ISSN2320-5733

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लेख तज़किरा देहलि-ए-मरहूम का ऐ दोस्त न छेड़... जावेद ज़ुकरैत, शोधार्थी, दिल्ली विश्वविद्यालय

यह क़िस्मत का व्यंग ही था कि मुगलों के राजनीतिक पतन का समय अभूतपूर्व साहित्यिक संपन्नता का भी समय था। सन 1857 में एक ऐतिहासिक युग का अंत हो गया। मुगलों का सदियों पुराना अथक परिश्रम से खड़ा किया सामाजिक-सांस्कृतिक ढांचा चरमरा गया। यह ग़ालिब की नियति थी कि वह इस सारे युगांत के एकाकी और व्यथित गवाह बनकर सन 1869 तक जिएँगे। (1857 के इस त्राहिमाम को देखने के लिए उर्दू का कोई बड़ा शायर अब बाकी ना बचा था, सिवाय ग़ालिब के) गंगा जमुनी विचारधारा की परिष्कृत सुसंस्कृत एवं परिपक़्व तहज़ीब जिसने ग़ालिब के जीवन और लेखन को बांध रखा था अब विलुप्त हो जाएगी। उन्हें लाल क़िले को फौजी बैरकों में बदलता हुआ देखने को जीना पड़ेगा। उन्हें वह दिन भी देखना होगा जब बादशाह को अपने ही वतन से निकाल दिया जाएगा और परदेश में बगैर गाजे-बाजे के वो चल बसेंगे, और वह अपनी प्यारी दिल्ली को सुनियोजित हिंसा में झुलस कर, अपनी पहचान खोता हुआ भी देखेंगे।

ग़ालिब अपनी पेंशन के सिलसिले में जब कलकत्ता गए थे। तब वहां अंग्रेजी शान ओ शौक़त और विज्ञान के क्षेत्र में उनकी तरक़्क़ी देख चुके थे। लौटने के बाद ग़लिब के विचारों में आश्चर्य जनक परिवर्तन देखने को मिलता है जिसकी बानगी हमें सर सैय्यद और आईने अकबरी के मसले पर मिलती है।सन 1850 में सर सैयद अहमद खान ने आईने अकबरी का संपादन किया तब शहर के दूसरे जाने-माने लोगों की तरह गालिब से भी इसकी भूमिका लिखने को कहा गया था। लेकिन ग़ालिब ने आईने अकबरी पर वक्त व ताकत खर्च करना व्यर्थ समझा और उन्होंने सर सैयद से कहा कि "इंग्लैंड के साहिबों को देखो वह हमारे पूर्व के पुरखों से भी आगे निकल चुके हैं। हवा और लहरों को उन्होंने बेकार बना दिया है। उनके जहाज आग और भाप से चलते हैं। मिज़राब के बगैर वह साज़ से संगीत पैदा करते हैं और अपने जादू से हर्फ़ को चिड़िया की तरह उड़ाते हैं। हवा को आग लगाते हैं- शहरों को चिराग़ के बगैर रोशन करते हैं। इस नए नियम ने सभी पुराने नियमों को बेकार साबित कर दिया है। जब ऐसा मोती का खजाना तुम्हारे सामने है तो ऐसे समय में विध्वस्त खलिहानों में तिनके बीनना क्या ज़रूरी है।" ऐसे समय में जब आम तौर पर लोग बीते हुए कल को बढ़ा चढ़ा कर पेश कर रहे थे, गालिब की यह प्रतिक्रिया निश्चय ही पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान के प्रभाव का ही नतीजा थी। इसी मौज़ू पर ग़ालिब ने गौर-ओ-फ़िक्र करते हुए ये शेर कहा -

ईमा मुझे रोके है तो खींचे है मुझे कुफ्र
काबा मेरे पीछे है कलीसा मेरे आगे।।

अधिकांश लोग ग़ालिब को एक शायर के रूप में तो जानते हैं किंतु इतिहासकार के रूप में नहीं, जिसे बहादुर शाह जफर ने मुगल वंश का सरकारी इतिहास लिखने का काम सौंपा था। वह उस दौर में दिल्ली में रहे जब दिल्ली एक दिलचस्प मोड़ से गुजर रही थी। मुगल शक्ति धीरे-धीरे किंतु निर्णायक रूप से मिट रही थी। अंग्रेज अपने आप को वास्तविक शासक के रूप में स्थापित कर चुके थे। ग़ालिब जिन्हें अपने कुलीन सामंत वर्ग का सदस्य होने पर गर्व था, ग़ालिब और उनके वर्ग के कई लोगों के लिए, जो बँटी हुई निष्ठा की छाया में जी रहे थे, विद्रोह किसी बुरे सपने से कम नहीं था। अंग्रेज़ वास्तविक शासक थे। मुगल बादशाह कानूनी रूप से श्रद्धा का प्रतीक था। सन 1857 से पूर्व की राजनीतिक संध्या में इन दोनों ही के प्रति एक साथ श्रद्धा असंगत नहीं थी। 1857 में अचानक इसका अंत कर एक सीधा फैसला सामने रख दिया - जो बादशाह के साथ था वह अंग्रेजों का विरोधी और जो अंग्रेज़ों के साथ था वह बादशाह का विरोधी। गालिब ने इस दौरान दस्तंबू लिखी जो एक विस्तृत डायरी है। इसमें उन सदमे से भरे दिनों में घटी घटनाओं का सहज वर्णन है। यह डायरी साहित्यिक दृष्टि से अच्छी रचना थी, किंतु इसका ऐतिहासिक महत्व ज्यादा नहीं था। भारत भर में बसे लोगों को भेजे गए उनके अनेक पत्रों में दिल्ली के हालातों के बारे में काफी सूचनाएं हैं। वह 'काले' और 'गोरों' के आतंक, अपने अंग्रेज और भारतीय मित्रों-संरक्षकों की मृत्यु, सैन्य शिविर में बदल गई दिल्ली, जहां कर्फ्यू पास की तरह के किसी परवाने के बगैर कोई आ जा नहीं सकता था, दिल्ली में अनेक निरपराध कुलीनों पर चले मुक़दमों और रोजमर्रा की जिंदगी में होने वाली तकलीफों के बारे में बताते हैं। यह किताब पुरे तौर पर अंग्रेज़ों के पक्ष में है और विद्रोह की घोर निंदा करती है। यह डायरी 11 मई 1857 को मेरठ के सवारों के आगमन से शुरू होती है और 20 सितम्बर तक जाती है, जब अँगरेज़ सेना दिल्ली में विद्रोहियों का प्रतिरोध तोड़ने में सफल हुई। इस डायरी में जुलाई 1858 में लखनऊ के पतन की घटनाओं को कुछ हद तक शामिल किया गया है।

मौलाना अल्ताफ हुसैन हाली ‘यादगारे ग़ालिब’ में लिखते हैं, ‘ग़दर के ज़माने में मिर्ज़ा दिल्ली से, बल्कि घर से भी बाहर नहीं निकले, ज्यों ही बग़ावत का उपद्रव उठा, उन्होंने घर का दरवाजा बंद कर लिया और एकांत कक्ष में ग़दर के हालात लिखने शुरू किए। हालांकि दिल्ली -विजय के बाद महाराजा पटियाला की तरफ से मरहूम हक़ीम महमूद ख़ाँ और उनके पड़ोसियों के मकान पर, जिनमें मिर्ज़ा ग़ालिब भी थे, सुरक्षा के लिए एक पहरा बैठ गया था। इसलिए वे विजयी सिपाहियों की लूट-खसोट से सुरक्षित रहे मगर फिर भी उनको तरह-तरह की तक़लीफ़ें उठानी पड़ीं।’ गालिब 1857 के ग़दर के शुरुआती दौर के खौफनाक मंज़र का ज़िक्र करते हुए दस्तंबू में लिखते हैं कि-"11 मई, 1857 का दिन था, यकायक दिल्ली में हर तरफ होने वाले धमाकों से घरों के दरो-दीवार हिल गए। मेरठ के नमकहराम सिपाही अंग्रेजों के खून से अपनी प्यास बुझाने दिल्ली आ पहुंचे थे। जिनके हाथों में दिल्ली की निगहबानी थी वो भी जाकर बागियों से मिल गये। बागियों ने पूरे शहर को रौंद डाला और उस समय तक अंग्रेज़ अफ़सरों का पीछा नहीं छोड़ा जब तक उन्हें क़त्ल न कर दिया। अंग्रेज़ बच्चे, जनानियां सब क़त्ल–औ-ग़ारत के शिकार हुए। लाल किले से बागियों ने अपने घोड़े बांध लिए और शाही महल को अपना ठिकाना बना लिया। तीन दिन हो गए हैं, न पानी है और न ही कुछ खाने को,डाक का काम भी ठप्प हो गया है, मैं न दोस्तों से मिल पा रहा हूं और ना ही अपनों का हाल मालूम हो रहा है।"

ग़ालिब जो बागियों को नमकहराम कहकर बुलाते हैं, उन्हीं के लिए आगे लिखते हैं कि- "ये हिम्मतवाले बाग़ी जहाँ से भी गुजरे उन्होंने अपने क़ैदी साथियों को आज़ाद करा लिया। इस समय दिल्ली के बाहर और भीतर कोई पांच हज़ार सैनिक जमे हुए हैं। गोरे अब भी हिम्मत जुटाए खड़े हैं। रात-दिन काला धुंआ शहर को लपेटकर रखता है। लुटेरे हर तरह से आज़ाद हैं, व्यापारियों ने टैक्स देना बंद कर दिया, बस्तियां वीरान हो चुकी हैं, बाग़ी सारा दिन सोना-चांदी लूटते हैं और शाम को महल के रेशमी बिस्तर पर नींद काटते हैं। शरीफ़ लोगों के घरों में मिट्टी का तेल भी नहीं है, हर तरफ अंधेरा है।"

सवाल यह है कि क्या इस किताब को अक्षरशः मानना ठीक होगा ? क्योंकि गालिब के अपने दोस्तों को लिखे गए ख़त इस बात को गलत साबित करते हैं। ‘दस्तंबू न ही 1857 का सच्चा सहज विवरण है और न ही ग़ालिब के मतों की अभिव्यक्ति। यह किताब अंग्रेजों के शहर पर दोबारा कब्जा करने के बाद लिखी गई, जब आखिरकार यह स्पष्ट हो गया था कि विद्रोह असफल हो गया है। किताब का एकमात्र उद्देश्य अंग्रेजों की नज़र में ग़ालिब को निर्दोष साबित करना था। ‘यह कोई शाब्दिक चाटुकारिता की बात नहीं बल्कि अपने अस्तित्व को बरकरार रखने का प्रश्न था। जीत के साथ अंग्रेज बेरहम और कठोर हो गए। छोटे से छोटे शक पर लोगों को फांसी हो जाती थी। ग़ालिब के किताब लिखने के पीछे दो उद्देश्य थे - एक तो अपने खिलाफ किसी शंका का निराकरण करना तथा दूसरा अंग्रेजों को अपनी सच्चाई का सबूत देना। जिससे कि वह उनकी पेंशन जारी रखें।‘ यह अपने आप में उत्तरजीविता का मामला है, क्योंकि मुगल दरबार के सिमट जाने के बाद ग़ालिब के पास कोई दूसरा आय का स्रोत नहीं था और वह घोर निराशा की स्थिति में थे। महत्वपूर्ण यह है कि उस समय के सामंती ढांचे के बावजूद ग़ालिब की उपनिवेशवाद विरोधी भावना बहुत प्रबल थी। फरवरी सन 1857 में अंग्रेजों द्वारा अवध के विलयीकरण के खिलाफ उन्होंने एक दोस्त को लिखा-"हालांकि मैं अवध और उसके मामलों से अनजान हूँ। मुझे रियासत की तबाही देखकर दुख होता है और मेरा यकीन है कि कोई हिंदुस्तानी जिसमें ज़रा भी न्यायपरकता है,वह ऐसा ही महसूस करेगा।“

जनवरी सन 1858 को रामपुर के नवाब को लिखे एक ख़त में ग़ालिब अपनी भूमिका को सतर्क तथा सावधानी भरे शब्दों में स्वीकार करते हैं- "इन उथल पुथल के दिनों में मैंने अपने आप को दरबार से दूर ही रखा। लेकिन मुझे डर था कि अगर मैं दरबार से अपना सम्बन्ध पूरी तरह तोड़ता हूँ तो मेरा घर बर्बाद हो जायेगा और मेरा जीवन खतरे में आ जायेगा"

उन्नीसवीं सदी में भारत के शायरों और लेखकों को चापलूसी भरे विशेषण से भरी भाषा इस्तेमाल करने की कला में महारथ थी। यह उनके लिए जीविका का प्रश्न था जिसमें उनकी रचनात्मकता भी शामिल थी। एक तरह से यह रचनात्मकता बनाए रखने के लिए जरूरी आर्थिक साधन इकट्ठा करने हेतु अनिवार्य भी था। दस्तंबू अपनी शैली में कसीदे की तरह थी, जो कि सामंती व्यवस्था में शासकों की अनुकम्पा हासिल करने का लेखकों और शायरों का पुराना, आजमाया साधन था। इसका सीमित उद्देश्य था शक्तिशाली व्यक्ति को प्रभावित करना। सामंती व्यवस्था के शायर और लेखक के रूप में ग़ालिब सुरक्षार्थ प्रयोग की जाने वाली इस शैली से परिचित थे।19वीं शताब्दी के मुगल दरबार के साहित्यकारों में बहुत प्रिय रही गूढ़ शैली में लिखने में सिद्धहस्त होने से ग़ालिब जिस अर्थ को बताने का दावा करते थे उसे बड़ी चतुराई से छिपा सके। अपनी लेखन के रूप और विषय वस्तु को और दुर्बोध बनाने के लिए ग़ालिब ने फारसी की साहित्यिक शुद्धता के अपने पूर्वाग्रह का इस अवसर पर दोहन किया। संक्षेप में उन्होंने इस बात का पूरा ध्यान रखा कि उनकी डायरी का उनके ही विरुद्ध या विद्रोह में बढ़-चढ़कर भाग लेने वाले उनके मित्रों के विरुद्ध उपयोग ना हो।

प्रोफेसर के. ए. फारूकी लिखते हैं कि” इसमें कोई संदेह नहीं है कि ग़ालिब मुगल बादशाह के पक्षधर थे और सन अट्ठारह सौ सत्तावन में बहादुर शाह जफर के संपूर्ण सत्ता धारण करने के शुभ अवसर पर उन्होंने उन्हें एक शेर खुदा सिक्का भेंट स्वरूप दिया। पहले गुमनाम इस सिक्के का उल्लेख मुंशी जीवनलाल ने अपनी डायरी रोजनामचा में पहली बार किया है, जो की इस तरह है -

बर ज़री आफताब-ओ मुग-ए-माह
सिक्का दार जहाँ बहादुर।।

(बहादुर शाह बादशाह ने अपना सिक्का सूरज के सोने और चाँद की चांदनी से ढलवाया।)

उन्नीस अक्टूबर सन 1857 में ग़ालिब को समाचार मिला कि उनके भाई की मृत्यु हो गई। प्रोफेसर के.आर. फारूकी ने लिखा है कि "उन्हें अंग्रेजों ने गोली मार दी थी, गालिब दस्तंबू में इस तथ्य को जानबूझकर छोड़ देते हैं।" एक और वृतांत के अनुसार वह अनजाने में उस समय मारे गए जब सड़क पर शोर-शराबे की आवाज सुनकर वह घर से निकल आए और सड़क पर चले गए थे। दिल्ली के विद्रोह के दौरान कुछ समय कोतवाल रहे मोइनुद्दीन हसन खान ने अपने वृत्तांत में लिखा है कि "मिर्जा असदुल्लाह के भाई युसूफ खान जो कि बहुत समय से मानसिक संतुलन खो चुके थे, सड़क पर शोर सुनकर देखने के लिए बाहर निकल आए और मारे गए।" दस्तंबू में दिए ग़ालिब के वृतांत के अनुसार उनके भाई की मृत्यु बीमारी के कारण हुई। उन्हें 5 दिन से बुखार था और उन्नीस अक्टूबर की मध्य रात्रि उनका देहांत हो गया।

ग़ालिब ग़दर के वक़्त जिन हालात से गुज़र रहे थे (मुझे क्या बुरा था मरना गर एक बार होता) उन हालात को जिस तरह मिर्ज़ा ने दर्ज़ किया है, उससे उनकी वाबस्तगी के साथ-साथ चश्मदीदगी का पता भी चलता ह। अपने एक दोस्त को लिखे ख़त में उस वक़्त की दिल्ली और उससे मुतास्सिर ख़ुद के हालात को बयान करते हुए मिर्ज़ा फरमाते हैं, ‘पूछो कि ग़म क्या है? ग़म-ए-मर्ग, ग़म-ए-फ़िराक़, ग़म-ए-रिज़्क, ग़म-ए-इज़्जत?’ क्या-क्या नहीं झेलना पड़ा उन्हें..... हक़ीक़ी मेरा एक भाई दीवाना होकर मर गया। उसकी बेटी, उसके चार बच्चे, उनकी माँ यानी मेरी भावज जयपुर में पड़े हैं। इस तीन बरस में एक रुपया उनको नहीं भेजा। भतीजी क्या कहती होगी कि मेरा भी एक चचा है। जहाँ अगनिया (संपन्न) और उमरा के अजवाज (पत्नियां) व औलाद भीक मांगते फिरें और मैं देखूँ.....इस मुसीबत की ताब लाने को जिग़र चाहिए।" पंकज पराशर अपने एक लेख में लिखते हैं कि ग़ालिब की आँखों के सामने दिल्ली बदल रही थी। उनके दोस्तों को बरतानवी हुक़्मरानों के द्वारा मारा-पीटा और फांसी पर चढ़ाया जा रहा था। वतन से बेवतन किया जा रहा था। यह तसव्वुर ही दिल को झकझोर कर रख देता है कि ग़ालिब यह सब झेल रहे थे और ख़ुद को बेग़ुनाह साबित करने के लिए ब्रिटिश हुक़्मरानों की जी-हुज़ूरी कर रहे थे। कभी ग़ालिब ने बहुत फ़ख़्र से कहा था कि

"सौ पुश्त से है पेशा-ए-आबा सिपहगरी"

उन्हीं ग़ालिब को हालात ने यह लिखने को मज़बूर कर दिया कि -

"वो ताब ओ मज़ाल वो ताक़त नहीं मुझे"

यह गालिब का दुर्भाग्य ही था कि उन्हें दिल्ली के सुनियोजित विध्वंस का लाचार गवाह बनना पड़ा। जब रोज़ इमारतें गिराने का काम शुरू हुआ तो उन्होंने गुस्से में लिखा है कि "क्यों मैं दिल्ली की वीरानी से खुश ना होऊं ? जब शहर में रहने वाले न रहे शहर को लेकर क्या चूल्हे में डालूँ ?" लेकिन जल्दी ही गुस्से की जगह नाउम्मीदी ने ले ली और इस दौरान लिखे उनके पत्रों में उनके प्रिय शहर के साथ बेरहमी के एक एक पक्ष का विस्तृत चित्रण मिलता है। उन्होंने एक-एक करके दिल्ली के सभी मशहूर बाज़ारों खास बाज़ार, उर्दू बाज़ार, पूरे के पूरे मोहल्ले बिना कोई निशानी छोड़े गायब होते देखा। परिचित सीमा चिन्ह और घर जिनमें उनका आना-जाना था, दोस्तों की हवेली, कूचे उनकी आंखों के सामने गिरा दिए गए। इकट्ठा मलबा और गर्द के कारण दिल्ली बंजर धरती सी दिखती थी। ग़ालिब ने लिखा कि दिल्ली रेगिस्तान बन गई थी इसलिए भी, क्योंकि जंग के बाद तबाही की आग के कारण कुओं की अनदेखी की गई। जिसके कारण पानी की बहुत कमी हो गई थी। उन्होंने लिखा कि "जामा मस्जिद से राजघाट तक सब बंजर पड़ा है। अगर मलबा हटा दिया जाए तो यह जगह भूतिया सी दिखेगी और दिल्ली वाले अब तक यहाँ की जुबान को अच्छा कहे जाते हैं।

वाह रे यकीन.......दिल्ली है
वल्लाह शहर नहीं है, कैंप है, छावनी है।"

दस्तंबू में मिर्ज़ा खुद के अकेलेपन को बयान करते हुए लिखते हैं कि “ग़ालिब जिसके, शहर में हजारों दोस्त और हर घर में परिचित होते थे, अब इतना अकेला है कि उसके पास बात करने के लिए उसकी क़लम के सिवा कोई नहीं है और अपने साए के अलावा कोई उसका साथी नहीं है।“ 1857 पर अपने एक लेख में पंकज पराशर ने लिखा कि 'हँसी नहीं आने के कारण या कहिए अत्यधिक संवेदनशीलता के कारण मीर (कुछ सालों तक) मानसिक असंतुलन के शिकार हो गए थे। हर संवेदनशील रचनाकार के साथ यह वाकया पेश आता रहा है। मीर, निराला, नजरूल इस्लाम, मंटो, ब्रेख़्त, भुवनेश्वर-दुनियावी पाखंड को बर्दाश्त न कर सकने और समझौतावादी रुख़ अख़्तियार करने से इनकार करने के कारण पागल हो गये, लेकिन मिर्ज़ा ग़ालिब पागल नहीं होने के लिए अभिशप्त थे।

कोई उम्मीदवर नज़र नहीं आती
कोई सूरत नज़र नहीं आती।

आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी
अब किसी बात पे नहीं आती।


दिल्ली के हालात बद से बदतर थे। ग़ालिब एक ख़त में इसका ज़िक्र करते हुए कहते हैं कि "ऐसा लगता है की जैसे मज़दूर और ज़मीन खोदने वाले इस शहर में रहते ही नहीं थे। हिंदू लोग मृतक के शरीर को नदी के किनारे जला सकते थे, परंतु मुसलमान तो बाहर निकलने की हिम्मत भी नहीं कर सकते। भले ही वे सामूहिक रूप से या दो-तीन व्यक्तियों के सहारे कंधों पर मुर्दा निकालें, उन्हें इसकी अनुमति नहीं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि वे किस प्रकार अपने मुर्दों को नगर से बाहर ले जाकर मिट्टी दें?’ इसी स्थिति के कारण ग़ालिब ने अपने भाई को बेशिनाख्त लाश की तरह मिट्टी दी, पटियाला के एक सिपाही को आगे-आगे लेकर दो नौकरों की सहायता से हम लाश को बाहर लाए। उन्होंने लाश को धोया और मेरे घर से कपड़ों के दो-तीन टुकड़े लेकर लाश को लपेटा। फिर घर के पास वाली मस्ज़िद की ज़मीन खोदकर लाश को दफ़्न किया और वापस आ गए।"

असल में यही थी ग़ालिब की 'शिकस्त की आवाज' जिसमें जद्दोजहद की आँच ज़रा भी नहीं थी। वह आँच जो उनकी गजलों में गम और नाउम्मीदी के बावजूद बार-बार महसूस होती है। दस्तंबू में आँच तो नहीं है सिर्फ आजिज़ी भर है। पेंशन के झगड़े ने 'नज़्मुद्दोला दबीर-उल-मुल्क असदउल्लाह खां बहादुर निज़ाम-ए-जंग' के भीतर की आँच बड़े पैमाने पर सोख ली थी। दस्तंबू भी एक तरह से पेंशन की अर्जी ही थी। इस अर्जी के फेर में वह मुगल सल्तनत की ओर से दिए गए ख़िताबों से भी डरने लगे थे। दस्तंबू में अपने नाम की छपाई को लेकर अपने शागिर्द 'मिर्जा हर गोपाल टफ्ता'' के नाम एक ख़त में लिखते हैं कि - "मुंशी शिवनारायण को समझा देना कि ज़िन्हार उर्फ न लिखें, नाम और तख़ल्लुस बस। अजज़ा ए खिताबी का लिखना नामुनासिब बल्कि मुज़िर है। मगर हाँ नाम के बाद लफ्ज़ 'बहादुर' का और 'बहादुर' के लफ्ज़ के बाद तख़ल्लुस -'असदुल्लाह खां बहादुर ग़ालिब।"

सन 1857 के बाद ग़ालिब बारह साल जिंदा रहे लेकिन वह इस सदमे से कभी नहीं उबर पाए। मई, सन 1857 की सुबह जब दिल्ली में घोड़ों पर सवार सिपाही घुसे तो ग़ालिब चौंक उठे थे। लेकिन जब अंग्रेजों को शहर से खदेड़ दिया गया, तो उसके आगे के घटनाक्रम में बहादुर शाह जफर के दरबारी होने के नाते ग़ालिब की भागीदारी उससे कहीं अधिक थी, जितना उन्होंने अंग्रेजों को चार महीने बाद उनके शहर दोबारा जीतने पर जाहिर किया। बकौल सुल्तान अहमद 'दस्तंबू अंग्रेजों के प्रकोप से बचने में उनकी वक़्ती तौर पर ढाल बनी। इसे उनकी वास्तविक भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं माना जा सकता। विद्रोह के दौरान उनकी व्यक्तिगत व्यथा और उनका नुकसान बहुत ज्यादा था। वह अब जवान नहीं थे और उनकी सेहत जवाब दे रही थी लेकिन यह कहना कि जिस समय मुगल बादशाह ने लाल किले में दोबारा शासन संभाला, उन तूफानी दिनों में वह एक दूरस्थ निष्पक्ष या उदासीन प्रेक्षक मात्र रहे हो उनके व्यक्तित्व और दूसरे प्रमाणों, विशेषकर दोस्तों को लिखे उनके पत्रों की, अनदेखी होगी। वह आधुनिक भाव में राष्ट्रवादी ना रहे हों, लेकिन वह अंग्रेजों के सहयोगी (जैसा कि वह अंग्रेजों को विश्वास दिलाना चाहते थे) भी नहीं थे। वह सिपाहियों के असंयमित रवैये के आलोचक थे, लेकिन उन्हें उनके उद्देश्य के प्रति सहानुभूति थी। विद्रोह के परिणाम स्वरुप फैले अंग्रेजी आतंक से वह भावनात्मक रूप से चूर चूर हो गए थे। एक पूरी जीवन शैली हमेशा के लिए विस्थापित हो गई थी। उनके कई प्यारे दोस्त मार दिए गए थे ,या देश से निकाल दिए गए थे ,चांदनी चौक पर रोजाना दिल्ली के बीसियों बाशिंदे फांसी पर चढ़ा दिए जाते थे। उनके बादशाह को देश निकाला दे कर रंगून भेज दिया गया था। पुराने जमीदारों में से ज्यादातर को उनके समाज में आला रुतबे से हटाकर गरीबी में जीने का जरिया तलाश करने के लिए छोड़ दिया गया था। उनके प्यारे शहर का ज्यादातर हिस्सा गिरा दिया गया था। अपने भाग्य की अनिश्चितता के चलते ,अपनी पुरानी पेंशन के बगैर ,वह सारी उथल पुथल के एकाकी एवं मूक दर्शक बने रहे। शायद इसी दौरान उन्होंने ये शेर कहा होगा -

है मौजज़न इक कुलज़ूम-खूं काश यही हो आता है अभी देखिये क्या क्या मेरे आगे।।

जावेद ज़ुकरैत,
शोधार्थी, दिल्ली विश्वविद्यालय
E-mail: mohd6521@gmail.com
मोबाइल न. 8510076897

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