीप) जन्मदाता हैं उन्हें पत्र को प्रकाशित करने से कदापि यह प्रयोजन नहीं है कि मुझे (हिन्दी प्रदीप) चलाकर रूपये एकत्रित करें, बल्कि देश की बुराइयों का शोधन, भलाई का संचार और उन्नति उन महापुरुषों का मुख्य तात्पर्य है।” भट्ट जी ने हिन्दी-प्रदीप का अलख इसलिए जगाया था ताकि देश में सोई पड़ी राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक चेतना को जगाया जा सके। साथ ही जन-समुदाय की राजनीतिक उदासीनता को समाप्त कर उन्हें राजनीतिक रूप से सक्रिय किया जा सके।

इसी संबंध में भंगड़ शिवशम्भु शर्मा भी एक लेखक व संपादक (भारत-मित्र) की हैसियत से स्वयं को जन-प्रतिनिधि के रूप में घोषित करता है। बालमुकुन्द गुप्त कहते हैं–“वह इस देश की प्रजा का, यहाँ के चिथड़ा-पोश कंगालों का प्रतिनिधि होने का दावा रखता है। क्योंकि उसने इस भूमि में जन्म लिया है।”

यहां दोनों ही लेखक प्रकारांतर से एक ही बात कह रहे हैं तथा एक-दूसरे को बल प्रदान करते हुए नज़र आते हैं। गुप्त जी लेखक या संपादक को जनता का प्रतिनिधि घोषित करते हैं जो सरकार से प्रश्न पूछ सकता है तो बालकृष्ण भट्ट समाज को सँवारने एवं राष्ट्र-निर्माण में एक संपादक या लेखक की भूमिका निर्धारित करते हैं।

बालकृष्ण भट्ट की सामाजिक-राजनीतिक चेतना तत्कालीन परिस्थितियों के अनुरूप तथा एक जिम्मेवार संपादक के अनुकूल है। वह समाज में व्याप्त तमाम कुरीतियों, अंधविश्वासों, धार्मिक पाखंड, एवं बाह्यआडम्बरों का विरोध करते हैं। वह समाज को प्रगति के पथ पर अग्रसर करने के लिए प्रेरित भी करते हैं। भट्ट जी विधवा-पुनर्विवाह का समर्थन, बाल-विवाह का विरोध, एवं पर्दा-प्रथा की आलोचना करते हैं। बालकृष्ण भट्ट के निबंधों पर ध्यान दें तो एक महत्त्वपूर्ण तथ्य सामने आता है कि तत्कालीन समाज-सुधार का मसला, मुख्यतः स्त्री-समस्या के इर्द-गिर्द ही केन्द्रित था। धर्म व जाति का मसला भी महत्त्वपूर्ण था किन्तु स्त्री-समस्या के उन्मूलन पर ध्यान अधिक केन्द्रित था।

बालकृष्ण भट्ट का लेखन केवल उन स्त्री संबंधी समस्याओं की समाप्ति तक ही सीमित नहीं था जिसके कारण समाज प्रगति नही कर पा रहा था। यह कार्य तो राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर आदि नवजागरण के अग्रदूतों ने पहले ही कर दिया था। भट्ट जी स्त्री-प्रश्न के मामले में कई बार अपने युग एवं युगीन रचनाकारों, समाज-सुधारकों से कहीं आगे दिखाई देते हैं। वह 1891 ई॰ में बिना किसी शोर-शराबे के उस स्त्री-पुरुष समानता की वकालत कर रहे थे जिसकी बुनियाद पर आधुनिक ‘नारीवाद’ का मजबूत महल खड़ा है। वह ‘स्त्रियाँ’ निबंध में कहते हैं–

“कौन सी चीज़ है जिसमें औरतें मर्द से अधिक बड़ी-चढ़ी नहीं हैं। जहाँ-कहीं वे पढ़ाई-लिखाई जाती हैं वहाँ स्त्रियाँ पुरुषों के ऊपर हो गई हैं। हमारे यहाँ के ग्रंथकार और धर्मशास्त्र गढ़ने वालों की कुंठित बुद्धि में न जाने क्यों यही समाया हुआ था कि स्त्रियाँ केवल दोष की खान हैं, गुण इसमें कुछ हई नहीं।”

ऐसा भी नहीं है कि भट्ट जी किसी दुर्घटना के तहत स्त्री-पुरुष समानता की बात कह गये। वह पुनः 1894 ई॰ में ‘धर्म का महत्व’ निबंध में स्त्रियों को शिक्षित करने की सिफारिश करते हैं। यहाँ भी वह अपने युग की सीमा का अतिक्रमण करते हैं। 1909 ई॰ में ‘हिन्द स्वराज’ में महात्मा गाँधी भी स्त्री-शिक्षा पर जोर देते हैं। किन्तु वह स्त्रियों को सामान्य शिक्षा नहीं बल्कि गृह-विज्ञान (होम साइंस) की शिक्षा देने की पैरवी करते हैं। बाद में गाँधी जी अपने मत में संशोधन करते हुए स्त्रियों तथा पुरुषों को समान शिक्षा प्रदान करने पर सहमत होते हैं। यह आश्चर्यजनक ही है कि बालकृष्ण भट्ट 1894 ई॰ में ही स्त्रियों को सामान्य तथा आधुनिक शिक्षा प्रदान करने की आवश्यकता पर बल देते हैं–

“कितनों का मत है कि स्त्री शिक्षा इसके संबंध में उपकारी है पर हम पूछते हैं क्या इसी तरह की स्त्री शिक्षा हमारे लिए कारगर होगी जैसा आज तक हुई और होती जाती है? कभी नहीं। जैसी शिक्षा अब तक हुई उसे देख हमें शरम आती है और हंसी आती है। ... इनको अब तालीम की जरूरत है तो उस तरह की तालीम होनी चाहिए जिसमें इनके नेत्र खुलें। भूगोल, इतिहास भांति-भांति के विज्ञान इन्हें सिखाये जाएँ और ठीक-ठीक मन में इनके बैठ जाएँ कि जो हम कर रही हैं और अब तक करती आईं वह धर्म का आभास मात्र निरा अधर्म है।”

स्त्री-प्रश्न के अलावा भट्ट जी अन्य समाज-सुधारकों की भांति जातिगत भेदभाव, छूआछूत आदि का विरोध तार्किक आधार पर करते हैं। वर्ण-व्यवस्था के विषय में उनके विचारों में कहीं-कहीं अंतर्विरोध भी दिखता है। किन्तु वह ब्राह्मण श्रेष्ठता को सिरे से ख़ारिज करते हैं। भट्ट जी क्षत्रिय वर्ण को भी धर्म-ग्रंथ में निहित अपने कर्त्तव्यों से विमुख पाते हैं। वह मूलतः वर्ण-व्यवस्था का पुनर्मूल्यांकन कर रहे होते हैं। निष्कर्ष के तौर पर वह जहाँ पहुँचते हैं, उससे वह प्रगतिशील ही साबित होते हैं। क्योंकि उनके लिए, “हिन्दू धर्म और रीति-नीति अब इस समय घिन के लायक हो रही है सो इसलिए कि उसका नयापन बिलकुल खो गया। ... क्योंकि जिस बात से हम आगे बढ़ सकते हैं और जिसके प्रचलित होने से हमारी कुछ बेहतरी है वह सब इस सनातन के विरुद्ध है। आपस का सह-भोजन, पन्द्रह या सोलह वर्ष के ऊपर की कन्या का विवाह, एक वर्ण के दूसरे वर्ण के साथ योनिक-सम्बन्ध, विवाह, दूसरे देशों में आना जाना इत्यादि जितनी हमारी भलाई की बातें हैं सबों को सनातन धर्म मना करता है।”

दलित-समस्या चाहे वह छूआछूत हो या आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक असामनता; सभी का समाधान प्रस्तुत करते हुए डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर सवर्णों एवं दलितों के बीच बेटी-रोटी का परस्पर आदान-प्रदान का सुझाव देते हैं। इस सम्बन्ध में बालकृष्ण भट्ट के विचारों को क्रांतिकारी ही कहा जाएगा क्योंकि वह 1893 ई॰ में, डॉ॰ अम्बेडकर से पहले यह बात कह रहे थे।

बालकृष्ण भट्ट धर्म-मात्र की विशेषतः हिन्दू धर्म की सम्यक आलोचना करते हैं। नवजागरण के समय धार्मिक रूढ़ियों, अंधविश्वासों, बाह्य-आडम्बरों का विरोध तो आम बात थी। भट्ट जी धर्म की प्रासंगिकता का निर्धारण तार्किक धरातल पर करते हैं। वेद जिसे अपौरुषेय तथा तर्कातीत माना गया है, भट्ट जी उसकी भी विवेचना आधुनिक वैज्ञानिक पद्धति से करते हैं। वेद-पुराण की आलोचना आज भी एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। भट्ट जी 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में ही इस चुनौती को स्वीकार करते हैं। वह शंकराचार्य एवं गुरुनानक की आलोचना व मूल्यांकन करने से भी नहीं चुकते। दरअसल वह उस रचनात्मक साहस का परिचय देते हैं जो किसी वैचारिक रूप से प्रगतिशील साहित्यकार के लिए अनिवार्य शर्त है। बालकृष्ण भट्ट धार्मिक भेदभाव व कट्टरता को जातीयता (nationality) के विकास में बाधक मानते थे। ‘साहित्य जनसमूह के ह्रदय का विकास है’ नामक निबंध से एक उदाहरण द्रष्टव्य है– “हमारी विद्यमान छिन्न-भिन्न दशा, जिसके कारण हजार-हजार चेष्टा करने पर भी जातीयता हमारे में आती ही नहीं, सब पुराण ही की कृपा है।”

यहीं पर इस पर भी विचार कर लिया जाए कि हिन्दी में ‘जातीयता’ पर विचार करने वाले कदाचित पहले चिंतक के रूप में बालकृष्ण भट्ट हमारे सामने आते हैं। वह ‘जातीयता के गुण’ एवं ‘जातियों का अनूठापन’ नामक निबंध में सचेत होकर जातीयता की अवधारणा एवं उसके विभिन्न व्यावहारिक पक्षों पर विचार करते हैं। इस प्रकार भट्ट जी भारत को एक ‘आधुनिक राष्ट्र’ के रूप में संगठित करने का प्रयास करते हुए नज़र आते हैं। बालमुकुन्द गुप्त समाज-सुधार के विभिन्न मुद्दों पर प्रायः मौन हैं। उनका ध्यान राष्ट्रीय-आन्दोलन की तरफ अधिक है। उन्होंने प्रसंगवश भले ही समाज-सुधार के एकाधिक मुद्दों पर विचार कर लिया हो किन्तु सचेत रूप से उनमें यह प्रयास नहीं दीखता। समाज-सुधार से संबंधित निबंधों में ‘जिये सो खेले फाग’ को देखा जा सकता है। इसमें वह वर्ण-व्यवस्था व हिन्दू धर्म की उत्सव-धर्मिता तथा उसकी प्रासंगिकता पर विचार करते हैं। मुख्यतः वह राष्ट्रीय-आन्दोलन से जुड़े हुए प्रश्नों पर ही विचार करते हैं। बालकृष्ण भट्ट भी राष्ट्रीय-आन्दोलन के लिए वातावरण-निर्माण का महत्त्वपूर्ण कार्य करते हैं। किन्तु दोनों के विचारों में एक बुनियादी फर्क नज़र आता है। बालकृष्ण भट्ट 1857 की क्रांति की विफलता के बाद राष्ट्रीय-आन्दोलन के लिए पृष्ठभूमि तैयार कर रहे थे। कांग्रेस के ‘गरम दल’ के सक्रिय कार्यकर्त्ता एवं ‘हिन्दी-प्रदीप’ के संपादक होने के नाते; वह साम्राज्यवादी शोषण के विभिन्न स्वरूपों का उद्घाटन कर रहे थे। किन्तु बालमुकुन्द गुप्त अपने निबंधों में सीधे-सीधे राष्ट्रीय आन्दोलन का झंडा बुलंद किये हुए थे। उनके निबंधों में साम्राज्यवादी शोषण का स्वरूप तो उद्घाटित हुआ ही है, साथ ही ब्रिटिश शासन का प्रत्यक्ष व मुखर प्रतिरोध भी ध्यान देने योग्य है। ‘शिवशम्भु के चिट्ठे’ श्रृंखला के तमाम निबंध इस बात के प्रमाण हैं।

बालकृष्ण भट्ट अपने निबंध में अंग्रेजी-शासन में आर्थिक शोषण के विभिन्न पहलुओं का विवेचन भर कर देते हैं। इनके ‘आय-व्यय’ निबंध से एक उदहारण प्रस्तुत है जिसमें वह भारत की विपन्नता के लिए अंग्रेजों को जिम्मेवार ठहराते हैं– “देश का सबसे बड़ा आय धरती की उपज है। ... किन्तु सरकारी लगान इतना अधिक है कि देश के लिए उसका आय का द्वार कहते मन सकुचाता है। इसलिए कि इस आय का जो कुछ सारांश या हीर है वह विलायत ढो जाता है केवल मेहनत का हक्क मात्र बचा रहता है।”

इसी निबंध में वह व्यापार, उद्योग, खनिज पदार्थों व बहुमूल्य धातुओं के उत्खनन के माध्यम से होने वाले चौतरफा शोषण का सूक्ष्म विवेचन करते हैं। इसके अलावा ‘महादुर्भिक्ष’ निबंध में भट्ट जी अकाल को प्राकृतिक परिघटना मानने से इनकार करते हैं। वह इसे भी अंग्रेजों द्वारा आर्थिक शोषण यथा खेतों पर नगद लगान, कृषि-सुधार की अनदेखी एवं अधिशेष (surplus) का निर्यात आदि का परिणाम मानते हैं। वस्तुतः अकाल व्यापारिक असंतुलन का परिणाम है। इससे भट्ट जी की आर्थिक समझ की गहराई का पता चलता है। बालमुकुन्द गुप्त के निबंधों में भी ब्रिटिश शोषण के विभिन्न पहलुओं का विवेचन हुआ है। किन्तु वह बालकृष्ण भट्ट की तरह जनता को सिर्फ जागृत कर के छोड़ नहीं देते। वह इससे आगे बढ़ते हुए इस शोषण के प्रति अपने लेखन द्वारा विद्रोह करते हैं। ब्रिटिश शासन के प्रति विद्वेष फ़ैलाने के जुर्म में लेखकों-संपादकों को जेल भेजा जा रहा था।

ब्रिटिश सरकार के इस निर्णय का विरोध करते हुए साथ ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का समर्थन करते हुए बालमुकुन्द गुप्त लिखते हैं– “(जेल) जाय तो देश और जाति की प्रीति और शुभचिन्ता के लिए। दीनों और पददलित निर्बलों को सबलों के अत्याचार से बचाने के लिए, हाकिमों को उनकी भूलों और हार्दिक दुर्बलता से सावधान करने के लिए और सरकार को सुमंत्रणा देने के लिए। यदि हमारे राजा और शासक हमारे सत्य और स्पष्ट भाषण और ह्रदय की स्वच्छता को भी दोष समझें और हमें उसके लिए जेल भेजें तो वैसी जेल हमें ईश्वर की कृपा समझकर स्वीकार करना चाहिए।”

ब्रिटिश राज के प्रति विद्रोह का यह तेवर न सिर्फ बालकृष्ण भट्ट में बल्कि अन्य समकालीनों में भी मिलना मुश्किल है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि बालकृष्ण भट्ट का गद्य सामाजिक-सांस्कृतिक जागरण को प्रसारित करता है। बालमुकुन्द गुप्त अपने गद्य में आन्दोलन करते हैं। या कह लें कि अपने गद्य के माध्यम से राष्ट्रीय स्वतंत्रता-आन्दोलन में सक्रिय भूमिका निभाते हैं।

भारतेंदु युग को लेकर हिन्दी आलोचना में राजभक्ति एवं राष्ट्रभक्ति का विवाद खासा चर्चित रहा है। यह निर्णय करना मुश्किल होता है कि कोई लेखक राजभक्त था या राष्ट्रभक्त। विशेषकर यह विवाद भारतेन्दु के लेखन से सम्बंधित है। बालकृष्ण भट्ट एवं बालमुकुन्द गुप्त के सम्पूर्ण लेखन से गुजरने के बाद यह कहा जा सकता है कि दोनों ही सच्चे राष्ट्रभक्त थे। इस सम्बन्ध में गुप्त जी का निबंध ‘राजभक्ति’ विशेष ध्यान की माँग करता है। इस निबंध में वह न सिर्फ स्वयं को राष्ट्रभक्त घोषित करते हैं बल्कि राजभक्ति की विवशता का तार्किक कारण भी प्रस्तुत करते हैं। इसके अलावा वह छद्म राजभक्ति की आड़ में खालिस राष्ट्रभक्ति की अभिव्यक्ति की कलात्मक युक्ति का भी विवेचन करते हैं।

19वीं सदी में राष्ट्रीय नवजागरण का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष भाषा के सवालों से भी जुड़ा हुआ था। दोनों ही आलोच्य रचनाकार भाषा के प्रश्न पर सचेत होकर विचार करते हैं। बालकृष्ण भट्ट तो भारतेंदु की भांति ही देश-भाषा की उन्नति के बिना देश की उन्नति को असंभव मानते हैं। भट्ट जी भाषा को धर्म से जोड़ने की सांप्रदायिक प्रवृति के विरोधी थे। वह अपने निबंध ‘ग्रामीण भाषा’ में कहते हैं कि ‘थोडा ही सोचने से यह बात खुल जायेगी कि कुल, जाति या मजहब का बहुत कम असर भाषा पर पहुँच सकता है। भट्ट जी हिन्दी भाषा को समृद्ध करने के लिए उर्दू, अरबी, फ़ारसी, अंग्रेजी के साथ-साथ ग्रामीण व देशज शब्दों को सम्म्लित करने को उचित ही मानते हैं। शर्त यह है कि ये शब्द आम बोल-चाल की भाषा में प्रचलित हो। बालमुकुन्द गुप्त के भाषा संबंधी विचार भी इसी तरह के हैं। वह कहते हैं–

“इस समय हिन्दी के दो रूप हैं। एक उर्दू दूसरा हिन्दी। दोनों में केवल शब्दों का ही नहीं लिपि-भेद बड़ा भारी पड़ा हुआ है। यदि यह भेद न होता तो दोनों रूप मिलकर एक हो जाते।” यह विचार गुप्त जी को राजा शिवप्रसाद ‘सितारेहिंद’ की श्रेणी में खड़ा करता है। किन्तु भट्ट जी तथा गुप्त जी के भाषा संबंधी विचारों को समग्रता में देखें तो यह साबित होता है कि ये भारतेंदु हरिश्चंद्र एवं शिवप्रसाद ‘सितारेहिंद’ को परस्पर विरोधी नहीं मानते। बल्कि दोनों के महत्त्व को एक साथ स्वीकार करते हैं। इसके अलावा बालमुकुन्द गुप्त हिन्दी भाषा में व्यवस्था लाने के लिये भी प्रयास करते हैं। इस कार्य में वह कई बार महावीर प्रसाद द्विवेदी के साथ मिलकर तो कई बार उनके विरोध में जाकर हिन्दी भाषा को एक मानक रूप देने की कोशिश करते हैं। इस प्रसंग में ‘भाषा की अनस्थिरता’ निबंध देखने योग्य है।

बालकृष्ण भट्ट एवं बालमुकुन्द गुप्त नवजागरण के अग्रदूत के रूप में हमारे सामने आते हैं। दोनों के गद्य-साहित्य का अध्ययन कर निष्कर्ष के तौर पर यही कहा जा सकता है कि दोनों मिलकर नवजागरण की सम्पूर्ण छटा का निर्माण करते हैं। नवजागरणकालीन चेतना को समझने के लिए दोनों के साहित्य को एक साथ पढ़ना आवश्यक है। किसी एक के साहित्य के अध्ययन से नवजागरण संबंधी कुछ महत्त्वपूर्ण मुद्दे निश्चय ही छुट जाने की संभावना है।

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