ISSN2320-5733

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प्रवासी सृजन अभिमन्यु अनत की काव्य संवेदना डॉ. रमा

मॉरीशस हिन्दी भाषा और साहित्य ही बल्कि संस्कृति के विस्तार के लिए प्रमुख देशों में जाना जाता है। यहाँ के प्रत्येक मनुष्य में भारतीयता निवास करती है क्योंकि जड़े वहीं की हैं। यहाँ रहने वालों में भारतीय लोगों की संख्या अधिक है। सच कहा जाए तो यह दूसरा भारत है। हिन्दी साहित्य को समृद्ध करने में प्रवासी साहित्य की निर्णायक भूमिका है। अब लगभग तीन सौ से अधिक रचनाओं का सृजन यहाँ हो चुका है। इन पुस्तकों में भारतीय साहित्य, संस्कृति, भाषा, इतिहास की झलक देखि जा सकती है। यहाँ की रचनाओं में मॉरीशस के समाज-मूल्य तथा रहन-सहन के साथ ही बहुत कुछ ऐसा भी मिलता है जो भारतीय होता है। यहाँ रहने वाले प्रवासी भारतीयों द्वारा हिन्दी साहित्य का बहुतायत मात्रा में सृजन हुआ है। मॉरीशस ने पहली बार हिन्दी साहित्य को अंतर्राष्ट्रीय ख्याति से फलीभूत किया।

मॉरीशस की हिन्दी कविता में कई संस्कृतियों की झलक भी देखि जा सकती है। यहाँ कई अन्य देशों के लोग भी रहते हैं जो अपनी संस्कृति और समाज से जुड़े होते हैं। मॉरीशस कविता का इतिहास देखें तो पता चलता है कि सन 1962 में ठाकुर प्रसाद मिश्र की एक कविता का ज़िक्र मिलता है। 'दीपावली' नाम से प्रकाशित यह कविता देवी भगवती की स्तुति में लिखी गई है।

अभिमन्यु अनत कविता विधा के सबसे प्रभावशाली रचनाकार हैं। अभिमन्यु अनत का जन्म 9 अगस्त सन 1937 को मॉरीशस में हु। भारतीय पूर्वजों के वंशज अभिमन्यु अनत मॉरीशस के मूल निवासी हैं। इनका जन्म वहीं हुआ। अभिमन्यु अनत हिन्दी साहित्य के अग्रणी साहित्यकार हैं । अभिमन्यु अनत के साहित्य में भारतीय मिट्टी रची बसी है । अभिमन्यु जी के पूर्वज भारतीयों के साथ गिरमिटिया मजदूर के रूप में अंग्रेज़ों द्वारा मजदूरी करने लाए गए थे। अपने पूर्वजों की दुखद कथा और भारतीय जीवन शैली ने अभिमन्यु जी को हिन्दी में लिखने के लिए प्रेरित किया। लगभग दो दशक तक हिन्दी अध्यापन के बाद अभिमन्यु अनत युवा मंत्रालय में नाट्य प्रशिक्षक की भूमिका का निर्वाह किया। मॉरीशस के सुप्रसिद्ध 'महात्मा गांधी इंस्टीटयूट' में अनत जी ने ‘भाषा प्रभारी’ के रूप में कार्य करते हुए सेवानिवृत्त हुए।

अभिमन्यु अनत हिन्दी साहित्य के प्रमुख रचनाकार के रूप में सम्पूर्ण विश्व में अपना स्थान बना चुके हैं। मॉरीशस में आज किसी भी भारतीय साहित्यकार से अधिक सम्मानित और महत्वपूर्ण साहित्यकार के रूप में उन्हें जाना जाता है। अभिमन्यु अनत के उपन्यास 'लाल पसीना' को विश्व स्तर पर सराहा गया। वह लगभग तीन दर्जन पुस्तकों का सृजन कर चुके हैं। कैक्टस के दांत, नागफनी में उलझी सांसें, एक डायरी बयान गुलमोहर खौल उठा जैसे तीन महत्वपूर्ण काव्य-संग्रहों का सृजन कर चुके अभिमन्यु अनत की कविताएं मानवीय संवेदना के अतल में जाकर समाज को प्रभावित करती है। उनकी कविताओं में भारतीय समाज के साथ हुए शोषण तथा अत्याचार के प्रति विद्रोह है। वह बेरोज़गारी जैसे व्यापक समस्या पर दृष्टि डालते हुए लिखते हैं-

“जिस दिन सूरज को
मज़दूरों की ओर से गवाही देनी थी
उस दिन सुबह नहीं हुई
सुना गया कि
मालिक के यहां की पार्टी में
सूरज ने ज़्यादा पी ली थी।”

“अभिमन्यु अनत अपने अतीत को नहीं भूलते हैं। उनका घायल अतीत ही उनकी कविता का संबल है जो भावना का स्रोत बनकर बहता है-“

अतीत की रिसती छत से
मेरा वर्तमान
ठोप-ठोप टपक रहा
भविष्य के
पेंदीहीन पात्र में।”

‘खामोशी’ कविता में भी वह अपने रक्त-रंजित इतिहास को याद करते हैं। अपने पूर्वजों के साथ हुए अत्याचारों को स्वर देते हैं। वह अपनी कविता में बार-बार अपने अतीत से जुडने की कोशिश करते है और अपने भोगे हुए यथार्थ को व्यक्त करते हैं। अपने पूर्वजों द्वारा सहे गए कष्ट उन्हें यह लिखते के लिए विवश करते हैं-

मेरे पूर्वजों के साँवले बदन पर
“जब बरसे थे कोड़े
तो उनके चमड़े
लहूलुहान होकर भी चुप थे
चीत्कारता तो था
गोरे का कोड़ा ही
और आज भी
कई सीमाओं पर
बंदूकें ही तो चिल्ला-कराह रही हैं
भूखे नागरिक तो
शांत सो रहे हैं
गोलियाँ खाकर।”

अभिमन्यु जी मॉरीशस के एक मात्र ऐसे कवि हैं जिनकी कविताएं अपने साथ परवेश का बिम्ब भी बनाती हैं। उनकी कविता ‘इस्तहारों के वायदे’ अपनी संवेदना के आवेग के कारण बार-बार पढे जाने की मांग करती है-

“उस सरगर्मी की याद दिलाते
कई परचे कई इश्तहार आज भी
गलियों की दीवारों पर घाम-पानी सहते
चिपके है अपनी अस्तित्व-रक्षा के लिए
उन पर छपे लंबे-चौड़े वायदों पर
परतें काई की जमीं जा रही है।
जिन्हें देखते-देखते
आँखें लाल हो जाती है।
तुम्हारे पास पुलिस है हथकड़ियाँ हैं
लोहे की सलाखें वाली चारदिवारी है
मुझे गिरफ्तार करके चढ़ा दो सूली
उसी माला को रस्सी बनाकर
जो कभी तुम्हें पहनाया था
क्योंकि मैंने तुम्हारे ऊपर के विश्वास की
बड़ी बेरहमी से हत्या कर दी है।
इस जुर्म की सजा मुझे दे दो।
मैं इन इश्तहारों को
अब सह नहीं पा रहा हूँ।”

अभिमन्यु अनत मॉरीशस के प्रमुख कवि है लेकिन उनकी चिंताएँ भारतीय समाज से इतनी मिलती-जुलती हैं कि बरबस उसमें से भारतीयता झलकती है। वह भारतीय समाज के जन-जीवन को बहुत करीब से महसूस करते हैं। उनकी कविताएं अपने समाज का सच बयान करती हैं’। ‘मेरे महबूब’ ऐसी ही एक कविता है-

“इस शहर में
हवा जहर लिये होती है
उम्मीदें टूटती हैं
विधवा की चूड़ियों की तरह
इस शहर में
गर्भपात लिये बहती है नहर
चुनाव बाद की घड़ियों की तरह
वायदे भुलाए जाते हैं।”

अभिमन्यु अनत ने भूख, गरीबी और मजबूरी को देखा है उयर सहा भी है। इसलिए यह अभाव उनकी कविता में बार-बार उतरता है। भूख की टीस उनकी कविता का स्थायी भाव है-‘खाली पेट’ कविता में वह लिखते हैं-

“तुमने आदमी को खाली पेट दिया
ठीक किया
पर एक प्रश्न है रे नियति
खाली पेटवालों को
तुमने घुटने क्यों दिये ?
फैलाने वाला हाथ क्यों दिया?”

अभिमन्यु अनत की कविताएँ मॉरीशस के मजदूरों की अनंत कथाओं को मार्मिकता से व्यक्त करती हैं। 'लक्ष्मी का प्रश्न' नमक कविता में अनत एक मजदूर जीवन की मार्मिक कथा पर प्रश्न उठाते हैं-

“अनपढ़ लक्ष्मी पर इतना ज़रूर पूछती रही
पसीने की कीमत जब इतनी महंगी होती है
तो मज़दूर उसे इतने सस्ते क्यों बेच देता है।”

अभिमन्यु अनत ने हिंदी कविता को सम्मानजनक स्थान दिया। उनकी कविताएँ हिंदी साहित्य में अपना स्थान बनाने में सफल भी हुई हैं। भारत का एक बहुत बड़ा पाठक वर्ग उनसे परिचित है। अभिमन्यु का अतीत उनका पीछा नहीं छोड़ता है। बल्कि यह कहना गलत न होगा कि वही उनकी ताकत है। अपने घायल अतीत के प्रति उनकी आस्था इस कदर उन्हें व्याकुल करती हैं कि वह मॉरीशस की प्राकृतिक सुंदरता से तालमेल ही नहीं बैठा पाते हैं। वह लिखते हैं-

“मेरे देश के मनमोहक समुद्रतट
उस श्वेत आक्रमण को
तुमने सुपुर्द कर दिया
व्यवसाय की भाषा में
जो सैलानी हैं।
अब गंगास्नान के लिए
मेरे आँगन में
बरसात का जमा पानी है।“

इतना ही नहीं वह वह अपने वर्तमान की खुशफहमी से अधिक आने वाले भविष्य की चिंता करते हैं। वह अपनी कविता में मानवीयता की स्थापना चाहते हैं। जन-जीवन में समन्वय चाहते हैं। हालाकि वह यह सब उन्हें सामान्य नहीं लगता है। इसलिए वह चिंतित हो उठते हैं। अपनी कविता ‘अधगले पंजरों पर’ में लिखते हैं-

“भूकम्प के बाद ही
धरती के फटने पर
जब दफनायी हुई सारी चीज़ें
ऊपर को आयेंगी
जब इतिहास के ऊपर से
मिट्टि की परतें धुल जायेंगी
मॉरीशस के उन प्रथम
मज़दूरों के
अधगले पंजरों पर के
चाबुक और बाँसों के निशान
ऊपर आ जायेंगे
उस समय
उसके तपिश से
द्वीप की सम्पत्तियों पर
मालिकों के अंकित नाम
पिघलकर बह जायेंगे
पर जलजला उस भूमि पर
फिर से नहीं आता
जहाँ समय से पहले ही
उसे घसीट लाया जाता है
इसलिए अभी उन कुलियों के
वे अधगले पंजार पंजर
ज़मीन की गर्द में सुरक्षित रहेंगे
और शहरों की व्यावसायिक संस्कृति के कोलाहल में
मानव का क्रन्दन अभी
और कुछ युगों तक
अनसुना रहेगा ।
आज का कोई इतिहास नहीं होता
कल का जो था
वह ज़ब्त है तिजोरियों में
और कल का जो इतिहास होगा

अधगले पंजरों पर
सपने उगाने का।”

गत दो दशकों में सोशल मीडिया द्वारा विश्व स्तर पर लिखे जा रहे हिंदी साहित्य का विस्तार हुआ है। हिंदी का वैश्विक रुप सामने आया है। प्रवासी साहित्यकारों का इसमें महत्वपूर्ण योगदान रहा है। अभिमन्यु अनत पिछले 5 दशकों से भारत से जुड़े हुए हैं। उनका सम्पूर्ण साहित्य भारतीय समाज को प्रतिबिम्बित करता है।

हिंदी साहित्य में अभिमन्यु अनत कहानीकार के रूप में अवतरित हुए। अपनी कहानियों से बहुत कम समय में वह चर्चित हुए। ‘गुलमोहर खौल उठा’ काव्य-संग्रह से उन्हें कवि के रूप में व्यापक चर्चा मिली। उनका जीवन और साहित्य मजदूरों के प्रति समर्पित रहा। वह अपनी कविताओं में बार-बार मजदूर वर्ग के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करते हैं-

“मॉरीशस के उन प्रथम
मज़दूरों के
अधगले पंजरों पर के
चाबुक और बाँसों के निशान
ऊपर आ जायेंगे
उस समय
उसके तपिश से
द्वीप की सम्पत्तियों पर
मालिकों के अंकित नाम
पिघलकर बह जायेंगे””

हिन्दी साहित्य के प्रमुख आलोचक कमल किशोर गोयनका अभिमन्यु अनत के बहुचर्चित उपन्यास के माध्यम से उनकी रचनाओं के व्यक्त मॉरीशस के मजदूर जीवन को व्यक्त करते हैं- “ इसमें मॉरिशस गए भारतीय गिरमिटिया मजदूरों की दासता, दमन और शोषण के गूंगे इतिहास को लेखक ने जीवित और जीवंत कर दिया है। वे भारतवंशी मजदूर इस शोषण के बावजूद अपनी भाषा, धर्म, संस्कृति एवं अस्मिता को बचाकर रखने में सफल हुए। अभिमन्यु मुख्यत: प्रश्र और विद्रोह के लेखक हैं। वह दासता से मुक्ति और मॉरिशसीय अस्मिता के रचनाकार हैं। अभिमन्यु की अनेक कथाएं भारतीय जीवन की कथाओं जैसी हैं। मॉरिशस के समाज में पतन एवं विकृति की जैसी स्थितियां हैं, वैसी ही भारत में भी हैं। अनत कहते भी हैं कि मॉरिशस उनकी जन्म और कर्मभूमि हैं और भारत है उनकी सांस्कृतिक भूमि। उनका साहित्य में भारत विद्यमान है। मैं उन्हें मॉरिशस का प्रेमचंद कहता हूं, क्योंकि इन दोनों सर्जकों के सरोकारों में काफी समानता है।”

इस प्रकार देखे तो अभिमन्यु अनत की कविताएं मानवता का पाठ पढ़ाती हैं। वह मजदूर जीवन की अकथ कहानी कहती हैं-

“ईख के खेतों का मजदूर
सूखे फेफड़े पर हाथ रक्खे मर रहा
एक भी डॉक्टर पास नहीं
उधर पाँच इंजीनियर मिलकर
ईख (चीनी) के कारखाने के पुर्जे पर
चर्बी लेप रहे।”

अभिमन्यु अनत इतिहास द्वारा छूट गए सत्यों को भी अपनी कविता में उकेरते हैं। मॉरिशस के इतिहास की महत्वपूर्ण घटना को वह अपनी कविता में प्रस्तुत करते हैं। भारत से जबरन लाए गए गिरमिटिया मजदूरों के साथ हुए अत्याचारों का कोई हिसाब इतिहास के किसी किताब में दर्ज़ नहीं है। अनत जी ने उसी घायल अस्मिता को इस पंक्तियों में अभिव्यक्त किया है-

“आज अचानक हवा के झोंकों से
झरझरा कर झरते देखा
गुलमोहर की पंखुड़ियों को
उन्हें खामोशी में झुलसते छटपटाते देखा
धरती पर धधक रहे अंगारों पर
फिर याद आ गया अचानक
वह अनलिखा इतिहास मुझे
इतिहास की राख में छुपी
गन्ने के खेतों की वे आहें याद आ गयीं
जिन्हें सुना बार-बार द्वीप का
प्रहरी मुड़िया पहाड़ दहल कर काँपा
बार-बार डरता था वह भीगे कोड़ों की बौछारों से
इसलिए मौन साधे रहा
आज जहाँ खामोशी चीत्कारती है
हरयालियों के बीच की तपती दोपहरी में
आज अचानक फिर याद आ गये
मज़दूरों के माथे के माटी के वे टीके
नंगी छाती पर चमकती बूँदें
और धधकते सूरज के ताप से
गुलमोहर की पंखुड़ियाँ ही जैसे
उनके कोमल सपने भी हुए थे
राख आज अचानक

हिन्द महासागर की लहरों से तैर कर आयी
गंगा की स्वर-लहरी को सुन
फिर याद आ गया मुझे वह काला इतिहास
उसका बिसारा हुआ वह अनजान आप्रवासी देश के
अन्धे इतिहास ने न तो उसे देखा था
न तो गूँगे इतिहास ने कभी सुनाई उसकी पूरी कहानी हमें
न ही बहरे इतिहास ने सुना था
उसके चीत्कारों को
जिसकी इस माटी पर बही थी
पहली बूँद पसीने की
जिसने चट्टानों के बीच हरियाली उगायी थी
नंगी पीठों पर सह कर बाँसों की
बौछार बहा-बहाकर लाल पसीना
वह पहला गिरमिटिया इस माटी का बेटा
जो मेरा भी अपना था तेरा भी अपना ।”3

वास्तव में यह कविता प्रलोभन से लायी गयी उन तमाम भारतीय अप्रवासी मजदूरों की, उनके पूर्वजों की संघर्ष-गाथा को तथा अन्याय और अत्याचार से मुक्ति पाने की छ्टपटाहट को दर्शाता है, जिनकी मृत्यु इतिहास की मृत्यु थी। अभिमन्यु अनत की दृष्टि समकालीन बेरोजगारी एंव आर्थिक संकटों की ओर भी गया है। इसलिए उन्होंने व्यवस्था के ऊपर व्यंग्य बाण कसा है और उस गरीब समुदाय को दिखाया है जो इस व्यवस्था के द्वारा सताये जा रहे हैं। भूखे पेट दिन रात काम करने की व्यथा, वर्तमान की आर्थिक संकट से उपजी यथार्थता को बड़ी जीवंतता के साथ रेखांकित किया है –

“ तुमने आदमी को खाली पेट दिया
ठीक किया
पर एक प्रश्न है रे नियति
खाली पेट वालों को
तुमने घुटने क्यों दिये?
फैलानेवाला को हाथ क्यों दिया?”4
अभिमन्यु अनत की काव्य-भाषा अपनी मार्मिक बुनावट के कारण पाठकों को अंदर तक प्रभावित करती हैं। वह भाषा के मर्मज्ञ हैं और साधक भी। आलोचक श्रवणकुमार उनकी कविता के संबंध में लिखते हैं- “अभिमन्यु की भाषा भी “अपनी” है। मैं चाहता हूँ इस का सही विकास हो। अभिमन्यु में सामर्थ्य है। इसलिए मैं आशा करता हूँ कि कलात्मक दृष्टि से भी उसमें और-और निखार आयेगा।” वास्तव में हिंदी भाषा के प्रति उनका लगाव उनकी कविताओं में साफ-साफ नजर आता है।”

अभिमन्यु अनत की कविताएँ हाशिए की समाज की सच्ची वेदना को स्वर देती हैं। वह अपनी कविताएँ मानवीय सम्बन्धों को बनाने के लिए समर्पित करते हैं। आम आदमी तथा उसके जीवन से वास्ता रखने वाली कविताओं का सृजन ही अभिमन्यु अनत की काव्य-चेतना का मूलभाव है। वह कविताओं द्वारा प्रवासी भारतीय समाज के कटू-अनुभव को बारीकी से अभिव्यक्त करते हैं। अपनी कविता में वह उत्पीड़ित समाज के संघर्ष को मुख्यधारा के साहित्य से जोड़ने का कार्य करते हैं।

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