ISSN2320-5733

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लेख राकेश रेणु की कविताई : स्त्री मन की अंतरयात्रा अंकिता चौहान, सहायक प्राध्यापक, मिराण्डा हाउस कॉलेज, दिल्ली

राकेश रेणु से पहली बार हंसराज कॉलेज के एक कार्यक्रम में मिली थी। अच्छा बोले थे। उनसे बात करके भी अच्छा लगा। वक्तव्य के साथ उनके व्यवहार की सहजता ने प्रभावित किया। इधर कुछ दिनों से कविताओं पर लिखने का मन बनाया तो कई कवियों को पढ़ा। राकेश रेणु की कविताओं ने सहज ही आकर्षित किया। चूंकि संग्रह मेरे पास नहीं था सो अंतर्जाल में उलझना पड़ा। नेट से कुछ कविताएं मिलीं।

आजकल की कविताओं में शब्दों की दुनिया जितनी बड़ी है उसमें भावनाओं की जगह उतनी ही कम है। शिल्प और भाषा का चमत्कार तो है लेकिन सामाजिक सरोकार नहीं है। रेणु को पढ़ते हुए मैंने इस अभाव को महसूस नहीं किया। मैं कविता को केवल भावभिव्यक्ति का माध्यम नहीं मानती बल्कि उसके अंदर की सामाजिक प्रतिबद्धता भी मेरे लिए जरूरी है।

राकेश रेणु प्रतिबद्ध कवि हैं। समाज के प्रति। जीवन के प्रति। सबसे बड़ी बात अपने ग्रामीण परिवेश के प्रति। उनकी भाषा में गंवई महक है। उसकी जड़ों में जो सुकून है वह शहरों में रहने वालों के लिए नॉस्टेल्जिया है। लगभग दौड़ती हुई इस दुनिया में खुद से भी ठहरकर बात करने की सुध किसे है? बेसुध होते समाज को प्रेम के लिए भी समय कहाँ है? जी-भर बात करने का शब्द-स्वाद, प्रगाढ़ आलिंगन में बंधकर एक दूसरे की धड़कनों को अपने अंदर महसूस करने की बेचैनी कहाँ बची है? बेचैनी है तो फिर समय कहाँ है? रेणु की कविताओं में यह बेचैनी, शब्द-स्वाद अपनी पूरी ठसक के साथ मिलेंगे।

जब दुनिया लगातार निर्मम होती जा रही है। पांच महीने की बच्ची से लेकर पचास वर्ष तक की स्त्रियों के बलात्कार किए जा रहे हैं। जब प्रेम में मुक्त होने वाली स्त्री के ‘पर’ काटकर उसकी उड़ान को घर की चारदीवारी में सीमित किया जा रहा है। जब प्रेम करने वाली स्त्री को डायन, चुड़ैल और जादूगरानी कहकर सरेआम नंगा किया जा रहा है तब ऐसे स्त्री विरोधी कठिन समय में राकेश रेणु को स्त्री और उसके प्रेम पर सबसे ज्यादा भरोसा है। इतना ही नहीं वह उस प्रेम के जरिए अपनी धरती, सभ्यता और उदासी के बीच फंसे जीवन के मीठेपन को बचा लेने की कोशिश में है

मैं तुम्हें प्यार करता हूँ
क्योंकि तुम पृथ्वी से प्यार करती हो
मैं तुममें बसता हूँ
क्योंकि तुम सभ्यताएँ सिरजती हो
यह दौर प्राकृतिक संपदाओं में जो भी बचा है उसको बचा लेने और उससे प्रेम करने का। जब कविता की देह में जबरन विचारधारा और नारे भरे जा रहे हों तब किसी कवि की चिंता में वन, पर्वत, हवा हो तो समझना चाहिए अभी दुनिया खतरे से बाहर है। राकेश रेणु प्रेम से प्रकृति की यात्रा में कितने सहज हैं आप भी देखिए-
पृथ्वी का खारापन तुमसे
उसके आँचल के जल की मिठास तुम
तुमने सिरजे वृक्ष, वन, पर्वत, पवन
तुमने सिरजे जीव, जन
ओ स्त्री, मैं तुम्हें प्यार करता हूँ
क्योंकि तुम पृथ्वी से प्यार करती हो।
मैं राकेश रेणु की कविताओं में जितना उतर रही हूँ उतना ही मुझे धर्मवीर भारती याद आ रहे हैं। गुनाहों का देवता में वह लिखते हैं- “औरत अपने प्रति आने वाले प्यार और आकर्षण को समझने में चाहे एक बार भूल कर जाये, लेकिन वह अपने प्रति आने वाली उदासी और उपेक्षा को पहचानने में कभी भूल नहीं करती। वह होठों पर होठों के स्पर्शों के गूढ़तम अर्थ समझ सकती है, वह आपके स्पर्श में आपकी नसों से चलती हुई भावना पहचान सकती है, वह आपके वक्ष से सिर टिकाकर आपके दिल की धड़कनों की भाषा समझ सकती है, यदि उसे थोड़ा-सा भी अनुभव है और आप उसके हाथ पर हाथ रखते हैं तो स्पर्श की अनुभूति से ही जान जाएगी कि आप उससे कोई प्रश्न कर रहे हैं, कोई याचना कर रहे हैं, सान्त्वना दे रहे हैं या सान्त्वना माँग रहे हैं। क्षमा माँग रहे हैं या क्षमा दे रहे हैं, प्यार का प्रारम्भ कर रहे हैं या समाप्त कर रहे हैं। स्वागत कर रहे हैं या विदा दे रहे हैं। यह पुलक का स्पर्श है या उदासी का चाव और नशे का स्पर्श है या खिन्नता और बेमनी का।” स्त्री मनोविज्ञान की जो गहन व्याख्या धर्मवीर भारती ने की है राकेश रेणु ने कविता में उस व्याख्या की समीक्षा की है। राकेश रेणु अपनी कविताओं में यह समझाने में सफल होते हैं कि, स्त्री और ईश्वर में एक फर्क है। दोनों सृजन करते हैं लेकिन स्त्री के सृजन प्रक्रिया पीड़ा से उपजी है। उसके सृजन में जीवन मृत्यु का सवाल है लेकिन वह ममता और पुरुष के प्रेम में इतनी डूबी होती है कि वह इस कठिन प्रक्रिया को स्वीकार कर लेती है। पुरुष स्त्री देह के इतिहास, भूगोल और गणित को समझ लेते लेकिन उसका समाजशास्त्र नहीं समझ पाता। वह स्त्री के देह की पूरी यात्रा कर लेता है। लेकिन मन तक पहुंचने की राह भूल जाता है पर राकेश रेणु नहीं भूलते। वह स्त्री के प्रेम को अस्तित्व की तरह स्वीकार करते हैं। हर चीज जो जीवन का आधार है उसे स्त्री से जोड़ते हुए स्त्री के लिए बना दी गई "नारी तुम केवल श्रद्धा हो" की परम्परा को तोड़ते हुए मानवीय जीवन के न्यूनतम सरोकारों से जोड़ते हुए मनुष्य बनाए रखने की कोशिश करते हैं। रेणु की कविता पढ़ते हुए यह बात झूठ लगने लगती है कि ‘स्त्री ही स्त्री की व्यथा व्यक्त कर सकती है’।

रेणु भाषा, दर्शन, शोध और सभ्यता की जड़ में स्त्री की तलाश करते हुए उसकी सृजन शक्ति से उपजे कोमल भाव को शब्दों से चूमते हैं। कोई भी पुरुष स्त्री से प्रेम का इससे सुंदर और सजीव चित्र क्या बना सकता है। दर्शन, शोध, भाषा और सभ्यता की के हृदय में में स्त्री का प्रेम प्लावित करने की कला रेणु ने निश्चित ही किसी किताब से नहीं सीखी होगी। जब भावनाओं का आसमान बड़ा हो तो शब्दों की हैसियत आवारा बादलों जैसी हो जाती है। रेणु के पास भावना भी और भाषा भी। उससे बड़ी बात शब्दों को सही जगह रख देने की कला भी। आप भी देखें-
भाषा की जड़ों में तुम हो
हर विचार, हर दर्शन रूपायित तुमसे
हर खोज, हर शोध की वजह तुम हो
सभ्यता की कोमलतम भावनाएँ तुमसे प्रेम कविताओं में स्त्री के लिए पुरुष जितने भी बिम्ब बनाता है वह या तो फैंटेसी होते हैं या तो कल्पना। यथार्थ की भूमि पर उपजे प्रेम में कल्पना क्षम्य है लेकिन फैंटेसी नहीं है। रेणु अपनी कविता को इन दोषों से बचा लेते हैं। प्रेम उनके लिए स्त्री की अंतयात्रा है। उस यात्रा में वह जितने में कदम आगे बढ़ते हैं स्त्री की सृजनात्मक विविधता को चुनते हुए चलते है। स्त्री जो सीखती और जो सिखाती है वह रेणु के दिमाग की डायरी में नोट है। कविता का एक अंश आप भी देखिए-
कुम्हार तुमसे सीखा सिरजना
मूर्तिकार की तुम प्रेरणा
चित्रकार के चित्रों में तुम हो
हर दुआ, दुलार तुमसे
नर्तकी का नर्तन तुम हो।
संगतकार का वादन
रचना का उत्कर्ष तुम हो।
मैं तुममें बसता हूँ
क्योंकि तुम सभ्यताएँ सिरजती हो ।
अद्भुत, अनोखा और अपरिभाषित लिख देने की अदम्य इच्छा में कविताओं में वह सब लिखा जा रहा है जो विमर्श का केंद्र बने। जिस पर अनायास या सायास बहस हो सके लेकिन रेणु का कवि मन इस बहस से दूर एकांत का कोई कोना अपने लिए चुनता है जिसमें उसके साथ केवल अपना गांव है। उस गांव का सौन्दर्य बोध है और पूरे ठाठ बाट के साथ ठेठ शब्द हैं। इस सुकून देने वाले एकांत में भी स्त्री छांव बनकर छायी हुई है। स्त्री के सौंदर्यबोध की अद्भुत और अनोखी व्याख्या राकेश रेणु के यहाँ है। स्त्री सौन्दर्य को आप राकेश रेणु की नज़रों से देखिए मेरा विश्वास है पारंपरिक प्रतिमान ध्वस्त हो जाएंगे-
वे जो महुए के फूल बीन रही थीं
फूल हरसिंगार के
प्रेम में निमग्न थीं।
वे जो गोबर पाथ रही थीं
वे जो रोटी सेंक रही थीं
वे जो बिटियों को स्कूल भेज रही थीं

सब प्रेम में निमग्न थीं।
वे जो चुने हुए फूल एक-एक कर
पिरो रही थीं माला में
अर्पित कर रही थीं
उन्हें अपने आराध्य को
प्रेम में निमग्न थीं।
स्त्रियाँ जो थीं, जहाँ थीं
प्रेम में निमग्न थीं।
उन्होंने जो किया
जब भी जैसे भी
प्रेम में निमग्न रहकर किया
स्त्रियों से बचा रहा प्रेम पृथ्वी पर।
प्रेममय जो है
स्त्रियों ने रचा।
महुए के फूल बीनते, गोबर पाथते, महुए के फूल बीनते,रोटी सेंकते हुए स्त्री प्रेम में है लेकिन वह ‘बेटियों को स्कूल भेजने’ के प्रति सचेत है। यानी कि स्कूल जाती बिटिया जो एक दिन ‘स्त्री’ बनेगी उसको स्कूल भेजकर उसकी वैचारिक नींव मजबूत करने के प्रति स्त्री सचेत भी है। मैंने अनगिनत कविताओं को पढ़ा है। स्त्री विमर्श के नाम पर स्त्री के मन के सौन्दर्यबोध का जो हमनें नुकसान किया है उसे भी राकेश रेणु बचा लेना चाहते हैं। राकेश रेणु की कविताओं का कैनवास बहुआयामी है। उसमें स्त्री जीवन का बहुरंग है। मैंने जिन कविताओं को आधार बनाया है वह स्त्री जीवन से जुड़ी कविताएं हैं। सबसे बड़ी बाद जीवन के प्रति आस्था का भाव। उत्साह है। उमंग है।

रेणु समझ चुके हैं कि स्त्री मन के भीतर प्रेम और स्नेह की एक आंच होती है जिसके ताप से पुरुष का हृदय कुंदन बनता है। स्त्री रेणु के अंदर इस तरह अपना विस्तार बनाए बैठी है कि वह उसकी व्याख्या जब एक कविता में नहीं कर पाते तो उन्हें स्त्री एक, स्त्री दो, स्त्री तीन से होते हुए स्त्री छह (हो सकता है यह संख्या और अधिक हो। अभी मुझे इतनी ही कविता मिली है) तक पहुंचना पड़ता है। शायद स्त्री जीवन का कोई कोना वह छोड़ना नहीं चाहते। देखिए कविता ‘स्त्री एक’-
एक दाना दो
वह अनेक दाने देगी
अन्न के।
एक बीज दो
वह विशाल वृक्ष सिरजेगी
घनी छाया और फल के।
एक कुआँ खोदो
वह जल देगी शीतल
अनेक समय तक अनेक लोगों को
तृप्त करती।
धरती को कुछ भी दो
वह और बड़ा,
दोहरा-तिहरा करके लौटाएगी
धरती ने बनाया जीवन सरस,
रहने-सहने और प्रेम करने लायक
स्त्रियाँ क्या धरती जैसी होती हैं ?
कवि की स्त्री को धरती के रूप में स्थापित करने की कल्पना को आप यह मत समझिए कि वह स्त्री के प्रति बहुत उदार हैं। इसे उदारता समझने की भूल कर आप कविता की भावना को रेणु की सोच से छोटी कर देंगे। यह समझना बहुत जरूरी है कि रेणु की स्त्रियां सृजन के जितने वृहद रूप हो सकते हैं सब जगह मौजूद हैं। जहां हमारी जड़े हैं, जीवन के तत्व है, किसी भी तरह की कोई उम्मीद है, वहाँ स्त्री है। स्त्री को धरती कहना उनके सृजन से ज्यादा उसके संघर्ष को दिखाना है। धरती सब कुछ सहन करती है फिर भी अन्न देती है। झोपड़ी से लेकर मीनारों – किलों तक को अपने वक्ष पर टिका लेती है। यह उसकी सहनशीलता नहीं बल्कि क्षमता है। स्त्री भी सब कुछ सहती हैं लेकिन ममता और प्रेम में छली जाती हैं। ऐसे छलने वालों से रेणु अनुरोध कर रहे हैं कि स्त्री को एक दो तो वह दो देगी। उसे छलो मत प्रेम सींचो। एक स्त्री के नाते मैं कह सकती हूं कि यह सच है, स्त्री केवल देना जानती है। कभी मन, कभी हृदय तो तन भी। स्त्री जो कुछ भी दे सकती है वह पुरुष के बराबर नहीं है, उससे ज्यादा है। स्त्री किसी से भी किसी भी चीज में अधिक है । पुरुष से भी। मैथिली शरण गुप्त ने लिखा भी है- "एक नहीं दो दो मात्राएं, नर से बढ़कर नारी" ‘स्त्री – दो’ कविता स्त्री को धरती की सृजन प्रक्रिया से उठाकर ब्रह्माण्ड तक की यात्रा से जोड़ती है। रेणु दुनिया की हर सृजन का स्रोत स्त्री को बताते हुए यह सवाल खड़ा करते हैं कि जब सब कुछ स्त्री ने सृजन किया तो पहले कौन आया? शायद स्त्री...अगर हम इस सवाल को यही छोड़ देंगे तो बात बिगड़ जाएगी। इसलिए यह समझना बहुत जरूरी है कि स्त्री की सृजन क्षमता से रेणु के अंदर बैठा कवि स्त्री के लिए कुछ ऐसा ‘शब्द-सृजन’ कर देना चाहता है जिससे स्त्री के माननी रूप को एक आकार मिल सके। यह साबित हो सके कि स्त्रियाँ हमारे जीवन ही नहीं बल्कि जीवन को चलाने वाली इकाइयों की भी सृजन कर्ता है। कौन कब, क्यों कैसे की बहस कविता का भाव नहीं बल्कि स्त्री के लिए ऐसी रेखा खींचने की ज़िद है जिसके पीछे पूरी दुनिया निवेदन में खड़ी हो। देखिए कुछ पंक्तियां -
यह जो जल है विशाल जलराशि का अँश
इसी ने रचा जीवन
इसी ने रची सृष्टि।
यह जो मिट्टी है, टुकड़ाभर है
ब्रह्मांड के अनेकानेक ग्रह नक्षत्रों में
इसी के तृणाँश हम।
यह जो हवा है
हमें रचती बहती है
हमारे भीतर–बाहर प्रवाहित।
अस्मिता के इस दौर में सबसे जरूरी है सवाल करना है। कविता के बीच में रेणु जो सवाल खड़ा करते हैं उसमें स्त्री जीवन की तमाम विसंगतियों के हल हो जाने की उम्मीद है। शायद तुलसी होते तो रेणु पूछते - ‘नारी’, ‘ताड़ना की अधिकारी है?” कैसे ? बताओ बाबा ? कबीर से पूछते – ‘नारी नर्क का द्वार है? माया है? ठगिनी है? बताओ कैसे? हो सकता है प्रश्न आज के समय में वाज़िब न भी तो भी पूछना वाज़िब है।

स्त्री जीवन की अनंत छवियों को कविता में जीते-जीते राकेश रेणु खुद स्त्री बनने की इच्छा से आह्लादित हो उठते हैं। उनकी कविता है- “मैं स्त्री होना चाहता हूँ”। आप पहले इस कविता को पढिए-
मैं स्त्री होना चाहता हूँ।
वह दुख समझना चाहता हूँ
जो उठाती हैं स्त्रियाँ
उनके प्रेमपगे आस्वाद को किरकिरा करने वाली
जानना चाहता हूँ
जनम से लेकर मृत्यु तक
हलाहल पीना चाहता हूँ
प्रतारणा और अपमान का
जो वो पीती हैं ताउम्र
महसूसना चाहता हूँ
नर और मादा के बीच में भेद का
कांटे की चुभन
नज़रों का चाकू कैसे बेधता है
कैसे जलाती है
लपलपाती जीभ की ज्वाला
स्त्रीमन की उपेक्षा की पुरुषवादी प्रवृत्ति
मैं स्त्री होना चाहता हूँ
 उनकी सतत मुस्कुराहट
पनीली आँखों
कोमल तंतुओं का रचाव
और उत्स समझना चाहता हूँ
मैं स्त्री होना चाहता हूँ।
यह कविता शायद स्त्री पर लिखी तमाम कविताओं से शब्द और भाव के स्तर पर मेल खा जाए लेकिन उस भावना से मेल कैसे खाए जिसे रेणु अपने अंदर सींच रहे हैं। आप देखिए वह कैसे समय में स्त्री होना चाहते हैं....पूरी दुनिया जब पुरुष को वंश चलाने का माध्यम स्वीकार कर चुकी हो, लैंगिक समानता के अधिकार के लिए जब स्त्रियों को लठियाँ खानी पड़ रही हो। जब उनकी योनि में लोहे के राड डालकर मर्दानगी का प्रदर्शन किया जा रहा हो, जब घर से लेकर ऑफिस तक उसपर निगरानी रखी जा रही हो, जब अपने सहकर्मियों द्वारा उसके शोषण की बुनियाद बनाई जा रही हो। जब उसकी ‘देह’ केवल नुमाइश हो तब ऐसे में रेणु स्त्री बनना चाहते हैं। यह केवल कल्पना नहीं हो सकती है। यह स्त्री के प्रति श्रद्धा भी नहीं हो सकती। यह पुरुष के निरंकुश होने की शर्म है जो अब रेणु की आँखों और हृदय में उतर आया है। राकेश रेणु की कविताओं को जब मै पढ़ रही हूं जैसे उनमें बैठी उन तमाम स्त्रियों की छवियों को भी देख रही हूं। मां, बहन, बेटी, भाभी, चाची, मित्र, प्रेमिका सभी रूपों में यहां स्त्री है। सवाल स्त्री और पुरुष होने की इच्छा का नहीं है सवाल किसी को केवल मनुष्य समझने का है और उसकी बुनियादी ख़्वाहिश की पूर्ति में अपना योगदान देने का है।

स्त्रियां जब राकेश रेणु की कविताएं पढ़ेंगी तो उन्हें यह भरोसा हो जाएगा कि पुरुष इतने भी निर्मम नहीं होते। दरअसल निर्ममता कोई लेकर पैदा नहीं होता, यह समाज से ही विकसित होती है। पुत्र देखता है पिता मां, बहन, बेटी को डांट रहा है तो उसे लगता है कि वह भी डांट सकता है। फिर जब वह उसकी आदत बन जाती है तो उसके अंदर बैठी स्त्री धीरे धीरे खत्म हो जाती है। रेणु चाहते हैं स्त्री बची रहे। हँसती, मुस्कुराती, प्रेम करती, रोटियाँ सेंकती, धान रोपती, निराई-गुड़ाई करती। चाहे जिस रुप में लेकिन वह अपनी पूरी अस्मिता के साथ बची रहे।

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